भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१७६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

चन्द्रोऽपि भानुवद्भाति मम चन्द्राननां विना ॥६॥

चन्द्र त्वं जानकीं स्पृष्ट्वा करैर्मां स्पृश शीतलैः । सुग्रीवोऽपि दयाहीनो दुःखितं मां न पश्यति ॥७॥

राज्यं निष्कण्टकं प्राप्य स्त्रीभिः परिवृतो रहः । कृतघ्नो दृश्यते व्यक्तं पानासक्तोऽतिकामुकः ॥८॥

नायाति शरदं पश्यन्नपि मार्गयितुं प्रियाम् । पूर्वोष्कारिणं दुष्टः कृतघ्नो विस्मृतो हि माम् ॥९॥

हन्मि सुग्रीवमप्येवं सपुरं सहबान्धवम् । वाली यथा हतो मेऽद्य सुग्रीवोऽपि तथा भवेत् ॥१०॥

इति रुष्टं समालोक्य राघवं लक्ष्मणोऽब्रवीत् । इदानीमेव गत्वाहं सुग्रीवं दुष्टमानसम् ॥११॥

मामाज्ञापय हत्वा तमायास्ये राम तेऽन्तिकम् । इत्युक्त्वा धनुरदाय स्वयं तूणीरमेव च ॥१२॥

गन्तुमभ्युद्यतं वीक्ष्य रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । न हन्तव्यस्त्वया वत्स सुग्रीवो मे प्रियः सखा ॥१३॥

किन्तु भीषय सुग्रीवं वालिबत्त्वं हनिष्यसे । इत्युक्त्वा शीघ्रमादाय सुग्रीवप्रतिभाषितम् ॥१४॥

आगत्य पश्चाद्यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम् । तथेति लक्ष्मणोऽगच्छत्त्वरितो भीमविक्रमः ॥१५॥

किष्किन्धां प्रति कोपेन निर्दहन्निव वानरान् । सर्वज्ञो नित्यलक्ष्मीको विज्ञानात्मापि राघवः ॥१६॥

सीतामनुशुशोचार्त्तः प्राकृतः प्राकृतामिव । बुद्ध्यादिसाक्षिणस्तस्य मायाकार्यातिवर्तिनः ॥१७॥

रागादिरहितस्यास्य तत्कार्यं कथमुद्भवेत् ।


मुझे चन्द्रमा भी सूर्यके समान (तापप्रद) जान पड़ता है ॥३-६॥ हे चन्द्र ! तुम अपनी किरणोंसे पहले जानकीको स्पर्श करो, (उनका स्पर्श करनेसे वे शीतल हो जायँगी) फिर उन शीतल किरणोंसे मुझे स्पर्श करना । हाय ! सुग्रीव भी कैसा निर्दयी हो गया है जो मुझ दुखियाकी ओर नहीं झाँकता ॥७॥ अहो ! निष्कण्टक राज्य पाकर मद्यपीनेमें आसक्त हुआ वह कामकिंकर स्त्रियोंसे घिरा एकान्तमें पड़ा रहता है। इससे वह स्पष्ट ही बड़ा कृतघ्न दीख पड़ता है ॥८॥ शरदऋतुका आगमन देखकर भी वह प्राणप्रिया सीताकी खोज करानेके लिये नहीं आया। मैंने उसका पहले उपकार किया है; तथापि वह दुष्ट कृतघ्न होकर मुझे भूल गया ॥९॥ (जिस प्रकार मुझे सीताको हर ले जानेवालेका नाश करना है) उसी प्रकार मैं सुग्रीवको भी उसके नगर और बन्धु-बान्धवोंके सहित मार डालूँगा । जैसे वाली मेरे हाथसे मारा गया वैसे ही आज सुग्रीव भी मारा जायगा” ॥१०॥

इस प्रकार रघुनाथजीको क्रुद्ध देखकर लक्ष्मणजी बोले— "हे राम ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी जाकर दुष्टचित्त सुग्रीवको मारकर आपके पास लौट आता हूँ।” ऐसा कह हाथमें धनुष और तरकश लेकर लक्ष्मणजीको अपने-आप ही जानेके लिये उद्यत देख श्रीरामचन्द्रजी बोले, "वत्स ! सुग्रीव मेरा प्यारा मित्र है, तुम उसे मारना मत ॥११-१३॥ केवल यह कहकर कि 'तू वालीके समान मारा जायगा' उसे डराना और फिर शीघ्र ही उसका उत्तर लेकर आ जाना । उस समय जो कुछ करना होगा मैं अवश्य वही करूँगा।”

तब महा पराक्रमी लक्ष्मणजी 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीमें आये । उस समय उन्होंने, क्रोधसे ऐसा उग्र रूप धारण किया था कि मानो सम्पूर्ण वानरोंको भस्म कर डालेंगे ।

श्रीरघुनाथजी सर्वज्ञ और ज्ञानस्वरूप हैं। श्रीलक्ष्मीजी सर्वदा उनकी सेवामें रहती हैं; तथापि साधारण स्त्रीके वियोगसे शोक करते हुए प्राकृत पुरुषके समान वे सीताजीके शोकसे विह्वल हो रहे हैं। वे प्रभु बुद्धि आदिके साक्षी, मायाके कार्योसे परे और राग-द्वेष आदि विकारोंसे रहित हैं फिर इन विकारोंका कार्य-रूप शोक उन्हें कैसे हो सकता है ? उन्होंने तो

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