भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ५ ] किष्किन्धाकाण्ड १७७


ब्रह्मणोक्तमृतं कर्तुं राज्ञो दशरथस्य हि ॥१८॥
तपसः फलदानाय जातो मानुषवेषधृक् ।
मायया मोहिताः सर्वे जना अज्ञानसंयुताः ॥१९॥
कथमेषां भवेन्मोक्ष इति विष्णुर्विचिन्तयन् ।
कथां प्रथयितुं लोके सर्वलोकमलापहाम् ॥२०॥
रामायणाभिधां रामो भूत्वा मानुषचेष्टकः ।
क्रोधं मोहं च कामं च व्यवहारार्थसिद्धये ॥२१॥
तत्तत्कालोचितं गृह्णन् मोहयत्यवशाः प्रजाः ।
अनुरक्त इवाशेषगुणेषु गुणवर्जितः ॥२२॥
विज्ञानमूर्तिर्विज्ञानशक्तिः साक्ष्यगुणान्वितः ।
अतः कामादिभिर्नित्यमविलिप्तो यथा नभः ॥२३॥
विन्दन्ति मुनयः केचिञ्जानन्ति जनकादयः ।
तद्भक्ता निर्मलात्मानः सम्यग् जानन्ति नित्यदा ।
भक्तचित्तानुसारेण जायते भगवानजः ॥२४॥
लक्ष्मणोऽपि तदा गत्वा किष्किन्धानगरान्तिकम्।
ज्याघोषमकरोत्तीव्रं भीपयन् सर्ववानरान् ॥२५॥
तं दृष्ट्वा प्राकृतास्तत्र वानरा वप्रमूर्धनि ।
चक्रुः किलकिलाशब्दं धृतपाषाणपादपाः ॥२६॥
तान्दृष्ट्वा क्रोधताम्राक्षो वानरान् लक्ष्मणस्तदा।
निर्मूलान्कर्तुमुद्युक्तो धनुरानम्य वीर्यवान् ॥२७॥
ततः शीघ्रं समाप्लुत्य ज्ञात्वा लक्ष्मणमागतम्॥२८॥
निवार्य वानरान् सर्वानङ्गदो मन्त्रिसत्तमः ।
गत्वा लक्ष्मणसामीप्यं प्रणनाम स दण्डवत्॥२९॥
ततोऽङ्गदं परिष्वज्य लक्ष्मणः प्रियवर्धनः ।
२३


ब्रह्माजीकी वाणी सत्य करने और महाराज दशरथको उनकी तपस्याका फल देनेके लिये ही मनुष्यरूपसे अवतार लिया है। 'सब लोग मायासे मोहित होकर अज्ञानके वशीभूत हो गये हैं, उससे इनका किस प्रकार छुटकारा हो' यह सोचकर भगवान् विष्णु अपनी सकल-लोक-मलापहारिणी रामायण नामकी कथाका लोकमें विस्तार करनेके लिये रामरूप होकर मनुष्यके समान अनेकों लीलाएँ करते हुए व्यवहारकी सिद्धि-के लिये समयानुकूल क्रोध, मोह और काम आदि विकारोंको स्वीकार करके विकारोंके वशीभूत हुई प्रजाको अपनी लीलासे मोहित कर रहे हैं। किन्तु सम्पूर्ण गुणोंमें अनुरक्त-से दिखलायी देते हुए भी वे वास्तवमें उन सबसे रहित हैं ॥१४–२२॥ वे विज्ञानस्वरूप हैं, विज्ञान ही उनकी शक्ति है तथा एकमात्र साक्षी और गुणातीत हैं। इसलिये वे आकाशके समान काम आदि (मनोविकारों) से सर्वदा अलिप्त हैं ॥२३॥ उनके वास्तविक स्वरूपको कोई-कोई मुनिजन, जनकादि राजर्षिगण तथा उनके विशुद्ध-चित्त भक्तजन ही सदा ठीक-ठीक जान पाते हैं, वे अजन्मा भगवान् भक्तकी भावनाके अनुसार अवतार लेते हैं ॥२४॥

इधर, लक्ष्मणजीने किष्किन्धापुरीके पास पहुँचकर सम्पूर्ण वानरोंको भयभीत करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका बड़ा भयंकर टंकार किया ॥२५॥ उस समय नगरके परकोटेपर चढ़े हुए कुछ साधारण वानर लक्ष्मणजीको देखकर अपने हाथोंमें पत्थर और वृक्षादि लेकर किलकारी मारने लगे। उन वानरोंको देखकर वीरवर लक्ष्मणजीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे धनुष चढ़ाकर उनका मूलोच्छेद करनेके लिये तत्पर हुए ॥२६-२७॥

तब लक्ष्मणजीको आये जान वहाँ मन्त्रिवर अंगदजी तुरन्त ही उछलकर आये और उन्होंने सब वानरोंको रोककर उनके पास जाकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८-२९॥ तदनन्तर, प्रियवर्द्धन श्रीलक्ष्मणजीने अंगदको हृदयसे लगाकर कहा—"वत्स! तुम अभी जाकर अपने काका सुग्रीवको सूचना दो कि श्रीरघुनाथजी