भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१७४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ४
इदं रहस्यं परमं च पावनं<br>मयैव साक्षात्कथितं सनातनम् ।<br>पठत्यजस्रं यदि वा शृणोति यः<br>स सर्वपूजाफलभाङ् न संशयः ॥४०॥गोपनीय पूजाविधि परम पवित्र और सनातन है । इसे साक्षात् मैंने ही अपने मुखसे कहा है । जो पुरुष इसे निरन्तर पढ़ता या सुनता है उसे निस्सन्देह सम्पूर्ण पूजाका फल मिलता है ॥ ४० ॥
एवं परात्मा श्रीरामः क्रियायोगमनुत्तमम् ।<br>पृष्टः प्राह स्वभक्ताय शेषांशाय महात्मने ॥४१॥इस प्रकार अपने अनन्य भक्त शेषावतार महात्मा लक्ष्मणजीके पूछनेपर परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीने इस अत्युत्तम क्रियायोगका उन्हें उपदेश किया ॥ ४१ ॥ फिर श्रीरामचन्द्रजी अपनी मायाका अवलम्बन कर साधारण पुरुषोंके समान दुःखित-से दिखायी देने लगे । वे 'हा सीते ! हा सीते !' कहते हुए सारी रात यों ही बिता देते, उन्हें किसी प्रकार नींद न आती ॥ ४२ ॥
पुनः प्राकृतवद्रामो मायामालम्ब्य दुःखितः ।<br>हा सीतेति वदन्नैव निद्रां लेभे कथञ्चन ॥४२॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र किष्किन्धायां सुबुद्धिमान् ।<br>हनूमान्प्राह सुग्रीवमेकान्ते कपिनायकम् ॥४३॥इसी समय किष्किन्धापुरीमें परम बुद्धिमान् हनुमान्जीने वानरराज सुग्रीवसे एकान्तमें कहा—॥ ४३ ॥ "हे राजन् ! सुनिये, मैं आपके बड़े हितकी बात कहता हूँ । देखिये, श्रीरामचन्द्रजीने पहले आपका कितना बड़ा उपकार किया है ॥ ४४ ॥ किन्तु मुझे मालूम होता है आप कृतघ्नके समान उसे भूल गये हैं । अहो ! आपहीके लिये जिन्होंने त्रिलोकमान्य वीरवर वालीको मारा और आपको राजपद्पर बैठाया तथा ( जिनकी कृपासे ) आपको परम दुर्लभ तारा मिली वे ही बुद्धिमान् भगवान् राम अपने भाईके साथ पर्वत-शिखरपर रहते हुए अपने भारी कार्यके लिये एकाग्रचित्तसे आपके आनेकी बाट देख रहे हैं । किन्तु आप वानर-स्वभावके अनुसार स्त्री-लम्पट होकर सब कुछ भूल गये ॥ ४५–४७ ॥ आपने सीताजीकी खोजके विषयमें 'मैं अवश्य करूँगा' ऐसी प्रतिज्ञा करके भी अभीतक कुछ नहीं किया । आप बड़े ही कृतघ्न हैं । मालूम होता है वालीके समान आप भी शीघ्र ही कालके गालमें जायँगे" ॥ ४८ ॥
शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि तवैव हितमुत्तमम् ।<br>रामेण ते कृतः पूर्वमुपकारो ह्यनुत्तमः ॥४४॥
कृतघ्नवच्चया नूनं विस्मृतः प्रतिभाति मे ।<br>त्वत्कृते निहतो वाली वीरस्त्रैलोक्यसम्मतः ॥४५॥
राज्ये प्रतिष्ठितोऽसि त्वं तारां प्राप्तोऽसि दुर्लभाम् ।<br>स रामः पर्वतस्याग्रे भ्रात्रा सह वसन्सुधीः ॥४६॥
त्वदागमनमेकाग्रभीक्षते कार्यगौरवात् ।<br>त्वं तु वानरभावेन स्त्रीसक्तो नावबुद्ध्यसे ॥४७॥
करोमीति प्रतिज्ञाय सीतायाः परिमार्गणम् ।<br>न करोषि कृतघ्नस्त्वं हन्यसे वालिवद्द्रुतम् ॥४८॥
हनूमद्वचनं श्रुत्वा सुग्रीवो भयविह्वलः ।<br>प्रत्युवाच हनूमन्तं सत्यमेव त्वयोदितम् ॥४९॥हनूमान्जीके वचन सुनकर सुग्रीव भयसे विह्वल हो गये और बोले—"हनूमन् ! तुम ठीक ही कहते हो ॥ ४९ ॥ अब तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही दशों दिशाओंमें बड़े शीघ्रगामी दश सहस्र वानर भेजो ॥ ५०॥ वे सातों द्वीपोंमें रहनेवाले सम्पूर्ण वानरोंको यहाँ ले आवें और जितने मुख्य-मुख्य वानर हैं वे सब यहाँ एक पक्षके भीतर आ जायँ ॥ ५१ ॥ जो कोई एक
शीघ्रं कुरु ममाज्ञां त्वं वानराणां तरस्विनाम् ।<br>सहस्राणि दशेदानीं प्रेषयाशु दिशो दश ॥५०॥
सप्तद्वीपगतान्सर्वान्वानरानानानयन्तु ते ।<br>पक्षमध्ये समायान्तु सर्वे वानरपुङ्गवाः ॥५१॥
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