अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
| १७६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ५ |
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चन्द्रोऽपि भानुवद्भाति मम चन्द्राननां विना ॥६॥
चन्द्र त्वं जानकीं स्पृष्ट्वा करैर्मां स्पृश शीतलैः । सुग्रीवोऽपि दयाहीनो दुःखितं मां न पश्यति ॥७॥
राज्यं निष्कण्टकं प्राप्य स्त्रीभिः परिवृतो रहः । कृतघ्नो दृश्यते व्यक्तं पानासक्तोऽतिकामुकः ॥८॥
नायाति शरदं पश्यन्नपि मार्गयितुं प्रियाम् । पूर्वोष्कारिणं दुष्टः कृतघ्नो विस्मृतो हि माम् ॥९॥
हन्मि सुग्रीवमप्येवं सपुरं सहबान्धवम् । वाली यथा हतो मेऽद्य सुग्रीवोऽपि तथा भवेत् ॥१०॥
इति रुष्टं समालोक्य राघवं लक्ष्मणोऽब्रवीत् । इदानीमेव गत्वाहं सुग्रीवं दुष्टमानसम् ॥११॥
मामाज्ञापय हत्वा तमायास्ये राम तेऽन्तिकम् । इत्युक्त्वा धनुरदाय स्वयं तूणीरमेव च ॥१२॥
गन्तुमभ्युद्यतं वीक्ष्य रामो लक्ष्मणमब्रवीत् । न हन्तव्यस्त्वया वत्स सुग्रीवो मे प्रियः सखा ॥१३॥
किन्तु भीषय सुग्रीवं वालिबत्त्वं हनिष्यसे । इत्युक्त्वा शीघ्रमादाय सुग्रीवप्रतिभाषितम् ॥१४॥
आगत्य पश्चाद्यत्कार्यं तत्करिष्याम्यसंशयम् । तथेति लक्ष्मणोऽगच्छत्त्वरितो भीमविक्रमः ॥१५॥
किष्किन्धां प्रति कोपेन निर्दहन्निव वानरान् । सर्वज्ञो नित्यलक्ष्मीको विज्ञानात्मापि राघवः ॥१६॥
सीतामनुशुशोचार्त्तः प्राकृतः प्राकृतामिव । बुद्ध्यादिसाक्षिणस्तस्य मायाकार्यातिवर्तिनः ॥१७॥
रागादिरहितस्यास्य तत्कार्यं कथमुद्भवेत् ।
मुझे चन्द्रमा भी सूर्यके समान (तापप्रद) जान पड़ता है ॥३-६॥ हे चन्द्र ! तुम अपनी किरणोंसे पहले जानकीको स्पर्श करो, (उनका स्पर्श करनेसे वे शीतल हो जायँगी) फिर उन शीतल किरणोंसे मुझे स्पर्श करना । हाय ! सुग्रीव भी कैसा निर्दयी हो गया है जो मुझ दुखियाकी ओर नहीं झाँकता ॥७॥ अहो ! निष्कण्टक राज्य पाकर मद्यपीनेमें आसक्त हुआ वह कामकिंकर स्त्रियोंसे घिरा एकान्तमें पड़ा रहता है। इससे वह स्पष्ट ही बड़ा कृतघ्न दीख पड़ता है ॥८॥ शरदऋतुका आगमन देखकर भी वह प्राणप्रिया सीताकी खोज करानेके लिये नहीं आया। मैंने उसका पहले उपकार किया है; तथापि वह दुष्ट कृतघ्न होकर मुझे भूल गया ॥९॥ (जिस प्रकार मुझे सीताको हर ले जानेवालेका नाश करना है) उसी प्रकार मैं सुग्रीवको भी उसके नगर और बन्धु-बान्धवोंके सहित मार डालूँगा । जैसे वाली मेरे हाथसे मारा गया वैसे ही आज सुग्रीव भी मारा जायगा” ॥१०॥
