भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१८६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ६

अद्य हि त्वां नमस्यामि मायायाः परतः स्थितम्६२<br>सर्वभूतेषु चालक्ष्यं बहिरन्तरवस्थितम् ।<br>योगमायाजवनिकाऽऽच्छन्नो मानुषविग्रहः ॥६३॥<br>न लक्ष्यसेऽज्ञानदृशां शैलूष इव रूपधृक् ।<br>महाभागवतानां त्वं भक्तियोगविधित्सया ॥६४॥<br>अवतीर्णोऽसि भगवन् कथं जानामि तामसी ।<br>लोके जानातु यः कश्चित्तव तत्त्वं रघूत्तम ॥६५॥<br>ममैतदेव रूपं ते सदा भातु हृदालये ।<br>राम ते पादयुगलं दर्शितं मोक्षदर्शनम् ॥६६॥<br>अदर्शनं भवार्णानां सन्मार्गपरिदर्शनम् ।<br>धनपुत्रकलत्रादिविभूतिपरिदर्पितः ।<br>अकिञ्चनधनं त्वाद्य नाभिधातुं जनोऽर्हति ॥६७॥<br>निवृत्तगुणमार्गाय निष्किञ्चनधनाय ते ॥६८॥<br>नमः स्वात्माभिरामाय निर्गुणाय गुणात्मने ।<br>कालरूपिणमीशानमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥६९॥<br>समं चरन्तं सर्वत्र मन्ये त्वां पुरुषं परम् ।<br>देव ते चेष्टितं कश्चिन्न वेद नृविडम्बनम् ॥७०॥<br>न तेऽस्ति कश्चिद्दयितो द्वेष्यो वाऽपर एव च ।<br>त्वन्मायापिहितात्मानस्त्वां पश्यन्ति तथाविधम् ॥<br>अजस्याकर्तुरीशस्य देवतिर्यङ्नरादिषु ।<br>जन्मकर्मादिकं यद्यत्तदत्यन्तविडम्बनम् ॥७२॥<br>त्वामाहुरक्षरं जातं कथाश्रवणसिद्धये ।<br>केचित्कोसलराजस्य तपसः फलसिद्धये ॥७३॥ | आज ( यह कैसा शुभ दिन है कि) मैं साक्षात् मायातीत तथा समस्त भूतोंमें अलक्षितभावसे बाहर-भीतर विराजमान आप परमेश्वरको प्रणाम कर रही हूँ। आप अपने शुद्धस्वरूपको योगमायासे आवृत कर मनुष्य-शरीरमें प्रकट हुए हैं। अतः जिस प्रकार मायिक-रूप धारण करनेवाले मायावीको साधारण पुरुष नहीं देख सकते उसी प्रकार आपके शुद्धस्वरूपको अज्ञानी लोग नहीं देख सकते । हे भगवन् ! आपने महान् भगवद्भक्तोंके भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही अवतार लिया है। मैं तमोगुणी बुद्धिवाली आपको कैसे जान सकती हूँ ? हे रघुश्रेष्ठ ! संसारमें जो कोई आपका परमतत्त्व जानते हों वे उसे भले ही जाना करें, मेरे हृदयभवनमें तो सदा आपका यही रूप विराजमान रहे। हे राम ! आज मुझे आपके उन मोक्षदायक चरणकमलोंका दर्शन हुआ है, जो संसाररूपी सरिता-से पार करनेवाले और सन्मार्गका ज्ञान करानेवाले हैं ।<br>“हे आदिपुरुष ! जो मनुष्य धन, पुत्र, कलत्र और विभूति आदिके मदसे उन्मत्त हो रहा है वह आपकी स्तुति नहीं कर सकता, क्योंकि आप तो अकिञ्चनोंके ही सर्वस्व हैं ॥ ६१-६७॥ जो गुणोंकी पहुँचसे बाहर, निष्किञ्चनोंके धन, अपने आत्मस्वरूपमें ही रमण करनेवाले और (स्वरूपसे) निर्गुण तथा (आरोपसे) सगुण हैं, उन आपको मैं बारम्बार प्रणाम करती हूँ। मैं आपको कालरूपसे सबका नियन्ता, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, सर्वत्र समानभावसे व्याप्त तथा परात्पर पुरुष मानती हूँ। हे देव ! मानव-चरित्रोंका अनुकरण करते हुए आप जो-जो लीलाएँ करते हैं उनका मर्म कोई भी नहीं जान सकता ॥ ६८-७० ॥ प्रभो ! आपका न कोई प्रिय है, न अप्रिय है और न उदासीन है। आपकी मायासे जिनके अन्तःकरण आवृत हैं वे ही लोग (अपनी-अपनी भावनाके अनुसार) आपको वैसा देखते हैं ॥ ७१ ॥ आप अजन्मा, अकर्ता और ईश्वर हैं, आपके जो देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि योनियोंमें जन्म और कर्म होते हैं वह आपकी महान् लीला ही है ॥ ७२ ॥<br>“कहते हैं, आप अविनाशी ईश्वरने ( अपनी कीर्ति फैलाकर ) कथा-श्रवणकी सिद्धिके लिये ही अवतार लिया। कोई यह भी कहते हैं कि कोसलाधिपति