अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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१८० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| गमिष्यन्त्यचिरेणैव सीतायाः परिमार्गणम् ।<br>साधयिष्यति सुग्रीवो रामकार्यमशेषतः ॥५६॥ | ओरसे आ रहे हैं ॥ ५५ ॥ ये सब शीघ्र ही सीताजी-की खोजके लिये जायेंगे और महाराज सुग्रीव रामचन्द्रजीका सब कार्य भली प्रकार सिद्ध करेंगे” ॥५६॥ |
| श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं सौमित्रिर्लज्जितोऽभवत् ।<br>सुग्रीवोऽप्यर्घ्यपाद्याद्यैर्लक्ष्मणं समपूजयत् ॥५७॥ | हनूमान्जीके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजी लज्जित हो गये । तदनन्तर सुग्रीवने अर्घ्य और पाद्य आदिसे लक्ष्मणजीकी भली प्रकार पूजा की ॥५७॥ तथा उनसे गले |
| आलिङ्ग्य प्राह रामस्य दासोऽहं तेन रक्षितः ।<br>रामः स्वतेजसा लोकान् क्षणाद्धर्धैनैव जेष्यति ॥५८॥ | मिलकर कहा, “श्रीमन् ! मैं तो रामका दास हूँ, उन्होंने मेरी रक्षा की है; वे अपने तेजसे आधे क्षणमें ही सम्पूर्ण लोकोंको जीत सकते हैं ॥ ५८ ॥ हे प्रभो ! |
| सहायमात्रमेवाहं वानरैः सहितः प्रभो ।<br>सौमित्रिरपि सुग्रीवं प्राह किञ्चिन्मयोदितम्॥५९॥ | मैं तो अपनी वानर-सेनाके साथ केवल उनका सहायकमात्र हूँगा । (मुझसे भला उनका क्या कार्य सिद्ध होगा, वे तो स्वयं ही सर्व-समर्थ हैं) ।” तब लक्ष्मणजीने भी सुग्रीवसे कहा—“हे महाभाग ! मैंने |
| तत्क्षमस्व महाभाग प्रणयाद्भाषितं मया ।<br>गच्छामोऽद्यैव सुग्रीव रामस्तिष्ठति कानने ॥६०॥ | भी प्रणय-कोपवश आपसे जो कुछ अनुचित कहा है. वह क्षमा करें । भगवान् राम वनमें अकेले ही हैं और वे श्रीजानकीजीके विरहसे अति व्याकुल हैं, अतः हम आज ही वहाँ चलेंगे ।” |
| एक एवातिदुःखात्तो जानकीविरहातुरः ।<br>तथेति रथमारुह्य लक्ष्मणेन समन्वितः ॥६१॥ | |
| वानरैः सहितो राजा राममेवान्वपद्यत ॥६२॥ | तब वानरराज सुग्रीव 'हाँ ठीक है' ऐसा कहकर लक्ष्मणजीके सहित रथमें चढ़े और वानरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजीके पास चले ॥ ५९–६२ ॥ |
| भेरीमृदङ्गैर्बहुभृक्षवानरैः<br>श्वेतातपत्रैर्व्यजनैश्च शोभितः ।<br>नीलाङ्गदाद्यैर्हनुमत्प्रधानैः<br>समावृतो राघवमभ्यगाद्धरिः ॥६३॥ | उस समय (उनकी सवारीकी अपूर्व शोभा थी—) भेरी और मृदंग आदि नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे तथा बहुत-से रीछ, वानर श्वेत-छत्र और चँवर लिये उन्हें अत्यन्त सुशोभित कर रहे थे। इस प्रकार वानरराज सुग्रीव बड़े ठाट-बाटसे नील, अंगद और हनूमान् आदि मुख्य-मुख्य वानरोंके साथ श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ ६३ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥५॥