इस प्रकार रघुनाथजीको क्रुद्ध देखकर लक्ष्मणजी बोले— "हे राम ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी जाकर दुष्टचित्त सुग्रीवको मारकर आपके पास लौट आता हूँ।” ऐसा कह हाथमें धनुष और तरकश लेकर लक्ष्मणजीको अपने-आप ही जानेके लिये उद्यत देख श्रीरामचन्द्रजी बोले, "वत्स ! सुग्रीव मेरा प्यारा मित्र है, तुम उसे मारना मत ॥११-१३॥ केवल यह कहकर कि 'तू वालीके समान मारा जायगा' उसे डराना और फिर शीघ्र ही उसका उत्तर लेकर आ जाना । उस समय जो कुछ करना होगा मैं अवश्य वही करूँगा।”
तब महा पराक्रमी लक्ष्मणजी 'बहुत अच्छा' कह तुरन्त ही किष्किन्धापुरीमें आये । उस समय उन्होंने, क्रोधसे ऐसा उग्र रूप धारण किया था कि मानो सम्पूर्ण वानरोंको भस्म कर डालेंगे ।
श्रीरघुनाथजी सर्वज्ञ और ज्ञानस्वरूप हैं। श्रीलक्ष्मीजी सर्वदा उनकी सेवामें रहती हैं; तथापि साधारण स्त्रीके वियोगसे शोक करते हुए प्राकृत पुरुषके समान वे सीताजीके शोकसे विह्वल हो रहे हैं। वे प्रभु बुद्धि आदिके साक्षी, मायाके कार्योसे परे और राग-द्वेष आदि विकारोंसे रहित हैं फिर इन विकारोंका कार्य-रूप शोक उन्हें कैसे हो सकता है ? उन्होंने तो
सर्ग ५ ] किष्किन्धाकाण्ड १७७
ब्रह्मणोक्तमृतं कर्तुं राज्ञो दशरथस्य हि ॥१८॥
तपसः फलदानाय जातो मानुषवेषधृक् ।
मायया मोहिताः सर्वे जना अज्ञानसंयुताः ॥१९॥
कथमेषां भवेन्मोक्ष इति विष्णुर्विचिन्तयन् ।
कथां प्रथयितुं लोके सर्वलोकमलापहाम् ॥२०॥
रामायणाभिधां रामो भूत्वा मानुषचेष्टकः ।
क्रोधं मोहं च कामं च व्यवहारार्थसिद्धये ॥२१॥
तत्तत्कालोचितं गृह्णन् मोहयत्यवशाः प्रजाः ।
अनुरक्त इवाशेषगुणेषु गुणवर्जितः ॥२२॥
विज्ञानमूर्तिर्विज्ञानशक्तिः साक्ष्यगुणान्वितः ।
अतः कामादिभिर्नित्यमविलिप्तो यथा नभः ॥२३॥
विन्दन्ति मुनयः केचिञ्जानन्ति जनकादयः ।
तद्भक्ता निर्मलात्मानः सम्यग् जानन्ति नित्यदा ।
भक्तचित्तानुसारेण जायते भगवानजः ॥२४॥
लक्ष्मणोऽपि तदा गत्वा किष्किन्धानगरान्तिकम्।
ज्याघोषमकरोत्तीव्रं भीपयन् सर्ववानरान् ॥२५॥
तं दृष्ट्वा प्राकृतास्तत्र वानरा वप्रमूर्धनि ।
चक्रुः किलकिलाशब्दं धृतपाषाणपादपाः ॥२६॥
तान्दृष्ट्वा क्रोधताम्राक्षो वानरान् लक्ष्मणस्तदा।
निर्मूलान्कर्तुमुद्युक्तो धनुरानम्य वीर्यवान् ॥२७॥
ततः शीघ्रं समाप्लुत्य ज्ञात्वा लक्ष्मणमागतम्॥२८॥
निवार्य वानरान् सर्वानङ्गदो मन्त्रिसत्तमः ।
गत्वा लक्ष्मणसामीप्यं प्रणनाम स दण्डवत्॥२९॥
