भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१८८अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

श्रुत्वा रघूत्तमवचोऽमृतसारकल्पं<br>  गत्वा तदैव बदरीतरुखण्डजुष्टम् ।<br>तीर्थं तदा रघुपतिं मनसा स्मरन्ती<br>  त्यक्त्वा कलेवरमवाप परं पदं सा ॥८४॥रघुनाथजीके ये अमृतके समान मधुर वचन सुनकर स्वयंप्रभा उसी समय पुण्यक्षेत्र बद्रिकाश्रमको चली गयी, जहाँ बहुत-से बेरीके वृक्ष लगे हुए हैं। वहाँ अपने अन्तःकरणमें श्रीरघुनाथजीका स्मरण करती हुई वह अन्तमें शरीर-पात होनेपर परमपदको प्राप्त हुई ॥८४॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तम सर्ग

वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पातिसे भेंट।

श्रीमहादेव उवाच
अथ तत्र समासीना वृक्षखण्डेषु वानराः ।<br>चिन्तयन्तो विमुह्यन्तः सीतामार्गणकर्शिताः ॥१॥**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर, सीताजीकी खोजसे थके हुए वानरगण उस गुहाके समीप सघन वृक्षोंवाले स्थानपर बैठकर (सीताको न पानेके कारण) मोहित होकर आपसमें सोचने लगे ॥ १ ॥
तत्रोवाचाङ्गदः कांश्चिद्वानरान् वानरर्षभः ।<br>भ्रमतां गह्वरेऽस्माकं मासो नूनं गतोऽभवत् ॥२॥उस समय वानरश्रेष्ठ अंगदजीने कुछ वानरोंसे कहा—"मालूम होता है इस कन्दरामें घूमते-घूमते हमारा एक मास अवश्य पूरा हो गया ॥ २ ॥
सीता नाधिगतास्माभिर्न कृतं राजशासनम् ।<br>यदि गच्छाम किष्किन्धां सुग्रीवोऽस्मान् हनिष्यतिपरन्तु अभीतक हमें सीताजी नहीं मिलीं । हम वानरराज सुग्रीवकी आज्ञाका पालन नहीं कर सके । अब यदि हम किष्किन्धापुरीको लौट चलें तो वह हमें अवश्य मार डालेगा ॥ ३ ॥
विशेषतः शत्रुसुतं मां मिषाच्चिहनिष्यति ।<br>मयि तस्य कुतः प्रीतिरहं रामेण रक्षितः ॥ ४ ॥विशेषतः, अपने शत्रुके पुत्र मुझे तो वह इस मिषसे अवश्य ही मार डालेगा । मुझमें उसका प्रेम कहाँ हो सकता है ? मेरी रक्षा तो श्रीरामचन्द्रजीने ही की है ॥ ४ ॥
इदानीं रामकार्यं मे न कृतं तन्मिषं भवेत् ।<br>तस्य मद्हनने नूनं सुग्रीवस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥अब मुझसे श्रीरघुनाथजीका कार्य नहीं सधा; अतः मेरा वध करनेके लिये उस दुरात्मा सुग्रीवको निश्चय ही यह अच्छा बहाना मिल जायगा ॥ ५ ॥
मातृकल्पां भ्रातृभार्यां पापात्मानुभवत्यसौ ।<br>न गच्छेयमतः पार्श्वं तस्य वानरपुङ्गवाः ॥ ६ ॥<br>त्यक्ष्यामि जीवितं चात्र येन केनापि मृत्युना ।वह पापात्मा अपने बड़े भाईकी पत्नीको, जो उसकी माताके समान है, भोगता है; अतः हे वानरश्रेष्ठो ! मैं अब उसके पास तो जाऊँगा नहीं ॥ ६ ॥ किसी-न-किसी उपायसे यहीं अपने जीवनका अन्त कर दूँगा ।”
इत्यश्रुनयनं केचिद्दृष्ट्वा वानरपुङ्गवाः ॥ ७ ॥<br>व्यथिताः साश्रुनयना युवराजमथाब्रुवन् ॥ ८ ॥इस प्रकार उन्हें नेत्रोंमें जल भरे देखकर कितने ही प्रमुख वानरोंको बड़ा खेद हुआ और उन्होंने आँखोंमें आँसू भरकर युवराजसे कहा—॥ ७-८ ॥
किमर्थं तव शोकोऽत्र वयं ते प्राणरक्षकाः ।<br>भवामो निवसामोऽत्र गुहायां भयवर्जिताः ॥ ९ ॥“आप इतना शोक क्यों करते हैं, हम सब आपके प्राणोंकी रक्षा करेंगे और निर्भय होकर इस गुहामें ही रहेंगे ॥ ९ ॥ इसमें जो नगर है वह अमरावतीपुरीके