भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ५] किष्किन्धाकाण्ड १७९


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बहुकालमनाश्वासं दुःखमेवानुभूतवान् ॥४३॥<br>इदानीं बहुदुःखौघाद्भवद्भीरभिरक्षितः ।<br>भवत्प्रसादात्सुग्रीवः प्राप्तसौख्यो महामतिः॥४४॥<br>कामासक्तो रघुपतेः सेवार्थं नागतो हरिः ।<br>आगमिष्यन्ति हरयो नानादेशगताः प्रभो ॥४५॥<br>प्रेषिता दशसाहस्रा हरयो रघुसत्तम ।<br>आनेतुं वानरान् दिग्भ्यो महापर्वतसन्निभान्॥४६॥<br>सुग्रीवः स्वयमागत्य सर्ववानरयूथपैः ।<br>वधयिष्यति दैत्यौघान् रावणं च हनिष्यति ॥४७॥<br>त्वयैव सहितोऽद्यैव गन्ता वानरपुङ्गवः ।<br>पश्यान्तर्भवनं तत्र पुत्रदारसुहृद्वृतम् ॥४८॥<br>दृष्ट्वा सुग्रीवमभयं दत्त्वा नय सहैव ते ।अनुगत वानरराज सुग्रीवपर किस कारण इतना कोप किया? उसने तो बहुत दिनोंसे बिना किसी प्रकारका सहारा मिले दुःख ही दुःख भोगा है॥४३॥ अब आपलोगों-ने ही उसे बड़े दुःख-समूहसे निकाला है। आपहीकी कृपा-से महामति सुग्रीवको यह सुख देखनेमें आया है॥४४॥ वह जातिका वानर है, इसलिये कामासक्त होकर श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित नहीं हुआ । हे प्रभो ! अब शीघ्र ही विविध देशोंसे बहुत-से वानर आनेवाले हैं॥४५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! अब दिशा-विदिशाओंसे महा-पर्वतके समान बड़े-बड़े डीलवाले असंख्य वानरोंको लानेके लिये दश सहस्र बन्दर भेजे गये हैं॥४६॥ सुग्रीव स्वयं जाकर उन सब वानर-यूथपतियोंके द्वारा दैत्यदलका संहार करावेगा और स्वयं रावणका वध करेगा ॥४७॥ वह कपिश्रेष्ठ आज ही आपके साथ श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित होगा । चलिये, अन्तःपुरमें पधारिये । वहाँ सुग्रीव अपने पुत्र, स्त्री और सुहृद्गणसे घिरा हुआ बैठा है । उससे मिलकर उसे अभयदान दीजिये और अपने साथ ही श्रीरामचन्द्रजीके पास ले जाइये ।”
ताराया वचनं श्रुत्वा कृशक्रोधोऽथ लक्ष्मणः॥४९॥<br>जगामान्तःपुरं यत्र सुग्रीवो वानरेश्वरः ।<br>रुमामालिङ्ग्य सुग्रीवः पर्यङ्के पर्यवस्थितः ॥५०॥<br>दृष्ट्वा लक्ष्मणमत्यर्थमुत्पपातातिभीतवत् ।<br>तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः क्रुद्धो मदविह्वलितेक्षणम् ॥५१॥<br>सुग्रीवं प्राह दुर्वृत्त विस्मृतोऽसि रघूत्तमम् ।<br>वाली येन हतो वीरः स बाणोऽद्य प्रतीक्षते ॥५२॥<br>त्वमेव वालिनो मार्गं गमिष्यसि मया हतः ।ताराका कथन सुनकर लक्ष्मणजीका क्रोध ठण्डा पड़ गया और वे अन्तःपुरमें, जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, गये। सुग्रीव अपनी भार्या रुमाको गले लगाये पलंगपर पड़े थे,॥४८-५०॥ लक्ष्मणजीको देखते ही वे अत्यन्त भयभीतके समान उछलकर खड़े हो गये । उनके नेत्र मदसे विह्वल हो रहे थे। उन्हें ऐसी दशामें देखकर श्रीलक्ष्मणजीने अति क्रोधित होकर कहा— “अरे दुःशील ! तू रघुनाथजीको भूल गया ? (तू नहीं जानता—) जिस बाणके द्वारा वीरवर वाली मारा गया था वही आज तेरी प्रतीक्षा कर रहा है ॥५१-५२॥ मालूम होता है, मेरे हाथसे मारा जाकर तू भी वालीके मार्गसे ही जाना चाहता है ।”
एवमत्यन्तपरुषं वदन्तं लक्ष्मणं तदा ॥५३॥<br>उवाच हनुमान् वीरः कथमेवं प्रभाषसे ।<br>त्वत्तोऽधिकतरो रामे भक्तोऽयं वानराधिपः ॥५४॥<br>रामकार्यार्थमनिशं जागर्ति न तु विस्मृतः ।<br>आगताः परितः पश्य वानराः कोटिशः प्रभो॥५५॥लक्ष्मणजीको इस प्रकार अति कठोर भाषण करते देख वीरवर हनुमान्जी बोले—“महाराज ! ऐसी बातें क्यों कहते हैं ? ये वानरराज श्रीरामचन्द्रजीके आप-से भी अधिक भक्त हैं ॥ ५३-५४ ॥ भगवान् रामके कार्यके लिये ये रात-दिन जागते रहते हैं, ये उसे भूल नहीं गये हैं । प्रभो ! देखिये ये करोड़ों वानर इसीलिये सब