ततोऽङ्गदं परिष्वज्य लक्ष्मणः प्रियवर्धनः ।
२३
ब्रह्माजीकी वाणी सत्य करने और महाराज दशरथको उनकी तपस्याका फल देनेके लिये ही मनुष्यरूपसे अवतार लिया है। 'सब लोग मायासे मोहित होकर अज्ञानके वशीभूत हो गये हैं, उससे इनका किस प्रकार छुटकारा हो' यह सोचकर भगवान् विष्णु अपनी सकल-लोक-मलापहारिणी रामायण नामकी कथाका लोकमें विस्तार करनेके लिये रामरूप होकर मनुष्यके समान अनेकों लीलाएँ करते हुए व्यवहारकी सिद्धि-के लिये समयानुकूल क्रोध, मोह और काम आदि विकारोंको स्वीकार करके विकारोंके वशीभूत हुई प्रजाको अपनी लीलासे मोहित कर रहे हैं। किन्तु सम्पूर्ण गुणोंमें अनुरक्त-से दिखलायी देते हुए भी वे वास्तवमें उन सबसे रहित हैं ॥१४–२२॥ वे विज्ञानस्वरूप हैं, विज्ञान ही उनकी शक्ति है तथा एकमात्र साक्षी और गुणातीत हैं। इसलिये वे आकाशके समान काम आदि (मनोविकारों) से सर्वदा अलिप्त हैं ॥२३॥ उनके वास्तविक स्वरूपको कोई-कोई मुनिजन, जनकादि राजर्षिगण तथा उनके विशुद्ध-चित्त भक्तजन ही सदा ठीक-ठीक जान पाते हैं, वे अजन्मा भगवान् भक्तकी भावनाके अनुसार अवतार लेते हैं ॥२४॥
इधर, लक्ष्मणजीने किष्किन्धापुरीके पास पहुँचकर सम्पूर्ण वानरोंको भयभीत करते हुए अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका बड़ा भयंकर टंकार किया ॥२५॥ उस समय नगरके परकोटेपर चढ़े हुए कुछ साधारण वानर लक्ष्मणजीको देखकर अपने हाथोंमें पत्थर और वृक्षादि लेकर किलकारी मारने लगे। उन वानरोंको देखकर वीरवर लक्ष्मणजीके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये और वे धनुष चढ़ाकर उनका मूलोच्छेद करनेके लिये तत्पर हुए ॥२६-२७॥
तब लक्ष्मणजीको आये जान वहाँ मन्त्रिवर अंगदजी तुरन्त ही उछलकर आये और उन्होंने सब वानरोंको रोककर उनके पास जाकर दण्डवत् प्रणाम किया ॥२८-२९॥ तदनन्तर, प्रियवर्द्धन श्रीलक्ष्मणजीने अंगदको हृदयसे लगाकर कहा—"वत्स! तुम अभी जाकर अपने काका सुग्रीवको सूचना दो कि श्रीरघुनाथजी
१७८ \qquad\qquad\qquad\qquadअध्यात्मरामायण\qquad\qquad\qquad\qquad[सर्ग ५]
$उवाच वत्स गच्छ त्वं पितृव्याय निवेदय ॥३०॥ तुमसे अत्यन्त क्रुद्ध हैं और उनकी प्रेरणासे मैं यहाँ आया मामागतं राघवेण चोदितं रौद्रमूर्तिना । हूँ।” यह सुनकर अंगदने ‘बहुत अच्छा’ कह तुरन्त तथेति त्वरितं गत्वा सुग्रीवाय न्यवेदयत् ॥३१॥ ही सारा समाचार सुग्रीवको जा सुनाया ॥ ३०-३१ ॥ लक्ष्मणः क्रोधताम्राक्षः पुरद्वारि बहिःस्थितः । और बोला कि ‘लक्ष्मणजी क्रोधसे नेत्र लाल किये तच्छ्रुत्वाऽतीव सन्त्रस्तः सुग्रीवो वानरेश्वरः ॥