अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ३] किष्किन्धाकाण्ड १६९
जहावज्ञानमखिलं स्वस्थचित्तोऽभवत्तदा । ततः सुग्रीवमाहेदं रामो वानरपुङ्गवम् ॥३९॥ भ्रातुर्ज्येष्ठस्य पुत्रेण यद्युक्तं साम्परायिकम् । कुरु सर्वं यथान्यायं संस्कारादि ममाज्ञया ॥४०॥ तथेति वलिभिर्मुख्यैर्वानरैः परिणीय तम् । वालिनं पुष्पके क्षिप्त्वा सर्वराजोपचारकैः ॥४१॥ भेरीदुन्दुभिनिर्घोषैर्ब्राह्मणैर्मन्त्रिभिः सह । यूथपैर्वानरैः पौरैस्तारया चाङ्गदेन च ॥४२॥ गत्वा चकार तत्सर्वं यथाशास्त्रं प्रयत्नतः । स्नात्वा जगाम रामस्य समीपं मन्त्रिभिः सह ॥४३॥ नत्वा रामस्य चरणौ सुग्रीवः प्राह हृष्टधीः । राज्यं प्रशाधि राजेन्द्र वानराणां समृद्धिमत् ॥४४॥ दासोऽहं ते पादपद्मं सेवे लक्ष्मणवच्चिरम् ।
इत्युक्तो राघवः प्राह सुग्रीवं सस्मितं वचः ॥४५॥ त्वमेवाहं न सन्देहः शीघ्रं गच्छ ममाज्ञया । पुरराज्याधिपत्ये त्वं स्वात्मानमभिषेचय ॥४६॥ नगरं न प्रवेक्ष्यामि चतुर्दश समाः सखे । आगमिष्यति मे भ्राता लक्ष्मणः पत्तनं तव ॥४७॥ अङ्गदं यौवराज्ये त्वमभिषेचय सादरम् । अहं समीपे शिखरे पर्वतस्य सहानुजः ॥४८॥ वत्स्यामि वर्षदिवसांस्ततस्त्वं यत्नवान् भव । किञ्चित्कालं पुरे स्थित्वा सीतायाः परिमार्गणे ॥४९॥ साष्टाङ्गं प्रणिपत्याह सुग्रीवो रामपादयोः । यदाऽऽज्ञापयसे देव तत्तथैव करोम्यहम् ॥५०॥ अनुज्ञातश्च रामेण सुग्रीवस्तु सलक्ष्मणः । गत्वा पुरं तथा चक्रे यथा रामेण चोदितः ॥५१॥
चित्त हो गया। तदनन्तर भगवान्ने वानरश्रेष्ठ सुग्रीवसे कहा-॥३६-३९॥ "हे सुग्रीव ! तुम मेरी आज्ञासे बेटा अंगदके द्वारा अपने बड़े भाईका जो कुछ शास्त्रोक्त और्ध्वदैहिक कर्म हो वह सब विधिपूर्वक करो" ॥४०॥ तब 'जो आज्ञा' कह मुख्य-मुख्य बलवान् वानरोंके साथ वालीके शवको फूलोंके विमानपर रखकर समस्त राजोचित उपचारोंके सहित भेरी और दुन्दुभि आदिका घोष करते हुए ब्राह्मण, मन्त्रिवर्ग, यूथपति वानरगण, पुरवासी, तारा और अंगदके साथ उसे ले जाकर सुग्रीवने बड़े प्रयत्नसे शास्त्रानुकूल सब संस्कार किये और फिर स्नानादि करके मन्त्रियोंके साथ रामके पास लौट आया ॥४१-४३॥
वहाँ आकर सुग्रीवने प्रसन्न चित्तसे श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें प्रणाम करके कहा-"हे राजराजेश्वर ! वानरोंके इस समृद्धिसम्पन्न राज्यका शासन कीजिये ॥४४॥ मैं तो आपका दास हूँ; लक्ष्मणके समान मैं भी सदा आपके चरणकमलोंकी सेवा करता रहूँगा।"
यह सुनकर श्रीरघुनाथजीने सुग्रीवसे मुसकाते हुए कहा-॥४५॥ "सुग्रीव ! मैं और तू एक ही हैं-इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं। मेरी आज्ञासे तुम तुरन्त ही जाकर किष्किन्धाके राजपदपर अपना अभिषेक कराओ॥४६॥ हे सखे! मैं चौदह वर्षतक किसी भी नगरमें प्रवेश नहीं कर सकता इसलिये तुम्हारे राज्याभिषेकके समय भाई लक्ष्मण तुम्हारे नगरमें आयेगा ॥४७॥ अंगदको तुम आदरपूर्वक यौवराज्यपदपर अभिषिक्त करना। अब मैं वर्षाके दिनोंमें भाई लक्ष्मणके साथ यहाँ पास ही पर्वत-शिखरपर रहूँगा, सो तुम कुछ दिन नगरमें रहकर फिर सीताजीकी खोज करानेका प्रयत्न करना"॥४८-४९॥
तब सुग्रीवने श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें साष्टांग दण्डवत् करके कहा-"भगवन् ! आपकी जैसी आज्ञा होगी मैं वही करूँगा" ॥५०॥ फिर भगवान् रामकी आज्ञा पा सुग्रीव लक्ष्मणजीको साथ लेकर किष्किन्धापुरीमें गये और जैसे-जैसे श्रीरामचन्द्रजीने करनेको कहा था सब कार्य वैसे ही किया ॥५१॥ तदनन्तर सुग्रीवसे
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