भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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सर्ग ४ ] किष्किन्धाकाण्ड १७१


चरन्तं परमात्मानं ज्ञात्वा सिद्धगणा भुवि ।<br>मृगपक्षिगणा भूत्वा राममेवानुसेविरे ॥ ५॥बहुत-से सिद्धगण पृथिवीपर मृग और पक्षियोंके रूपसे सदा उन्हींकी सेवामें रहने लगे ॥ ४-५ ॥
सौमित्रिरेकदा राममेकान्ते ध्यानतत्परम् ।<br>समाधिविरमे भक्त्या प्रणयाद्विनयान्वितः ॥ ६ ॥एक दिन एकान्तमें ध्यान करते हुए भगवान् रामसे उनकी समाधि खुलनेपर सुमित्रानन्दन श्रीलक्ष्मणजीने अति प्रेम और भक्तिसे नम्रतापूर्वक कहा—
अब्रवीद्देव ते वाक्यात्पूर्वोक्ताद्विगतो मम ।<br>अनाद्यविद्यासम्भूतः संशयो हृदि संस्थितः ॥ ७॥"भगवन् ! आपने मुझे जो उपदेश पहले दिया था उससे मेरे हृदयका अनादि अविद्या-जन्य सन्देह तो दूर हो गया है ॥ ६-७ ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामि क्रियामार्गेण राघव ।<br>भवदाराधनं लोके यथा कुर्वन्ति योगिनः ॥ ८ ॥किन्तु हे राघव ! योगिजन क्रियामार्ग (पूजा-पद्धति) से जिस प्रकार संसारमें आपकी आराधना किया करते हैं, इस समय मैं उसे सुनना चाहता हूँ ॥ ८ ॥
इदमेव सदा प्राहुर्योगिनो मुक्तिसाधनम् ।<br>नारदोऽपि तथा व्यासो ब्रह्मा कमलसम्भवः ॥ ९ ॥समस्त योगिजन एवं देवर्षि नारद, महर्षि व्यास और कमलयोनि श्रीब्रह्माजी भी इसीको मुक्तिका साधन बतलाते हैं ॥ ९ ॥
ब्रह्मक्षत्रादिवर्णानामाश्रमाणां च मोक्षदम् ।<br>स्त्रीशूद्राणां च राजेन्द्र सुलभं मुक्तिसाधनम् ।<br>तव भक्ताय मे भ्रात्रे ब्रूहि लोकोपकारकम् ॥ १०॥हे राजराजेश्वर ! ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णों तथा ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य आदि आश्रमोंको मोक्ष देनेवाला यही साधन है और स्त्री तथा शूद्रोंकी भी इसी साधनसे सुगमतासे मुक्ति हो सकती है। हे प्रभो ! मैं आपका भक्त और भाई हूँ; अतः आप मुझसे इस लोकोपकारी साधनका वर्णन कीजिये" ॥ १० ॥
श्रीराम उवाचश्रीरामचन्द्रजी बोले- हे रघुकुलनन्दन लक्ष्मण !
मम पूजा विधानस्य नान्तोऽस्ति रघुनन्दन ।<br>तथापि वक्ष्ये सङ्क्षेपाद्यथावदनुपूर्वशः ॥ ११॥मेरी पूजा-विधिका कोई अन्त नहीं है तथापि मैं क्रमशः उसका संक्षेपमें यथावत् वर्णन करता हूँ ॥ ११ ॥
स्वगृह्योक्तप्रकारेण द्विजत्वं प्राप्य मानवः ।<br>सकाशात्सद्गुरोर्मन्त्रं लब्ध्वा मद्भक्तिसंयुक्तः ॥ १२॥मेरी भक्तिसे सम्पन्न मनुष्य अपनी शाखाके गृह्यसूत्रद्वारा बतलाये गये प्रकारसे (उपनयन-संस्कारके अनन्तर) द्विजत्व प्राप्त कर भक्तिपूर्वक सद्गुरुके पास जाय और उनसे मन्त्र ग्रहण करे ॥ १२ ॥
तेन सन्दर्शितविधिर्मामेवाराधयेत्सुधीः ।<br>हृदये वाऽनले वाऽर्चेत्प्रतिमाऽऽदौ विभावसौ ॥ १३॥फिर बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि उन गुरुदेवकी बतायी हुई विधिसे अपने हृदयमें, अग्निमें, प्रतिमा आदिमें अथवा सूर्यमें केवल मेरी ही सेवा-पूजा करे ॥ १३ ॥
शालग्रामशिलायां वा पूजयेन्मामतन्द्रितः ।<br>प्रातःस्नानं प्रकुर्वीत प्रथमं देहशुद्धये ॥ १४॥अथवा सावधान होकर शालग्राम-शिलामें ही मेरी उपासना करे । बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि सबसे पहले देहशुद्धिके लिये, प्रातःकाल ही
वेदतन्त्रोदितैर्मन्त्रैर्मृल्लेपनविधानतः ।<br>सन्ध्यादि कर्म यन्नित्यं तत्कुर्याद्विधिना बुधः ॥ १५॥वैदिक तथा तान्त्रिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए शरीरमें विधिवत् मृत्तिका आदि लगाकर स्नान करे और फिर नियमानुसार सन्ध्या आदि नित्यकर्म करे ॥ १४-१५ ॥
सङ्कल्पमादौ कुर्वीत सिद्धयर्थं कर्मणां सुधीः ।मेरी पूजा करनेवाला मतिमान् पुरुष कर्मोंकी सिद्धिके लिये
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