भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ४ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १७३


विभवे सति कर्पूरकुङ्कुमागुरुचन्दनैः ।
अर्चयेन्मन्त्रवन्नित्यं सुगन्धकुसुमैः शुभैः ॥२८॥

दशावरणपूजां वै ह्यागमोक्तां प्रकारयेत् ।
नीराजनैर्धूपदीपैर्नैवेद्यैर्बहुविस्तरैः ॥२९॥

श्रद्धयोपहरेन्नित्यं श्रद्धाभुगहमेश्वरः ।
होमं कुर्यात्प्रयत्नेन विधिना मन्त्रकोविदः ॥३०॥

अगस्त्येनोक्तमार्गेण कुण्डेनागमवित्तमः ।
जुहुयान्मूलमन्त्रेण पुंसूक्तेनाथवा बुधः ॥३१॥

अथचौपासनाग्नौ वा चरुणा हविषा तथा ।
तप्तजाम्बूनदप्रख्यं दिव्याभरणभूषितम् ॥३२॥

ध्यायेदनलमध्यस्थं होमकाले सदा बुधः ।
पार्षदेभ्यो बलिं दत्त्वा होमशेषं समापयेत् ॥३३॥

ततो जपं प्रकुर्वीत ध्यायेन्मां यतवाक् स्मरन् ।
मुखवासं च ताम्बूलं दत्त्वा प्रीतिसमन्वितः ॥३४॥

मदर्थे नृत्यगीतादि स्तुतिपाठादि कारयेत् ।
प्रणमेद्दण्डवद्भूमौ हृदये मां निधाय च ॥३५॥

शिरस्याधाय मदत्तं प्रसादं भावनामयम् ।
पाणिभ्यां मत्पदे मूर्ध्नि गृहीत्वा भक्तिसंयुतः ॥३६॥

रक्ष मां घोरसंसारादित्युक्त्वा प्रणमेत्सुधीः ।
उद्वासयेद्यथापूर्वं प्रत्यग्ज्योतिषि संस्मरन् ॥३७॥

एवमुक्तप्रकारेण पूजयेद्विधिवद्यदि ।
इहामुत्र च संसिद्धिं प्राप्नोति मदनुग्रहात् ॥३८॥

मद्भक्तो यदि मामेवं पूजां चैव दिने दिने ।
करोति मम सारूप्यं प्राप्नोत्येव न संशयः ॥३९॥


यदि धनवान् हो तो नित्यप्रति कर्पूर, कुंकुम, अगुरु, चन्दन और अत्युत्तम सुगन्धित पुष्पोंसे मन्त्रोच्चारण करता हुआ मेरी पूजा करे ॥ २८ ॥ तथा नीरांजन (पाँच बत्तियोंकी आरती), धूप, दीप और नाना प्रकारके नैवेद्योंद्वारा वेदोक्त दशावरण-पूजा-विधिसे मेरा अर्चन करे ॥ २९ ॥

नित्यप्रति अति श्रद्धाके साथ सब पदार्थ निवेदन करे क्योंकि मैं परमात्मा श्रद्धाका ही भूखा हूँ। मन्त्र-विधिको जाननेवाला उपासक पूजाके अनन्तर विधिपूर्वक हवन करे ॥ ३० ॥ शास्त्रविधिके जाननेवाले बुद्धिमान् पुरुषको उचित है कि अगस्त्य मुनिकी बतायी हुई विधिसे कुण्ड बनाकर उसमें गुरुके दिये हुए मूलमन्त्रसे अथवा पुरुषसूक्तके मन्त्रोंसे आहुति छोड़े ॥ ३१ ॥ अथवा अग्निहोत्रकी अग्निमें ही चरु तथा हविसे हवन करे। हवन करते समय बुद्धिमान् याजक होमाग्निमें 'तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले सर्वालंकारविभूषित भगवान् यज्ञ-पुरुषके रूपमें' परमात्माका सदा ध्यान करे। और फिर मेरे पार्षदोंके लिये बलि देकर होम समाप्त कर दे ॥ ३२–३३ ॥

तदनन्तर मौन होकर मेरा ध्यान और स्मरण करता हुआ जप करे। फिर प्रीतिपूर्वक ताम्बूल और मुखवास देकर मेरे लिये नृत्य, गान और स्तुति-पाठ आदि करावे और हृदयमें मेरी मनोहर मूर्तिको धारण कर पृथिवी पर लोटकर साष्टांग दण्डवत् करे ॥ ३४–३५ ॥ मेरे दिये हुए भावनामय प्रसादको 'यह भगवत्प्रसाद है' ऐसी भावनासे शिरपर रखे और भक्तिभावसे विभोर हो मेरे चरणोंको अपने मस्तकपर रखकर और 'हे प्रभो! इस भयंकर संसारसे मुझे बचाओ' ऐसा कहकर मुझे प्रणाम करे, उसके बाद बुद्धिमान् उपासकको चाहिये कि प्रतिमामें आवाहन की हुई जीवकलाको 'वह मुझहीमें प्रवेश कर गयी है' ऐसी भावना करते हुए विसर्जन करे ॥ ३६–३७ ॥

जो पुरुष उपरोक्त प्रकारसे मेरी विधिपूर्वक पूजा करता है वह मेरी कृपासे इहलोक और परलोक दोनों जगह सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ३८ ॥ यदि मेरा भक्त इस प्रकार नित्यप्रति पूजा करे तो वह मेरा सारूप्य प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ यह अति