३२॥ बाहर नगरके द्वारपर खड़े हैं।’ आहूय मन्त्रिणां श्रेष्ठं हनूमन्तमथाब्रवीत् । यह सुनकर वानरराज सुग्रीवको बड़ा ही भय गच्छ त्वमङ्गदेनाशु लक्ष्मणं विनयान्वितः ॥३३॥ हुआ ॥ ३२ ॥ उन्होंने मन्त्रिप्रवर हनूमान्जीको बुला- सान्त्वयन्कोपितं वीरं शनैरानय सादरम् । कर कहा—“तुम अंगदके साथ तुरन्त ही लक्ष्मणजीके प्रेषयित्वा हनूमन्तं तारामाह कपीश्वरः ॥३४॥ पास जाओ और उन क्रोधित हुए वीरवरको धीरे-धीरे त्वं गच्छ सान्त्वयन्ती तं लक्ष्मणं मृदुभाषितैः । अति विनयपूर्वक शान्त कर आदरपूर्वक अपने शान्तमन्तःपुरं नीत्वा पश्चाद्दर्शय मेऽनघे ॥३५॥ साथ यहाँ ले आओ।” इस प्रकार हनूमान्जीको भेज- भवत्विति ततस्तारा मध्यकक्षं समाविशत् । कर कपिराज सुग्रीवने तारासे कहा—॥ ३३-३४ ॥ हनूमानङ्गदेनैव सहितो लक्ष्मणान्तिकम् ॥३६॥ “हे अनघे ! तुम आगे जाकर अपनी मधुर गत्वा ननाम शिरसा भक्त्या स्वागतमब्रवीत् । वाणीसे वीरवर लक्ष्मणको शान्त करो और जब वे एहि वीर महाभाग भवद्गृहमशङ्कितम् ॥३७॥ शान्त हो जायँ तब उन्हें अन्तःपुरमें लाकर मुझसे प्रविश्य राजदारादीन् दृष्ट्वा सुग्रीवमेव च । मिलाओ” ॥ ३५ ॥ यदाज्ञापयसे पश्चात्तत्सर्वं करवाणि भोः ॥३८॥ यह सुनकर तारा ‘बहुत अच्छा’ कह बीचकी इत्युक्त्वा लक्ष्मणं भक्त्या करे गृह्य स मारुतिः । ड्योढ़ीमें आ गयी। इधर अंगदके सहित हनूमान्जी आनयामास नगरमध्याद्राजगृहं प्रति ॥३९॥ लक्ष्मणजीके पास आये और उन्हें शिर नवाकर भक्ति- पश्यंस्तत्र महासौधान् यूथपानां समन्ततः । पूर्वक स्वागत करते हुए बोले—“हे महाभाग वीरवर ! जगाम भवनं राज्ञः सुरेन्द्रभवनोपमम् ॥४०॥ निःशंकहोकर आइये, यह घर आपकाही है ॥३६-३७॥ मध्यकक्षे गता तत्र तारा ताराधिपानना । इसमें पधारकर राजमहिषियोंसे और महाराज सुग्रीवसे सर्वाभरणसम्पन्ना मदरक्तान्तलोचना ॥४१॥ मिलिये। फिर आपकी जो आज्ञा होगी हम वही उवाच लक्ष्मणं नत्वा स्मितपूर्वाभिभाषिणी । करेंगे” ॥ ३८ ॥ याहि देवर भद्रं ते साधुस्त्वं भक्तवत्सलः ॥४२॥ ऐसा कह पवननन्दन हनूमान्जी भक्तिपूर्वक किमर्थं कोपमाकार्षीर्भक्ते भृत्ये कपीश्वरे । लक्ष्मणजीका हाथ पकड़कर उन्हें नगरके बीचसे होकर राजमन्दिरको ले चले ॥ ३९ ॥ तब, लक्ष्मणजी मार्गमें जहाँ-तहाँ यूथपति वानरोंके महल देखते हुए इन्द्रभवनके समान अति शोभायमान राजभवनमें पहुँचे ॥ ४० ॥ वहाँ बीचकी ड्योढ़ीमें चन्द्रवदना तारा बैठी थी; वह सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषिता थी तथा उसके नेत्र मदसे कुछ अरुणवर्ण हो रहे थे ॥ ४१ ॥ वह मधुरभाषिणी तारा लक्ष्मणजीको प्रणाम कर मुसकाती हुई बोली— “आइये देवर, आपका शुभ हो। आप बड़े ही साधुस्वभाव और भक्तवत्सल हैं ॥४२॥ आपने अपने भक्त और$
