भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197
१७२अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४

स्वगुरुं पूजयेद्भक्त्या मद्बुद्ध्या पूजको मम ॥१६॥
शिलायां स्नपनं कुर्यात्प्रतिमासु प्रमार्जनम् ।
प्रसिद्धैर्गन्धपुष्पाद्यैर्मत्पूजा सिद्धिदायिका ॥१७॥
अमायिकोऽनुवृत्त्या मां पूजयेन्नियतव्रतः ।
प्रतिमादिष्वलङ्कारः प्रियो मे कुलन्दन ॥१८॥
अग्नौ यजेत हविषा भास्करे स्थण्डिले यजेत् ।
भक्तेनोपहृतं प्रीत्यै श्रद्धया मम वार्यपि ॥१९॥
किं पुनर्लक्ष्यभोज्यादि गन्धपुष्पाक्षतादिकम् ।
पूजाद्रव्याणि सर्वाणि सम्पाद्यैवं समारभेत् ॥२०॥
चैलाजिनकुशैः सम्यगासनं परिकल्पयेत् ।
तत्रोपविश्य देवस्य सम्मुखे शुद्धमानसः ॥२१॥
ततो न्यासं प्रकुर्वीत मातृकाबहिरान्तरम् ।
केशवादि ततः कुर्यात्तत्त्वन्यासं ततः परम् ॥२२॥
मन्मूर्तिपञ्जरन्यासं मन्त्रन्यासं ततो न्यसेत् ।
प्रतिमादावपि तथा कुर्यान्नित्यमतन्द्रितः ॥२३॥
कलशं स्वपुरो वामे क्षिपेत्पुष्पादि दक्षिणे ।
अर्घ्यपाद्यप्रदानार्थं मधुपर्कार्थमेव च ॥२४॥
तथैवाचमनार्थं तु न्यसेत्पात्रचतुष्टयम् ।
हृत्पद्मे भानुविमले मत्कलां जीवसंज्ञिताम् ॥२५॥
ध्यायेत्स्वदेहमखिलं तया व्याप्तमरिन्दम ।
तामेवावाहयेन्नित्यं प्रतिमादिषु मत्कलाम् ॥२६॥
पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवस्त्रविभूषणैः ।
यावच्छक्योपचारैर्वा त्वर्चयेन्माममायया ॥२७॥


पहले संकल्प करे और फिर अपने गुरुदेवमें मेरी ही भावना रखकर उनकी पूजा करे ॥ १६ ॥ मेरी मूर्ति यदि शिलारूप हो तो स्नान करावे और यदि प्रतिमाकार हो तो केवल मार्जन ही करे । फिर प्रसिद्ध-प्रसिद्ध गन्ध और पुष्प आदिसे पूजा करे । इस प्रकार की हुई मेरी पूजा शीघ्र ही फल देनेवाली होती है ॥ १७ ॥ मनुष्यको सब प्रकारके छल-छिद्र छोड़कर गुरुकी बतायी विधिसे नियमबद्ध होकर मेरी पूजा करनी चाहिये । हे कुलन्दन ! प्रतिमा आदिका श्रृंगार करना मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥ १८ ॥ यदि अग्निमें पूजा करनी हो तो आहुतिद्वारा करे और यदि सूर्यमें करनी हो तो वेदीमें सूर्यका आकार बनाकर करे । भक्तके द्वारा श्रद्धापूर्वक निवेदन किया हुआ जल भी मेरी प्रसन्नताका कारण होता है ॥ १९ ॥ फिर भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थ और गन्ध पुष्प अक्षत आदि पूजा-सामग्रीकी तो बात ही क्या है ? अतः पहले पूजाकी सब सामग्री इकट्ठी कर फिर मेरी पूजा आरम्भ करे ॥२०॥

( अब जिस प्रकार पूजा करनी चाहिये वह बतलाता हूँ— ) पहले क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र बिछा-कर आसन बनावे तथा उसपर शुद्धचित्तसे इष्टदेवके सम्मुख बैठे ॥ २१ ॥ तदनन्तर बहिर्मातृका और अन्तर्मातृका न्यास करे तथा केशव, नारायण आदि चौबीस नामोंका न्यास करके तत्त्वन्यास करे । उसके पश्चात् ( विष्णु पञ्जरोक्त विधिसे ) मेरी मूर्तिमें पञ्जर-न्यास तथा मन्त्रन्यास करे । मेरी प्रतिमा आदिमें भी निरालस्य-भावसे उसी प्रकार न्यास करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ तथा अपने सामने बायीं ओर कलश और दायीं ओर पुष्प आदि सामग्री रखे, उसी तरह अर्घ्य, पाद्य, मधुपर्क और आचमनके लिये चार पात्र रखे । तत्पश्चात् अपने सूर्यके समान तेजस्वी हृदय-कमलमें जीवनाम्नी मेरी कलाका ध्यान करे और हे शत्रुदमन ! अपने सम्पूर्ण शरीरको उससे व्याप्त देखे तथा प्रतिमा आदिका पूजन करते समय भी उन ( प्रतिमा आदि ) में उस जीवकलाका ही आवाहन करे ॥ २४-२६ ॥ पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, आभूषण आदिसे अथवा जो कुछ सामग्री मिल सके उसीसे, निष्कपट होकर मेरी पूजा करे ॥ २७ ॥