भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड [ १८७


कौसल्याया प्रार्थ्यमानं जातमाहुः परे जनाः।<br>दुष्टराक्षसभूभारहरणार्थार्थितो विभुः ॥७४॥<br>ब्रह्मणा नररूपेण जातोऽयमिति केचन ।<br>शृण्वन्ति गायन्ति च ये कथास्ते रघुनन्दन ॥७५॥<br>पश्यन्ति तव पादाब्जं भवार्णवसुतारणम् ।<br>त्वन्मायागुणबद्धाऽहं व्यतिरिक्तं गुणाश्रयम् ॥७६॥<br>कथं त्वां देव जानीयां स्तोतुं वाऽविषयं विभुम् ।<br>नमस्यामि रघुश्रेष्ठं वाणासनशरान्वितम् ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सुग्रीवादिभिरन्वितम् ॥७७॥महाराज दशरथको उनकी तपस्याका फल देनेके लिये आपने जन्म लिया है ॥ ७३ ॥ किन्हीं लोगोंका कहना है कि आप कौसल्याजीकी प्रार्थनासे प्रकट हुए हैं; तथा, किन्हीं-किन्हींका मत ऐसा भी है कि ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर भूमिके भारभूत राक्षसोंका नाश करनेके लिये ही आप सर्वव्यापक होते हुए भी मनुष्यरूपसे अवतीर्ण हुए हैं। हे रघुनन्दन ! जो लोग आपकी कथाओंको सुनेंगे या कहेंगे वे अवश्य ही संसार-सागरको पार करनेके लिये नौकारूप आपके चरण-कमलोंका दर्शन करेंगे। हे देव ! मैं आपकी मायाके गुणोंके वशीभूत हूँ, फिर उन गुणोंसे अत्यन्त पृथक् और उनके आश्रयरूप आपको मैं कैसे जान सकती हूँ ? ऐसे ही वाणीके विषय न होनेके कारण मैं आप विभुकी स्तुति भी कैसे कर सकती हूँ ? अतः भाई लक्ष्मण और सुग्रीवादि (पार्षदों ) के सहित आप धनुर्बाण-धारी रघुश्रेष्ठको मैं केवल प्रणाम करती हूँ” ॥७४–७७॥
एवं स्तुतो रघुश्रेष्ठः प्रसन्नः प्रणताघहृत् ।<br>उवाच योगिनीं भक्तां किं ते मनसि काङ्क्षितम् ॥७८॥उसके इस प्रकार स्तुति करनेसे प्रणतपापापहारी श्रीरघुनाथजी अति प्रसन्न हुए और उस अनन्यभक्ता योगिनीसे बोले—"तेरी हार्दिक इच्छा क्या है ?" ॥७८॥
सा प्राह राघवं भक्त्या भक्तिं ते भक्तवत्सल ।<br>यत्र कुत्रापि जाताया निश्चलां देहि मे प्रभो ॥७९॥<br>त्वद्भक्तेषु सदा सङ्गो भूयान्मे प्राकृतेषु न ।<br>जिह्वा मे रामरामेति भक्त्या वदतु सर्वदा ॥८०॥<br>मानसं श्यामलँ रूपं सीतालक्ष्मणसंयुतम् ।<br>धनुर्बाणधरं पीतवाससं मुकुटोज्ज्वलम् ॥८१॥<br>अङ्गदैर्नूपुरैर्मुक्ताहारैः कौस्तुभकुण्डलैः ।<br>भान्तं स्मरतु मे राम वरं नान्यं वृणे प्रभो ॥८२॥उसने अति भक्तिपूर्वक श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे भक्तवत्सल प्रभो ! मैं जहाँ कहीं भी जन्म लूँ आप मुझे अपनी अविचल भक्ति दीजिये ॥७९॥ प्रत्येक जन्ममें मेरा संग आपके भक्तोंसे ही हो, संसारी लोगोंसे न हो और मेरी जिह्वा सदा भक्तिपूर्वक 'राम-राम' ऐसा रटा करे ॥ ८० ॥ और हे राम ! मेरा मन आपकी उस शोभायमान श्यामल मूर्त्तिका श्रीसीताजी और लक्ष्मणके सहित सर्वदा चिन्तन करता रहे जो धनुष-बाण धारण किये हुए है तथा जो पीताम्बरधारी, मुकुट-विभूषित एवं भुजबन्द, नूपुर, मोतियोंकी माला, कौस्तुभ-मणि और कुण्डलोंसे सुशोभित है। हे प्रभो ! इसके सिवा मैं और कोई वर नहीं माँगती ॥ ८१-८२ ॥
श्रीराम उवाच<br>भवत्वेवं महाभागे गच्छ त्वं बदरीवनम् ।<br>तत्रैव मां स्मरन्ती त्वं त्यक्त्वेदं भूतपञ्चकम् ।<br>मामेव परमात्मानमचिरात्प्रतिपद्यसे ॥८३॥श्रीरामचन्द्रजी बोले—हे महाभागे ! ऐसा ही होगा। अब तू बद्रिकाश्रमको जा, वहाँ मेरा स्मरण करती हुई तू शीघ्र ही इस पाञ्चभौतिक शरीरको छोड़कर मुझ परमात्माको ही प्राप्त हो जायगी ॥ ८३ ॥