सर्ग ५] किष्किन्धाकाण्ड १७९
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बहुकालमनाश्वासं दुःखमेवानुभूतवान् ॥४३॥<br>इदानीं बहुदुःखौघाद्भवद्भीरभिरक्षितः ।<br>भवत्प्रसादात्सुग्रीवः प्राप्तसौख्यो महामतिः॥४४॥<br>कामासक्तो रघुपतेः सेवार्थं नागतो हरिः ।<br>आगमिष्यन्ति हरयो नानादेशगताः प्रभो ॥४५॥<br>प्रेषिता दशसाहस्रा हरयो रघुसत्तम ।<br>आनेतुं वानरान् दिग्भ्यो महापर्वतसन्निभान्॥४६॥<br>सुग्रीवः स्वयमागत्य सर्ववानरयूथपैः ।<br>वधयिष्यति दैत्यौघान् रावणं च हनिष्यति ॥४७॥<br>त्वयैव सहितोऽद्यैव गन्ता वानरपुङ्गवः ।<br>पश्यान्तर्भवनं तत्र पुत्रदारसुहृद्वृतम् ॥४८॥<br>दृष्ट्वा सुग्रीवमभयं दत्त्वा नय सहैव ते । | अनुगत वानरराज सुग्रीवपर किस कारण इतना कोप किया? उसने तो बहुत दिनोंसे बिना किसी प्रकारका सहारा मिले दुःख ही दुःख भोगा है॥४३॥ अब आपलोगों-ने ही उसे बड़े दुःख-समूहसे निकाला है। आपहीकी कृपा-से महामति सुग्रीवको यह सुख देखनेमें आया है॥४४॥ वह जातिका वानर है, इसलिये कामासक्त होकर श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित नहीं हुआ । हे प्रभो ! अब शीघ्र ही विविध देशोंसे बहुत-से वानर आनेवाले हैं॥४५॥ हे रघुश्रेष्ठ ! अब दिशा-विदिशाओंसे महा-पर्वतके समान बड़े-बड़े डीलवाले असंख्य वानरोंको लानेके लिये दश सहस्र बन्दर भेजे गये हैं॥४६॥ सुग्रीव स्वयं जाकर उन सब वानर-यूथपतियोंके द्वारा दैत्यदलका संहार करावेगा और स्वयं रावणका वध करेगा ॥४७॥ वह कपिश्रेष्ठ आज ही आपके साथ श्रीरघुनाथजीकी सेवामें उपस्थित होगा । चलिये, अन्तःपुरमें पधारिये । वहाँ सुग्रीव अपने पुत्र, स्त्री और सुहृद्गणसे घिरा हुआ बैठा है । उससे मिलकर उसे अभयदान दीजिये और अपने साथ ही श्रीरामचन्द्रजीके पास ले जाइये ।” |
