अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १७० | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ४ |
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सुग्रीवेण यथान्यायं पूजितो लक्ष्मणस्तदा ।
आगत्य राघवं शीघ्रं प्रणिपत्योपतस्थिवान् ॥५२॥
ततो रामो जगामाशु लक्ष्मणेन समन्वितः ।
प्रवर्षणगिरेरूर्ध्वं शिखरं भूरिविस्तरम् ॥५३॥
तत्रैकं गह्वरं दृष्ट्वा स्फाटिकं दीप्तिमच्छुभम् ।
वर्षवातातपसहं फलमूलसमीपगम् ।
वासाय रोचयामास तत्र रामः सलक्ष्मणः ॥५४॥
दिव्यमूलफलपुष्पसंयुते
मौक्तिकोपमजलौघपल्वले ।
चित्रवर्णमृगपक्षिशोभिते
पर्वते रघुकुलोत्तमोऽवसत् ॥५५॥
यथोचित आदर पा लक्ष्मणजी श्रीरघुनाथजीके पास चले आये और उनके चरणोंमें प्रणाम कर उनकी सेवामें उपस्थित हो गये ॥ ५२ ॥
तब श्रीरामचन्द्रजी तत्काल ही लक्ष्मणके साथ प्रवर्षण पर्वतके ऊपर अति विस्तीर्ण शिखरपर गये ॥ ५३ ॥ वहाँ उन्होंने स्फटिकमणिकी एक स्वच्छ और प्रकाशमान गुफा देखी। उसमें वर्षा, वायु और धूपसे बचनेका सुभीता था तथा पास ही कन्द, मूल और फल भी लगे हुए थे। उसे देखकर श्रीराम और लक्ष्मणने वहीं रहना पसन्द किया ॥ ५४ ॥ तब रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी दिव्य मूल फल और फूलोंसे सम्पन्न, मोतीके समान स्वच्छ जलवाले सरोवरोंसे युक्त और चित्र-विचित्र मृग तथा पक्षियोंसे सुशोभित उस प्रवर्षण पर्वतपर रहने लगे ॥ ५५ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥३॥
चतुर्थ सर्ग
भगवान् रामका लक्ष्मणजीसे क्रियायोगका वर्णन करना।
श्रीमहादेव उवाच
तत्र वार्षिकादिनानि राघवो
लीलया मणिगुहासु सञ्चरन् ।
पक्कमूलफलभोगतोषितो
लक्ष्मणेन सहितोऽवसत्सुखम् ॥ १ ॥
वातनुन्नजलपूरितमेघा-
नन्तरस्तनितविद्युतगर्भान् ।
वीक्ष्य विस्मयमगाद्गजयूथा-
न्यङ्गदाहितसुकाञ्चनकक्षान् ॥ २ ॥
नवघासं समास्वाद्य हृष्टपुष्टमृगद्विजाः ।
धावन्तः परितो रामं वीक्ष्य विस्फारितेक्षणाः ॥३॥
न चलन्ति सदाध्याननिष्ठा इव मुनीश्वराः ।
रामं मानुषरूपेण गिरिकाननभूमिषु ॥ ४ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति! वहाँ श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके साथ लीलासे ही मणिमय गुफाओंमें विचरते और पके हुए फल-फूल खाकर निर्वाह करते हुए वर्षाके दिनोंमें आनन्दपूर्वक रहे ॥ १ ॥ वायुसे प्रेरित सजल मेघोंको देखकर, जो अपने भीतर कौंधती हुई बिजलीके कारण सुनहरी झूलोंसे युक्त हाथियोंके झुण्डके समान प्रतीत होते थे, उन्हें बड़ा ही विस्मय हुआ करता था ॥ २ ॥ नवीन घासके खानेसे हृष्ट-पुष्ट हुए मृग और पक्षिगण जब कभी इधर-उधर दौड़ते हुए श्रीरामचन्द्रजीको देख लेते तो उनकी ओर टकटकी लगाये रह जाते ॥ ३ ॥ और ध्याननिष्ठ मुनीश्वरोंके समान इधर-उधर जाना भूलकर जहाँ-के-तहाँ खड़े रह जाते। इस समय परमात्मा रामको मनुष्यरूपसे पर्वत और वनोंमें विचरते जानकर