भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८३


सीतामदृष्ट्वा यदि वो मासादूर्ध्वं दिनं भवेत् ।
तदा प्राणान्तिकं दण्डं मत्तः प्राप्स्यथ वानराः ॥२६॥

इति प्रस्थाप्य सुग्रीवो वानरान् भीमविक्रमान् ।
रामस्य पार्श्वे श्रीरामं नत्वा चोपविवेश सः ॥२७॥

गच्छन्तं मारुतिं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत् ।
अभिज्ञानार्थमेतन्मे अङ्गुलीयकमुत्तमम् ॥२८॥
मन्नामाक्षरसंयुक्तं सीतायै दीयतां रहः ।
अस्मिन् कार्ये प्रमाणं हि त्वमेव कपिसत्तम ॥
जानामि सत्त्वं ते सर्वं गच्छ पन्थाः शुभस्तव ॥२९॥

एवं कपीनां राज्ञा ते विसृष्टाः परिमार्गणे ।
सीताया अङ्गदमुखा बभ्रमुस्तत्र तत्र ह ॥३०॥

भ्रमन्तो विन्ध्यगहने ददृशुः पर्वतोपमम् ।
राक्षसं भीषणाकारं भक्षयन्तं मृगान् गजान् ॥३१॥

रावणोऽयमिति ज्ञात्वा केचिद्वानरपुङ्गवाः ।
जघ्नुः किलकिलाशब्दं मुञ्चन्तो मुष्टिभिः क्षणात् ॥३२॥

नायं रावण इत्युक्त्वा ययुरन्यन्महद्वनम् ।
तृषार्ताः सलिलं तत्र नाविन्दन् हरिपुङ्गवाः ॥३३॥

विभ्रमन्तो महारण्ये शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ।
ददृशुर्गह्वरं तत्र तृणगुल्मावृतं महत् ॥३४॥

आर्द्रपक्षान् क्रौञ्चहंसान्निःसृतान्ददृशुस्ततः ।
अत्रास्ते सलिलं नूनं प्रविशामो महागुहाम् ॥३५॥

इत्युक्त्वा हनुमानग्रे प्रविवेश तमन्वयुः ।
सर्वे परस्परं धृत्वा बाहून्बाहुभिरुत्सुकाः ॥३६॥

अन्धकारे महद्दूरं गत्वाऽपश्यन् कपीश्वराः ।
जलाशयान्मणिनिभतोयान् कल्पद्रुमोपमान् ॥३७॥


यदि सीताजीको बिना देखे तुम्हें एक माससे एक दिन भी अधिक हो जायगा तो हे वानरो ! याद रखो, तुम्हें मेरे हाथसे प्राणान्त-दण्ड भोगना पड़ेगा" ॥ २६ ॥

उन महापराक्रमी वानरोंको इस प्रकार भेजकर सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम कर उनके पास जा बैठे ॥ २७ ॥ उस समय पवन-नन्दन हनूमान्‌को जाते देख श्रीरघुनाथजीने कहा—"हे कपिश्रेष्ठ ! तुम मेरी यह अँगूठी ले जाओ, इसपर मेरे नामाक्षर गुदे हुए हैं। इसे अपने परिचयके लिये तुम एकान्तमें सीताजीको देना । हे कपिश्रेष्ठ ! इस कार्यमें तुम्हीं समर्थ हो । मैं तुम्हारा बुद्धिबल अच्छी तरह जानता हूँ। अच्छा, जाओ । तुम्हारा मार्ग कल्याणमय हो" ॥ २८-२९॥

इस प्रकार वानरराज सुग्रीवके भेजे हुए वे अंगदादि वानरगण सीताजीकी खोज करते हुए पृथिवीपर जहाँ-तहाँ विचरने लगे ॥ ३० ॥ घूमते-घूमते उन्होंने विन्ध्याचलके गहन वनमें एक पर्वताकार भयंकर राक्षस देखा, जो जंगलके मृग और हाथियोंको पकड़-पकड़कर खा रहा था ॥ ३१ ॥ कुछ वानरोंने यह समझकर कि 'यही रावण है' बड़ा किलकिला-शब्द करते हुए उसे एक क्षणमें ही घूँसोंसे मार डाला ॥ ३२ ॥ फिर ( उसे इतनी सुगमतासे मरा हुआ देख-कर ) 'यह रावण नहीं है' ऐसा कहते हुए वे एक दूसरे घोर वनमें गये । वहाँ उन्हें बड़ी प्यास लगी किन्तु जल कहीं भी दिखायी न देता था ॥ ३३ ॥

उस भयंकर वनमें घूमते-घूमते उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये; तब उन्होंने वहाँ तृण, गुल्म और लता आदिसे ढँकी हुई एक विशाल गुहा देखी ॥ ३४ ॥ उसमेंसे उन्होंने भीगे हुए पंखोंवाले क्रौञ्च और हंसों-को निकलते देखा । तब यह कहकर कि 'चलो इस गुहामें चलें, इसमें अवश्य जल होगा' सबसे आगे हनूमान्‌जीने उसमें प्रवेश किया, उनके ही पीछे अन्य सब वानर भी एक दूसरेकी बाँहमें बाँह डालकर उत्सुकतापूर्वक उसमें घुस गये ॥ ३५-३६ ॥

बहुत दूरतक अन्धकारहीमें जानेके अनन्तर उन वानरोंने देखा किं वहाँ ( स्फटिक ) मणिके समान