| ताराया वचनं श्रुत्वा कृशक्रोधोऽथ लक्ष्मणः॥४९॥<br>जगामान्तःपुरं यत्र सुग्रीवो वानरेश्वरः ।<br>रुमामालिङ्ग्य सुग्रीवः पर्यङ्के पर्यवस्थितः ॥५०॥<br>दृष्ट्वा लक्ष्मणमत्यर्थमुत्पपातातिभीतवत् ।<br>तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः क्रुद्धो मदविह्वलितेक्षणम् ॥५१॥<br>सुग्रीवं प्राह दुर्वृत्त विस्मृतोऽसि रघूत्तमम् ।<br>वाली येन हतो वीरः स बाणोऽद्य प्रतीक्षते ॥५२॥<br>त्वमेव वालिनो मार्गं गमिष्यसि मया हतः । | ताराका कथन सुनकर लक्ष्मणजीका क्रोध ठण्डा पड़ गया और वे अन्तःपुरमें, जहाँ वानरराज सुग्रीव थे, गये। सुग्रीव अपनी भार्या रुमाको गले लगाये पलंगपर पड़े थे,॥४८-५०॥ लक्ष्मणजीको देखते ही वे अत्यन्त भयभीतके समान उछलकर खड़े हो गये । उनके नेत्र मदसे विह्वल हो रहे थे। उन्हें ऐसी दशामें देखकर श्रीलक्ष्मणजीने अति क्रोधित होकर कहा— “अरे दुःशील ! तू रघुनाथजीको भूल गया ? (तू नहीं जानता—) जिस बाणके द्वारा वीरवर वाली मारा गया था वही आज तेरी प्रतीक्षा कर रहा है ॥५१-५२॥ मालूम होता है, मेरे हाथसे मारा जाकर तू भी वालीके मार्गसे ही जाना चाहता है ।” |
| एवमत्यन्तपरुषं वदन्तं लक्ष्मणं तदा ॥५३॥<br>उवाच हनुमान् वीरः कथमेवं प्रभाषसे ।<br>त्वत्तोऽधिकतरो रामे भक्तोऽयं वानराधिपः ॥५४॥<br>रामकार्यार्थमनिशं जागर्ति न तु विस्मृतः ।<br>आगताः परितः पश्य वानराः कोटिशः प्रभो॥५५॥ | लक्ष्मणजीको इस प्रकार अति कठोर भाषण करते देख वीरवर हनुमान्जी बोले—“महाराज ! ऐसी बातें क्यों कहते हैं ? ये वानरराज श्रीरामचन्द्रजीके आप-से भी अधिक भक्त हैं ॥ ५३-५४ ॥ भगवान् रामके कार्यके लिये ये रात-दिन जागते रहते हैं, ये उसे भूल नहीं गये हैं । प्रभो ! देखिये ये करोड़ों वानर इसीलिये सब |
१८० अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
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| गमिष्यन्त्यचिरेणैव सीतायाः परिमार्गणम् ।<br>साधयिष्यति सुग्रीवो रामकार्यमशेषतः ॥५६॥ | ओरसे आ रहे हैं ॥ ५५ ॥ ये सब शीघ्र ही सीताजी-की खोजके लिये जायेंगे और महाराज सुग्रीव रामचन्द्रजीका सब कार्य भली प्रकार सिद्ध करेंगे” ॥५६॥ |
| श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं सौमित्रिर्लज्जितोऽभवत् ।<br>सुग्रीवोऽप्यर्घ्यपाद्याद्यैर्लक्ष्मणं समपूजयत् ॥५७॥ | हनूमान्जीके ये वचन सुनकर लक्ष्मणजी लज्जित हो गये । तदनन्तर सुग्रीवने अर्घ्य और पाद्य आदिसे लक्ष्मणजीकी भली प्रकार पूजा की ॥५७॥ तथा उनसे गले |
| आलिङ्ग्य प्राह रामस्य दासोऽहं तेन रक्षितः ।<br>रामः स्वतेजसा लोकान् क्षणाद्धर्धैनैव जेष्यति ॥५८॥ | मिलकर कहा, “श्रीमन् ! मैं तो रामका दास हूँ, उन्होंने मेरी रक्षा की है; वे अपने तेजसे आधे क्षणमें ही सम्पूर्ण लोकोंको जीत सकते हैं ॥ ५८ ॥ हे प्रभो ! |
