अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
पृष्ठ 203, कुल 423 में से
संदर्भ में पढ़ें१७८ \qquad\qquad\qquad\qquadअध्यात्मरामायण\qquad\qquad\qquad\qquad[सर्ग ५]
$उवाच वत्स गच्छ त्वं पितृव्याय निवेदय ॥३०॥ तुमसे अत्यन्त क्रुद्ध हैं और उनकी प्रेरणासे मैं यहाँ आया मामागतं राघवेण चोदितं रौद्रमूर्तिना । हूँ।” यह सुनकर अंगदने ‘बहुत अच्छा’ कह तुरन्त तथेति त्वरितं गत्वा सुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥३१॥ ही सारा समाचार सुग्रीवको जा सुनाया ॥ ३०-३१ ॥ लक्ष्मणः क्रोधताम्राक्षः पुरद्वारि बहिःस्थितः । और बोला कि ‘लक्ष्मणजी क्रोधसे नेत्र लाल किये तच्छ्रुत्वाऽतीव सन्त्रस्तः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥३२॥ बाहर नगरके द्वारपर खड़े हैं।’ आहूय मन्त्रिणां श्रेष्ठं हनूमन्तमथाब्रवीत् । यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको बड़ा ही भय गच्छ त्वमङ्गदेनाशु लक्ष्मणं विनयान्वितः ॥३३॥ हुआ ॥ ३२ ॥ उन्होंने मन्त्रिप्रवर हनूमान्जीको बुला- सान्त्वयन्कोपितं वीरं शनैरानय सादरम् । कर कहा—“तुम अंगदके साथ तुरन्त ही लक्ष्मणजीके प्रेषयित्वा हनूमन्तं तारामाह कपीश्वरः ॥३४॥ पास जाओ और उन क्रोधित हुए वीरवरको धीरे-धीरे त्वं गच्छ सान्त्वयन्ती तं लक्ष्मणं मृदुभाषितैः । अति विनयपूर्वक शान्त कर आदरपूर्वक अपने शान्तमन्तःपुरं नीत्वा पश्चाद्दर्शय मेऽनघे ॥३५॥ साथ यहाँ ले आओ।” इस प्रकार हनूमान्जीको भेज- भवत्विति ततस्तारा मध्यकक्षं समाविशत् । कर कपिराज सुग्रीवने तारासे कहा—॥ ३३-३४ ॥ हनूमानङ्गदेनैव सहितो लक्ष्मणान्तिकम् ॥३६॥ “हे अनघे ! तुम आगे जाकर अपनी मधुर गत्वा ननाम शिरसा भक्त्या स्वागतमब्रवीत् । वाणीसे वीरवर लक्ष्मणको शान्त करो और जब वे एहि वीर महाभाग भवद्गृहमशङ्कितम् ॥३७॥ शान्त हो जायँ तब उन्हें अन्तःपुरमें लाकर मुझसे प्रविश्य राजदारादीन् दृष्ट्वा सुग्रीवमेव च । मिलाओ” ॥ ३५ ॥ यदाज्ञापयसे पश्चात्तत्सर्वं करवाणि भोः ॥३८॥ यह सुनकर तारा ‘बहुत अच्छा’ कह बीचकी इत्युक्त्वा लक्ष्मणं भक्त्या करे गृह्य स मारुतिः । ड्योढ़ीमें आ गयी। इधर अंगदके सहित हनूमान्जी आनयामास नगरमध्याद्राजगृहं प्रति ॥३९॥ लक्ष्मणजीके पास आये और उन्हें शिर नवाकर भक्ति- पश्यंस्तत्र महासौधान् यूथपानां समन्ततः । पूर्वक स्वागत करते हुए बोले—“हे महाभाग वीरवर ! जगाम भवनं राज्ञः सुरेन्द्रभवनोपमम् ॥४०॥ निःशंकहोकर आइये, यह घर आपकाही है ॥३६-३७॥ मध्यकक्षे गता तत्र तारा ताराधिपानना । इसमें पधारकर राजमहिषियोंसे और महाराज सुग्रीवसे सर्वाभरणसम्पन्ना मदरक्तान्तलोचना ॥४१॥ मिलिये। फिर आपकी जो आज्ञा होगी हम वही उवाच लक्ष्मणं नत्वा स्मितपूर्वाभिभाषिणी । करेंगे” ॥ ३८ ॥ याहि देवर भद्रं ते साधुस्त्वं भक्तवत्सलः ॥४२॥ ऐसा कह पवननन्दन हनूमान्जी भक्तिपूर्वक किमर्थं कोपमाकार्षीर्भक्ते भृत्ये कपीश्वरे । लक्ष्मणजीका हाथ पकड़कर उन्हें नगरके बीचसे होकर राजमन्दिरको ले चले ॥ ३९ ॥ तब, लक्ष्मणजी मार्गमें जहाँ-तहाँ यूथपति वानरोंके महल देखते हुए इन्द्रभवनके समान अति शोभायमान राजभवनमें पहुँचे ॥ ४० ॥ वहाँ बीचकी ड्योढ़ीमें चन्द्रवदना तारा बैठी थी; वह सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषिता थी तथा उसके नेत्र मदसे कुछ अरुणवर्ण हो रहे थे ॥ ४१ ॥ वह मधुरभाषिणी तारा लक्ष्मणजीको प्रणाम कर मुसकाती हुई बोली— “आइये देवर, आपका शुभ हो। आप बड़े ही साधुस्वभाव और भक्तवत्सल हैं ॥४२॥ आपने अपने भक्त और$