अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ७] किष्किन्धाकाण्ड १८९
| सर्वसौभाग्यसहितं पुरं देवपुरोपमम् ।<br>शनैः परस्परं वाक्यं वदतां मारुतात्मजः ॥१०॥<br><br>श्रुत्वाऽऽङ्गदं समालिङ्गय प्रोवाच नयकोविदः ।<br>विचार्यते किमर्थं ते दुर्विचारो न युज्यते ॥११॥<br><br>राज्ञोऽत्यन्तप्रियस्त्वं हि तारापुत्रोऽतिवल्लभः ।<br>रामस्य लक्ष्मणात्प्रीतिस्त्वयि नित्यं प्रवर्धते ॥१२॥<br><br>अतो न राघवाद्भीतिस्तव राज्ञो विशेषतः ।<br>अहं तव हिते सक्तो वत्स नान्यं विचारय ॥१३॥<br><br>गुहावासश्च निर्भेद्य इत्युक्तं वानरैस्तु यत् ।<br>तदेतद्रामवाणानामभेद्यं किं जगत्त्रये ॥१४॥<br><br>ये त्वां दुर्बोधयन्त्येते वानरा वानरर्षभ ।<br>पुत्रदारादिकं त्यक्त्वा कथं स्थास्यन्ति ते त्वया ॥१५॥<br><br>अन्यद्गुह्यतमं वक्ष्ये रहस्यं शृणु मे सुत ।<br>रामो न मानुषो देवः साक्षान्नारायणोऽव्ययः ॥१६॥<br><br>सीता भगवती माया जनसम्मोहकारिणी ।<br>लक्ष्मणो भुवनाधारः साक्षाच्छेषः फणीश्वरः ॥१७॥<br><br>ब्रह्मणा प्रार्थिताः सर्वे रक्षोगणविनाशने ।<br>मायामानुषभावेन जाता लोकैकरक्षकाः ॥१८॥<br><br>वयं च पार्षदाः सर्वे विष्णोर्वैकुण्ठवासिनः ।<br>मनुष्यभावमापन्ने स्वेच्छया परमात्मनि ॥१९॥<br><br>वयं वानररूपेण जातास्तस्यैव मायया ।<br>वयं तु तपसा पूर्वमाराध्य जगतां पतिम् ॥२०॥<br><br>तेनैवानुगृहीताः स्मः पार्षदत्वमुपागताः ।<br>इदानीमपि तस्यैव सेवां कृत्वैव मायया ॥२१॥<br><br>पुनर्वैकुण्ठमासाद्य सुखं स्थास्यामहे वयम् ।<br><br>इत्यङ्कदमथ आश्वास्य गता विन्ध्यं महाचलम् ॥२२॥ | समान समस्त सुख-सामग्रियोंसे सम्पन्न है।” इस प्रकार उनके आपसमें धीरे-धीरे कहे हुए ये शब्द नीतिनिपुण श्रीहनुमान्जीके कानोंमें पड़े तो उन्होंने अंगदजीको हृदयसे लगाकर कहा—“अंगद ! तुम ऐसी चिन्ता क्यों करते हो, तुम्हें किसी प्रकारकी दुर्भावना न करनी चाहिये। तुम ताराके अत्यन्त लाडिले लाल हो, अतः महाराज सुग्रीवको भी तुम बहुत प्रिय हो। और श्रीरामचन्द्रजी-की तो तुममें नित्यप्रति लक्ष्मणजीसे भी अधिकं प्रीति बढ़ती जाती है ॥ १०-१२॥ इसलिये तुम्हें श्रीरघुनाथजी या राजा सुग्रीवसे किसी प्रकारका खटका न होना चाहिये। और फिर मैं भी सब प्रकार तुम्हारा हित करनेमें तत्पर हूँ। अतः हे वत्स ! तुम किसी ऐसी-वैसी बातकी चिन्ता मत करो ॥ १३ ॥ और इन वानरोंने जो कहा कि 'गुहामें किसी प्रकारका खटका न होगा' सो त्रिलोकीमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भगवान् रामके बाणोंके लिये अभेद्य हो ? ॥ १४ ॥ हे कपिश्रेष्ठ ! जो वानरगण तुम्हें यह बुरी सलाह दे रहे हैं वे भी अपनी स्त्री और बालकोंको छोड़कर तुम्हारे साथ कैसे रह सकेंगे ? ॥ १५ ॥<br><br>इसके सिवा, बेटा ! एक अत्यन्त गुप्त रहस्य और बताता हूँ, सावधान होकर सुनो—भगवान् राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं वे साक्षात् निर्विकार नारायणदेव हैं ॥ १६ ॥ भगवती सीताजी जगन्मोहिनी माया हैं और लक्ष्मणजी त्रिभुवनाधार साक्षात् नागनाथ शेषजी हैं ॥ १७ ॥ ये सब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे राक्षसोंका नाश करनेके लिये माया-मानवरूपसे उत्पन्न हुए हैं। इनमेंसे प्रत्येक त्रिलोकीकी रक्षा करनेमें समर्थ है ॥ १८॥ हम सब भी वैकुण्ठलोकमें रहनेवाले भगवान् विष्णुके पार्षद हैं। जब परमात्माने अपनी इच्छासे मनुष्यरूप धारण किया तो हम भी उन्हींकी माया-शक्तिसे वानररूपसे उत्पन्न हो गये। पूर्वकालमें हमने तपस्याद्वारा श्रीजगदीश्वरकी आराधना की थी; तब उन्हींकी कृपासे हम उनके पार्षद हुए थे। अब भी हम मायाकी प्रेरणासे उन्हींकी सेवा करते हुए अन्तमें फिर वैकुण्ठमें जाकर आनन्दपूर्वक ( उन्हींके साथ ) रहेंगे।”<br><br>इस प्रकार अंगदजीको ढाँढस बँधाकर वे सब |