अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १८४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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वृक्षान्पक्वफलैर्नम्राम्धुद्रोणसमन्वितान् ।<br>गृहान् सर्वगुणोपेतान् मणिवस्त्रादिपूरितान् ॥३८॥<br><br>दिव्यभक्ष्यान्नसहितान्मानुषैः परिवर्जितान् ।<br>विस्मितास्तत्र भवने दिव्ये कनकविष्टरे ॥३९॥<br><br>प्रभया दीप्यमानां तु ददृशुः स्त्रियमेककाम् ।<br>ध्यायन्तीं चीरवसनां योगिनीं योगमास्थिताम् ४०<br><br>प्रणेमुस्तां महाभागां भक्त्या भीत्या च वानराः ।<br>दृष्ट्वा तान्वानरान्देवी प्राह यूयं किमागताः॥४१॥<br><br>कुतो वा कस्य दूता वा मत्स्थानं किं प्रधर्षथ ।<br>तच्छ्रुत्वा हनुमान्प्राह शृणु वक्ष्यामि देवि ते ॥४२॥<br><br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथः प्रभुः ।<br>तस्य पुत्रो महाभागो ज्येष्ठो राम इति श्रुतः ॥४३॥<br><br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य सभार्यः सानुजो वनम् ।<br>गतस्तत्र हृता भार्या तस्य साध्वी दुरात्मना ॥४४॥<br><br>रावणेन ततो रामः सुग्रीवं सानुजो ययौ ।<br>सुग्रीवो मित्रभावेन रामस्य प्रियवल्लभाम् ॥४५॥<br><br>मृगयध्वमिति प्राह ततो वयमुपागताः ।<br>ततो वनं विचिन्वन्तो जानकीं जलकाङ्क्षिणः॥४६॥<br><br>प्रविष्टा गह्वरं घोरं दैवादत्र समागताः ।<br>त्वं वा किमर्थमत्रासि का वा त्वं वद नः शुभे॥४७॥<br><br>योगिनी च तथा दृष्ट्वा वानरान् प्राह हृष्टधीः ।<br>यथेष्टं फलमूलानि जग्ध्वा पीत्वाऽमृतं पयः ॥४८॥<br><br>आगच्छत ततो वक्ष्ये मम वृत्तान्तमादितः ।<br>तथेति भुक्त्वा पीत्वा च हृष्टास्ते सर्ववानराः ॥४९॥ | स्वच्छ जलसे पूर्ण कई सरोवर हैं; उनके पास ही पके फलोंके भारसे झुके हुए कल्पतरुके समान सुन्दर वृक्ष हैं जिनमें शहदके छत्ते लगे हुए हैं। पास ही, मणिमय वस्त्रालंकारोंसे युक्त और दिव्य भक्ष्य-भोज्य आदि सामग्रियोंसे पूर्ण सर्वगुणसम्पन्न निर्जन भवन हैं। उनमेंसे एक दिव्य भवनमें उन्होंने अति आश्चर्यचकित हो एक रमणीको अकेली सुवर्ण-सिंहासनपर विराजमान देखा । वह सुन्दरी योगाभ्यासमें तत्पर एक योगिनी थी, अपने तेजसे वह उस स्थानको प्रकाशित कर रही थी तथा शरीरपर चीर-वस्त्र धारण किये उस समय ध्यान कर रही थी ॥३७-४०॥<br><br>उस महाभागा युवतीको देखकर वानरोंने भय और प्रीतिसे उसे प्रणाम किया । तब उस देवीने उनकी ओर देखकर कहा—"तुमलोग क्यों और कहाँसे आये हो ? तुम किसके दूत हो ? तथा मेरे स्थानको क्यों भ्रष्ट कर रहे हो ?" यह सुनकर हनूमान्जीने कहा—"देवि ! मैं आपसे सब वृत्तान्त निवेदन करता हूँ, सुनिये—॥ ४१-४२ ॥ परम ऐश्वर्यसम्पन्न महाराज दशरथ अयोध्याके अधिपति थे । उनके महा भाग्यशाली ज्येष्ठ पुत्र राम नामसे विख्यात हैं ॥ ४३ ॥ वे अपने पिताकी आज्ञा मानकर अपनी भार्या और छोटे भाईके सहित वनमें आये थे, यहाँ उनकी परम साध्वी पत्नीको दुरात्मा रावण हर ले गया । तब वे अपने अनुजके सहित वानरराज सुग्रीवके पास आये । सुग्रीवने उनसे मित्र-भाव हो जानेके कारण हमें यह आज्ञा दी है कि तुमलोग रामकी प्राणप्रियाकी खोज करो । अतः हम वहींसे आये हैं। यहाँ वनमें जानकीको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हमें जलकी आवश्यकता हुई । इससे हम इस भयंकर कन्दरामें घुसे और दैवयोगसे यहाँ आ गये । हे शुभे ! आप यहाँ किसलिये रहती हैं और कौन हैं ? यह हमें बताइये" ॥ ४४-४७ ॥<br><br>यह सब देखकर उस योगिनीको बड़ा हर्ष हुआ और वह वानरोंसे बोली—"पहले तुम इच्छानुसार फल-मूलादि खाकर अमृतमय जल पान करो । फिर मेरे पास आना, तब मैं आरम्भसे तुम्हें अपना सब वृत्तान्त सुनाऊँगी ।" तब उन वानरोंने 'बहुत अच्छा' कह यथेष्ट फल-मूलादि खाकर जल पीया और फिर |