| सहायमात्रमेवाहं वानरैः सहितः प्रभो ।<br>सौमित्रिरपि सुग्रीवं प्राह किञ्चिन्मयोदितम्॥५९॥ | मैं तो अपनी वानर-सेनाके साथ केवल उनका सहायकमात्र हूँगा । (मुझसे भला उनका क्या कार्य सिद्ध होगा, वे तो स्वयं ही सर्व-समर्थ हैं) ।” तब लक्ष्मणजीने भी सुग्रीवसे कहा—“हे महाभाग ! मैंने |
| तत्क्षमस्व महाभाग प्रणयाद्भाषितं मया ।<br>गच्छामोऽद्यैव सुग्रीव रामस्तिष्ठति कानने ॥६०॥ | भी प्रणय-कोपवश आपसे जो कुछ अनुचित कहा है. वह क्षमा करें । भगवान् राम वनमें अकेले ही हैं और वे श्रीजानकीजीके विरहसे अति व्याकुल हैं, अतः हम आज ही वहाँ चलेंगे ।” |
| एक एवातिदुःखात्तो जानकीविरहातुरः ।<br>तथेति रथमारुह्य लक्ष्मणेन समन्वितः ॥६१॥ | |
| वानरैः सहितो राजा राममेवान्वपद्यत ॥६२॥ | तब वानरराज सुग्रीव 'हाँ ठीक है' ऐसा कहकर लक्ष्मणजीके सहित रथमें चढ़े और वानरोंके साथ श्रीरामचन्द्रजीके पास चले ॥ ५९–६२ ॥ |
| भेरीमृदङ्गैर्बहुभृक्षवानरैः<br>श्वेतातपत्रैर्व्यजनैश्च शोभितः ।<br>नीलाङ्गदाद्यैर्हनुमत्प्रधानैः<br>समावृतो राघवमभ्यगाद्धरिः ॥६३॥ | उस समय (उनकी सवारीकी अपूर्व शोभा थी—) भेरी और मृदंग आदि नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे तथा बहुत-से रीछ, वानर श्वेत-छत्र और चँवर लिये उन्हें अत्यन्त सुशोभित कर रहे थे। इस प्रकार वानरराज सुग्रीव बड़े ठाट-बाटसे नील, अंगद और हनूमान् आदि मुख्य-मुख्य वानरोंके साथ श्रीरघुनाथजीके पास चले ॥ ६३ ॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥५॥
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ६: सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश और स्वयम्प्रभा-चरित्र
सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८१
षष्ठ सर्ग
सीताजीकी खोज, वानरोंका गुहाप्रवेश और स्वयम्प्रभाचरित्र।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वती ! मृगेन्द्रचर्म और जटा-मुकुटसे सुशोभित, विशाल-नयन, सस्मित मनोहर-मुखारविन्द, शान्तमूर्ति, श्यामशरीर भगवान् रामको सीताजीकी विरह-व्यथासे सन्तप्त होकर मृग और पक्षियोंकी ओर निहारते हुए गुफाके द्वारपर एकं शिलाखण्डपर बैठे देख सुग्रीव और लक्ष्मण दूरसे ही तुरन्त रथसे उतर पड़े और अत्यन्त भक्ति-भावसे श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें जा गिरे ॥ १-३ ॥ धर्मज्ञ श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवको गले लगाकर उनकी कुशल पूछी तथा अपने पास बिठाकर उनका यथोचित सत्कार किया ॥ ४ ॥ |
