अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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एष मे मन्त्रिणां श्रेष्ठः कोटिभल्लूकवृन्दपः ।
हनूमानेष विख्यातो महासत्त्वपराक्रमः ॥१२॥
वायुपुत्रोऽतितेजस्वी मन्त्री बुद्धिमतां वरः ।
नलो नीलश्च गवयो गवाक्षो गन्धमादनः ॥१३॥
शरभो मैन्दवश्चैव गजः पनस एव च ।
वलीमुखो दधिमुखः सुषेणस्तार एव च ॥१४॥
केसरी च महासत्त्वः पिता हनुमतो बली ।
एते ते यूथपा राम प्राधान्येन मयोदिताः ॥१५॥
महात्मानो महावीर्याः शक्रतुल्यपराक्रमाः ।
एते प्रत्येकतः कोटिकोटिवानरयूथपाः ॥१६॥
तवाज्ञाकारिणः सर्वे सर्वे देवांशसम्भवाः ।
एष वालिसुतः श्रीमानङ्गदो नाम विश्रुतः ॥१७॥
वालितुल्यबलो वीरो राक्षसानां बलान्तकः ।
एते चान्ये च बहवस्त्वदर्थे त्यक्तजीविताः ॥१८॥
योद्धारः पर्वताग्रैश्च निपुणाः शत्रुघातने ।
आज्ञापय रघुश्रेष्ठ सर्वे ते वशवर्तिनः ॥१९॥
रामः सुग्रीवमालिङ्ग्य हर्षपूर्णाश्रुलोचनः ।
प्राह सुग्रीव जानासि सर्वं त्वं कार्यगौरवम् ॥२०॥
मार्गणार्थं हि जानक्या नियुङ्क्ष्व यदि रोचते ।
श्रुत्वा रामस्य वचनं सुग्रीवः प्रीतमानसः ॥२१॥
प्रेषयामास बलिनो वानरान् वानरर्षभः ।
दिक्षु सर्वासु विविधान्वानरान् प्रेष्य सत्वरम् ॥२२॥
दक्षिणां दिशमत्यर्थं प्रयत्नेन महाबलान् ।
युवराजं जाम्बवन्तं हनूमन्तं महाबलम् ॥२३॥
नलं सुषेणं शरभं मैन्दं द्विविदमेव च ।
प्रेषयामास सुग्रीवो वचनं चेदमब्रवीत् ॥२४॥
विचिन्वन्तु प्रयत्नेन भवन्तो जानकीं शुभाम् ।
मासादर्वाङ्निवर्तध्वं मच्छासनपुरःसराः ॥२५॥
जाम्बवान् बड़े ही वीर और बुद्धिमान् हैं। ये एक करोड़ भालुओंके यूथपति हैं और मेरे मन्त्रियोंमें अग्रगण्य हैं। अपने महान् बल और पराक्रमके लिये सर्वत्र विख्यात ये परम तेजस्वी पवन-पुत्र हनूमान्जी हैं। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और मेरे (प्रमुख) मन्त्री हैं। इनके अतिरिक्त हे रामजी ! नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ, मैंदव, गज, पनस, वलीमुख, दधिमुख, सुषेण, तार, तथा हनूमान्के पिता महाबली और परम धीर केशरी—ये मेरे प्रधान-प्रधान यूथपति हैं, सो मैंने आपको बता दिये ॥ ११-१५ ॥ ये सब बड़े महात्मा, वीर और इन्द्रके समान पराक्रमी हैं; तथा इनमेंसे प्रत्येक करोड़ों वानरोंके यूथका अधिपति है ॥ १६ ॥ ये सभी आपके आज्ञाकारी और देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये वालीके पुत्र परम विख्यात श्रीमान् अंगदजी हैं ॥ १७ ॥ ये भी वालीके समान ही बलवान् और राक्षसदलका दलन करनेवाले हैं। इस प्रकार ये सब तथा और भी बहुत-से वानर-वीर आपके लिये प्राण निछावर करनेको उद्यत हैं ॥१८॥ ये पर्वत-शिखर लेकर लड़ा करते हैं और शत्रु का नाश करनेमें बड़े कुशल हैं। हे रघुश्रेष्ठ ! ये सब आपके अधीन हैं, आप इन्हें इच्छानुसार आज्ञा दीजिये” ॥१९॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरकर सुग्रीवको हृदय लगा लिया और कहा—"सुग्रीव ! तुम मेरे कार्यकी कठिनताके विषयमें जानते ही हो ॥ २० ॥ यदि तुम ठीक समझो तो इन्हें यथायोग्य जानकीजीकी खोजके लिये नियुक्त कर दो।" रामका यह वचन सुनकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने प्रसन्न होकर बहुत-से बलवान् वानरोंको सीताकी खोजके लिये भेजा। इस प्रकार तुरन्त ही समस्त दिशाओंमें अनेकों वानरोंको भेजकर दक्षिण-दिशामें अधिक प्रयत्नके साथ महाबली युवराज अंगद, जाम्बवान्, हनूमान्, नल, सुषेण, शरभ, मैंद और द्विविद आदिको भेजा तथा उनसे इस प्रकार कहा—॥२१-२४॥ "मेरी आज्ञासे तुम सब लोग बड़े प्रयत्नसे शुभलक्षणा जानकीजीकी खोज करो और एक मासके भीतर ही लौट आओ ॥ २५॥