अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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विचिन्वन्तोऽथ शनकैर्जानकीं दक्षिणाम्बुधेः ।<br>तीरे महेन्द्राख्यगिरेः पवित्रं पादमाययुः ॥२३॥ | विन्ध्याचल पर्वतपर गये ॥ १९—२२ ॥ फिर धीरे-धीरे श्रीजानकीजीको खोजते हुए दक्षिण-समुद्रके तटपर महेन्द्रपर्वतकी पवित्र तराईमें पहुँचे ॥ २३ ॥ दृष्ट्वा समुद्रं दुष्पारमगाधं भयवर्धनम् ।<br>वानराः भयसन्त्रस्ताः किं कुर्म इति वादिनः ॥२४॥ | वहाँ पहुँचनेपर वे अपार, अगाध और भयको बढ़ानेवाले समुद्रको देखकर भयभीत हो गये और एक-दूसरेसे कहने लगे कि अब क्या करना चाहिये ? ॥२४॥ निषेधुरुदधेस्तीरे सर्वे चिन्तासमन्विताः ।<br>मन्त्रयामासुरन्योन्यमङ्गदाद्या महाबलाः ॥२५॥ | अंगद आदि समस्त महापराक्रमी वानर अति चिन्ता-ग्रस्त होकर समुद्रतटपर बैठ गये और आपसमें सलाह करने लगे—॥२५॥ भ्रमतो मे वने मासो गतोऽत्रैव गुहान्तरे ।<br>न दृष्टो रावणो वाऽद्य सीता वा जनकात्मजा ॥२६॥ | 'अहो ! वनमें घूमते-घूमते हमें एक मास तो उस गुहामें ही बीत गया । परन्तु रावण अथवा जनक-नन्दिनी सीताजीको हम अभीतक नहीं देख सके ॥ २६ ॥ सुग्रीवस्तीक्ष्णदण्डोऽस्मान्निहन्त्येव न संशयः ।<br>सुग्रीववधतोऽस्माकं श्रेयः प्रायोपवेशनम् ॥२७॥ | राजा सुग्रीव बड़ा दुर्दण्ड है, वह हमें निस्सन्देह मार डालेगा । सुग्रीवके हाथसे मरनेकी अपेक्षा तो प्रायोपवेशन ( अन्न-जल छोड़कर मर जाने) हीमें हमारा अधिक कल्याण है' ॥ २७ ॥ इति निश्चित्य तत्रैव दर्भानास्तीर्य सर्वतः ।<br>उपाविवेशुस्ते सर्वे मरणे कृतनिश्चयाः ॥२८॥ | ऐसा निर्णय करके वे सब जहाँ-तहाँ कुशा बिछाकर मरनेका निश्चय कर वहीं बैठ गये ॥ २८ ॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र महेन्द्राद्रिगुहान्तरात् ।<br>निर्गत्य शनकैरागाद्गृध्रः पर्वतसन्निभः ॥२९॥ | इसी समय महेन्द्रपर्वतकी कन्दरासे निकलकर वहाँ एक पर्वताकार गृध्र धीरे-धीरे चलकर आया ॥ २९ ॥ दृष्ट्वा प्रायोपवेशेन स्थितान्वानरपुङ्गवान् ।<br>उवाच शनकैर्गृध्रः प्राप्तो भक्ष्योऽद्य मे बहुः ॥३०॥ | उन बड़े-बड़े वानरोंको प्रायोपवेशनके लिये बैठे देख वह मन्द स्वरमें कहने लगा—"आज मुझे ( एक साथ ही ) बहुत-सा भक्ष्य प्राप्त हो गया ॥ ३० ॥ एकैकशः क्रमात्सर्वान् भक्ष्यामि दिनेदिने ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं वानरा भीतमानसाः ॥३१॥ | अब मैं इन सबको नित्यप्रति क्रमशः एक-एक करके खाऊँगा ।" भक्षयिष्यति नः सर्वानसौ गृध्रो न संशयः ।<br>रामकार्यं च नास्माभिः कृतं किञ्चिच्छरीश्वराः ॥३२॥ | गृध्रके ये वचन सुनकर वे समस्त वानर भयभीत होकर कहने लगे—॥ ३१ ॥ "अहो ! निस्सन्देह अब यह गृध्र हम सबको खा जायगा । हे वानरेश्वरगण ! हमसे न तो भगवान् रामका ही कुछ काम सधा और न सुग्रीवस्यापि च हितं न कृतं स्वात्मनामपि ।<br>वृथाऽनेन वधं प्राप्ता गच्छामो यमसादनम् ॥३३॥ | राजा सुग्रीवका या अपना ही कुछ हित हुआ; अब हम व्यर्थ इसके हाथसे मरकर यमलोकको जायेंगे ॥ ३२-३३ ॥ अहो जटायुर्धर्मात्मा रामस्यार्थे मृतः सुधीः ।<br>मोक्षं प्राप दुरावापं योगिनामप्यरिन्यमः ॥३४॥ | अहो ! धर्मात्मा जटायु धन्य है जिस बुद्धिमान्ने श्रीरामके कार्यमें अपने प्राण दे दिये । देखो, उस शत्रुदमनने वह मोक्षपद प्राप्त कर लिया जो योगियोंको भी दुर्लभ है" ॥ ३४ ॥ सम्पातिस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा वानरभाषितम् ।<br>के वा यूयं मम भ्रातुः कर्णपीयूषसन्निभम् ॥३५॥ | वानरोंके कहे हुए इस वाक्यको सुनकर सम्पाति बोला—"हे कपिश्रेष्ठगण ! आपलोग कौन हैं जो आपसमें, मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लगने-