भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८१


षष्ठ सर्ग

सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश और स्वयम्प्रभाचरित्र।

श्रीमहादेव उवाच**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वती ! मृगेन्द्रचर्म और जटा-मुकुटसे सुशोभित, विशाल-नयन, सस्मित मनोहर-मुखारविन्द, शान्तमूर्ति, श्यामशरीर भगवान् रामको सीताजीकी विरह-व्यथासे सन्तप्त होकर मृग और पक्षियोंकी ओर निहारते हुए गुफाके द्वारपर एकं शिलाखण्डपर बैठे देख सुग्रीव और लक्ष्मण दूरसे ही तुरन्त रथसे उतर पड़े और अत्यन्त भक्ति-भावसे श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें जा गिरे ॥ १-३ ॥ धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको गले लगाकर उनकी कुशल पूछी तथा अपने पास बिठाकर उनका यथोचित सत्कार किया ॥ ४ ॥
दृष्ट्वा रामं समासीनं गुहाद्वारि शिलातले ।<br>वैलाजिनधरं श्यामं जटामौलिविराजितम् ॥ १ ॥<br>विशालनयनं शान्तं स्मितचारुमुखाम्बुजम् ।<br>सीताविरहसन्तप्तं पश्यन्तं मृगपक्षिणः ॥ २ ॥<br>रथाद्दूरात्समुत्पत्य वेगात्सुग्रीवलक्ष्मणौ ।<br>रामस्य पादयोरग्रे पेततुर्भक्तिसंयुतौ ॥ ३ ॥<br>रामः सुग्रीवमालिङ्ग्य पृष्ट्वाऽनामयमन्तिके ।<br>स्थापयित्वा यथान्यायं पूजयामास धर्मवित् ॥४॥
ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सुग्रीवो भक्तिनम्रधीः ।<br>देव पश्य समायान्तीं वानराणां महाचमूम् ॥ ५ ॥तब सुग्रीवने भक्तिवश अति विनीत होकर श्रीरघुनाथजीसे कहा—"भगवन् ! देखिये, वानरोंकी यह महान् सेना आ रही है ॥ ५ ॥
कुलाचलाद्रिसम्भूता मेरुमन्दरसन्निभाः ।<br>नानाद्वीपसरिच्छैलवासिनः पर्वतोपमाः ॥ ६ ॥<br>असङ्ख्याताः समायान्ति हरयः कामरूपिणः ।<br>सर्वे देवांशसम्भूताः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ७ ॥प्रभो ! हिमालय आदि कुलपर्वतोंपर उत्पन्न हुए, सुमेरु और मन्दराचलके समान डील-डौलवाले, भिन्न-भिन्न द्वीप नदी-तट और पर्वतोंके ऊपर रहनेवाले तथा पर्वतके समान अगणित विशालकाय वानर आ रहे हैं। ये सभी देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं और युद्ध करनेमें भी अति कुशल हैं ॥ ६-७ ॥
अत्र केचिद्गजवलाः केचिद्दशगजोपमाः ।<br>गजायुतबलाः केचिदन्येऽमितबलाः प्रभो ॥ ८ ॥हे प्रभो ! इनमेंसे किन्हींमें एक, किन्हींमें दश और किन्हींमें दश हजार हाथियोंका बल है तथा किन्हींके बलका तो कोई परिमाण ही नहीं है ॥ ८ ॥
केचिदञ्जनकूटाभाः केचित्कनक सन्निभाः ।<br>केचिद्रक्तान्तवदना दीर्घवालास्तथाऽपरे ॥ ९ ॥देखिये, कोई कज्जलगिरिके समान काले हैं, कोई सुवर्णके समान सुनहरी हैं, किन्हींका मुख रक्तवर्ण है और किन्हींके शरीरपर बड़े-बड़े बाल हैं ॥ ९ ॥
शुद्धस्फटिकसङ्काशाः केचिद्राक्षससन्निभाः ।<br>गर्जन्तः परितो यान्ति वानरा युद्धकाङ्क्षिणः ॥१०॥कोई शुद्ध स्फटिकमणिके समान दिखायी देते हैं और कोई राक्षस-जैसे मालूम पड़ते हैं। ये सभी वानर युद्धके लिये अति उतावले हैं इसीलिये गर्जते हुए इधर-उधर दौड़ रहे हैं ॥ १० ॥
त्वदाज्ञाकारिणः सर्वे फलमूलाशनः प्रभो ।<br>ऋक्षाणामधिपो वीरो जाम्बवान्नाम बुद्धिमान् ॥११॥हे प्रभो ! ये सब आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले और फल-मूल आदि ही खानेवाले हैं। (इनके निर्वाहके लिये आपको कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी)। ये रीछोंके अधिपति
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