भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८५


देव्याः समीपं गत्वा ते बद्धाञ्जलिपुटाः स्थिताः ।
ततः प्राह हनूमन्तं योगिनी दिव्यदर्शना ॥५०॥
हेमा नाम पुरा दिव्यरूपिणी विश्वकर्मणः ।
पुत्री महेशं नृत्येन तोषयामास भामिनी ॥५१॥
तुष्टो महेशः प्रददाविदं दिव्यपुरं महत् ।
अत्र स्थिता सा सुदती वर्षाणामयुतायुतम् ॥५२॥
तस्या अहं सखी विष्णुतत्परा मोक्षकाङ्क्षिणी ।
नाम्ना स्वयम्प्रभा दिव्यगन्धर्वतनया पुरा ॥५३॥
गच्छन्ती ब्रह्मलोकं सा मामाहेदं तपश्चर ।
अत्रैव निवसन्ती त्वं सर्वप्राणिविवर्जिते ॥५४॥
त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणोऽव्ययः ।
भूभारहरणार्थाय विचरिष्यति कानने ॥५५॥
मार्गन्तो वानरास्तस्य भार्यामायान्ति ते गुहाम् ।
पूजयित्वाऽथ तान् नत्वा रामं स्तुत्वा प्रयत्नतः ॥५६॥
यातासि भवनं विष्णोर्योगिगम्यं सनातनम् ।
इतोऽहं गन्तुमिच्छामि रामं द्रष्टुं त्वरान्विता ॥५७॥
यूयं पिदध्वमक्षीणि गमिष्यथ वहिर्गुहाम् ।
तथैव चक्रुस्ते वेगाद्गताः पूर्वस्थितं वनम् ॥५८॥
साऽपि त्यक्त्वा गुहां शीघ्रं ययौ राघवसन्निधिम् ।
तत्र रामं ससुग्रीवं लक्ष्मणं च ददर्श ह ॥५९॥
कृत्वा प्रदक्षिणं रामं प्रणम्य बहुशः सुधीः ।
आह गद्गदया वाचा रोमाञ्चिततनूरुहा ॥६०॥
दासी तवाहं राजेन्द्र दर्शनार्थमिहागता ।
बहुवर्षसहस्राणि तप्तं मे दुष्करं तपः ॥६१॥
गुहायां दर्शनार्थं ते फलितं मेऽद्य तत्तपः ।


प्रसन्नचित्तसे उस देवीके पास आकर हाथ जोड़कर खड़े हो गये।

तदनन्तर वह दिव्यदर्शना योगिनी हनूमान्‌जीसे इस प्रकार कहने लगी—॥४८-५०॥ "पूर्वकालमें विश्वकर्माकी हेमा नामवाली एक दिव्यरूपिणी पुत्री थी। उस सुन्दरीने अपने नृत्यसे श्रीमहादेवजीको प्रसन्न किया ॥५१॥ प्रसन्न होनेपर श्रीशंकरने उसे यह विशाल और दिव्य नगर (रहनेके लिये) दिया। यहाँ वह सुन्दर दाँतोंवाली हजारों वर्ष रही ॥५२॥ मैं उसकी सखी दिव्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हूँ। मेरा नाम स्वयंप्रभा है। मुझे मोक्षकी इच्छा है अतः मैं सर्वदा विष्णु भगवान्‌की उपासनामें तत्पर रहती हूँ। पूर्वकालमें, जब वह ब्रह्मलोकको जाने लगी तब उसने मुझसे कहा कि 'तू सब प्रकारके प्राणियोंसे रहित इस स्थानमें ही रहकर तपस्या कर ॥५३-५४॥ त्रेतायुगमें साक्षात् अव्यय नारायण राजा दशरथके यहाँ जन्म लेकर पृथिवीका भार उतारनेके लिये वनमें विचरेंगे ॥५५॥ उनकी भार्याको ढूँढ़ते हुए कुछ वानर तेरी गुहामें आयेंगे। उनका भली प्रकार सत्कार कर तू रामचन्द्रजीकी (उनके पास जाकर) प्रयत्नपूर्वक वन्दना और स्तुति करके भगवान् विष्णुके नित्यधामको चली जायगी, जो योगियोंको ही प्राप्त होने योग्य है।' अतः अब मैं तुरन्त ही भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये जाना चाहती हूँ ॥५६-५७॥ तुमलोग अपनी-अपनी आँखें मूँद लो, अभी गुहाके बाहर पहुँच जाओगे।"

उन्होंने ऐसा ही किया और तुरन्त ही पहले वनमें पहुँच गये ॥५८॥ इधर वह योगिनी भी उस गुहाको छोड़कर तत्काल श्रीरघुनाथजीके पास आयी और वहाँ सुग्रीव तथा लक्ष्मणजीके सहित उनका दर्शन किया ॥५९॥

उस बुद्धिमतीने श्रीरामचन्द्रजीकी प्रदक्षिणा कर उन्हें बारम्बार प्रणाम किया और फिर पुलकित-तनु होकर गद्गदवाणीसे इस प्रकार कहने लगी—॥६०॥ "हे राजाधिराज ! मैं आपकी दासी आपके दर्शनोंके लिये यहाँ आयी हूँ; मैंने आपका दर्शन पानेके लिये ही गुहामें रहकर सहस्रों वर्षोंसे बड़ी कठोर तपस्या की है। आज मेरा वह तप सफल हो गया। अहो !

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