अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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किष्किन्धाकाण्ड
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ये पक्षमतिवर्तन्ते ते वध्या मे न संशयः।
इत्याज्ञाप्य हनूमन्तं सुग्रीवो गृहमविशत् ॥५२॥
पक्षतक यहाँ न आयेगा वह निस्सन्देह मेरे हाथों मारा जायगा।” हनूमान्जीको इस प्रकार आज्ञा देकर सुग्रीव (फिर) अपने घरमें चले गये ॥ ५२ ॥
सुग्रीवाज्ञां पुरस्कृत्य हनूमान्मन्त्रिसत्तमः।
तत्क्षणे प्रेषयामास हरीन्दश दिशः सुधीः ॥५३॥
सुग्रीवकी आज्ञा पा परम बुद्धिमान् मन्त्रिप्रवर श्रीहनूमान्जीने तत्काल ही बहुत-से वानर दशों दिशाओंमें भेज दिये ॥ ५३ ॥
अगणितगुणसत्त्वान्वायुवेगप्रचारा-
न्वनचरगणमुख्यान् पर्वताकाररूपान्।
पवनहितकुमारः प्रेषयामास दूता-
नतिरभसतरात्मा दानमानादिवृत्तान् ॥५४॥
जो अगणित गुण और पराक्रमशाली थे तथा वायुके समान वेगवान् और पर्वतके समान स्थूलकाय थे, उन मुख्य-मुख्य वानर दूतोंको राम-कार्यके लिये अति उतावले पवननन्दन श्रीहनूमान्जीने दान-मानसे सन्तुष्ट कर सब ओर भेज दिया ॥५४॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥४॥
पञ्चम सर्ग
भगवान् रामका शोक और लक्ष्मणजीका किष्किन्धापुरीमें जाना।
श्रीमहादेव उवाच
रामस्तु पर्वतस्याग्रे मणिसानौ निशामुखे।
सीताविरहजं शोकमसहन्निदमब्रवीत् ॥ १ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! एक दिन प्रदोषकाल (रात्रिके प्रथम भाग) में प्रवर्षंण पर्वतके मणिमय शिखरपर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके विरह-जनित सन्तापको सहन न कर सकनेके कारण इस प्रकार बोले—॥ १ ॥
पश्य लक्ष्मण मे सीता राक्षसेन हृता बलात् ।
मृताऽमृता वा निश्चेतुं न जानेऽद्यापि भामिनीम् ॥२॥
“लक्ष्मण ! देखो, हमारी सीताको राक्षस बलात्कारसे हर ले गया; वह सुन्दरी जीवित है या मर गयी—इसका निश्चय करनेके लिये हमें अभीतक कुछ भी पता नहीं लगा ॥ २ ॥
जीवतीति मम ब्रूयात्कश्चिद्वा प्रियकृत्स मे।
यदि जानामि तां साध्वीं जीवन्तीं यत्र कुत्र वा ॥३॥
यदि कोई मुझे यह समाचार सुनावे कि ‘वह जीवित है’ तो वह मेरा बड़ा ही उपकार करेगा। यदि मुझे उस साध्वीके जीवित रहनेका पता लग जाय तो फिर वह कहीं
हठादेवाहरिष्यामि सुधामिव पयोनिधेः।
प्रतिज्ञां शृणु मे भ्रातर्येन मे जनकात्मजा ॥ ४ ॥
भी क्यों न हो, समुद्रमेंसे अमृतके समान मैं जैसे होगा वैसे उसे अवश्य ही तुरन्त ले आऊँगा। भाई ! मेरी प्रतिज्ञा सुनो—
नीता तं भस्मसात्कुर्यां सपुत्रबलवाहनम् ।
हे सीते चन्द्रवदने वसन्ती राक्षसालये ॥ ५ ॥
दुःखार्त्ता मामपश्यन्ती कथं प्राणान् धरिष्यसि ।
‘जो दुष्ट मेरी जानकीको ले गया है उसे पुत्र, सेना और वाहनोंके सहित मैं भस्म कर डालूँगा।’ हे चन्द्रवदने सीते ! मुझे न देखनेसे अत्यन्त दुःखातुर होकर राक्षसके घरमें रहती हुई तुम किस प्रकार प्राण धारण करोगी ? हा ! चन्द्रमुखी सीताके बिना तो