|---|---|
| दृष्ट्वा रामं समासीनं गुहाद्वारि शिलातले ।<br>वैलाजिनधरं श्यामं जटामौलिविराजितम् ॥ १ ॥<br>विशालनयनं शान्तं स्मितचारुमुखाम्बुजम् ।<br>सीताविरहसन्तप्तं पश्यन्तं मृगपक्षिणः ॥ २ ॥<br>रथाद्दूरात्समुत्पत्य वेगात्सुग्रीवलक्ष्मणौ ।<br>रामस्य पादयोरग्रे पेततुर्भक्तिसंयुतौ ॥ ३ ॥<br>रामः सुग्रीवमालिङ्ग्य पृष्ट्वाऽनामयमन्तिके ।<br>स्थापयित्वा यथान्यायं पूजयामास धर्मवित् ॥४॥ | |
| ततोऽब्रवीद्रघुश्रेष्ठं सुग्रीवो भक्तिनम्रधीः ।<br>देव पश्य समायान्तीं वानराणां महाचमूम् ॥ ५ ॥ | तब सुग्रीवने भक्तिवश अति विनीत होकर श्रीरघुनाथजीसे कहा—"भगवन् ! देखिये, वानरोंकी यह महान् सेना आ रही है ॥ ५ ॥ |
| कुलाचलाद्रिसम्भूता मेरुमन्दरसन्निभाः ।<br>नानाद्वीपसरिच्छैलवासिनः पर्वतोपमाः ॥ ६ ॥<br>असङ्ख्याताः समायान्ति हरयः कामरूपिणः ।<br>सर्वे देवांशसम्भूताः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ७ ॥ | प्रभो ! हिमालय आदि कुलपर्वतोंपर उत्पन्न हुए, सुमेरु और मन्दराचलके समान डील-डौलवाले, भिन्न-भिन्न द्वीप नदी-तट और पर्वतोंके ऊपर रहनेवाले तथा पर्वतके समान अगणित विशालकाय वानर आ रहे हैं। ये सभी देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हैं और युद्ध करनेमें भी अति कुशल हैं ॥ ६-७ ॥ |
| अत्र केचिद्गजवलाः केचिद्दशगजोपमाः ।<br>गजायुतबलाः केचिदन्येऽमितबलाः प्रभो ॥ ८ ॥ | हे प्रभो ! इनमेंसे किन्हींमें एक, किन्हींमें दश और किन्हींमें दश हजार हाथियोंका बल है तथा किन्हींके बलका तो कोई परिमाण ही नहीं है ॥ ८ ॥ |
| केचिदञ्जनकूटाभाः केचित्कनक सन्निभाः ।<br>केचिद्रक्तान्तवदना दीर्घवालास्तथाऽपरे ॥ ९ ॥ | देखिये, कोई कज्जलगिरिके समान काले हैं, कोई सुवर्णके समान सुनहरी हैं, किन्हींका मुख रक्तवर्ण है और किन्हींके शरीरपर बड़े-बड़े बाल हैं ॥ ९ ॥ |
| शुद्धस्फटिकसङ्काशाः केचिद्राक्षससन्निभाः ।<br>गर्जन्तः परितो यान्ति वानरा युद्धकाङ्क्षिणः ॥१०॥ | कोई शुद्ध स्फटिकमणिके समान दिखायी देते हैं और कोई राक्षस-जैसे मालूम पड़ते हैं। ये सभी वानर युद्धके लिये अति उतावले हैं इसीलिये गर्जते हुए इधर-उधर दौड़ रहे हैं ॥ १० ॥ |
| त्वदाज्ञाकारिणः सर्वे फलमूलाशनः प्रभो ।<br>ऋक्षाणामधिपो वीरो जाम्बवान्नाम बुद्धिमान् ॥११॥ | हे प्रभो ! ये सब आपकी आज्ञाका पालन करनेवाले और फल-मूल आदि ही खानेवाले हैं। (इनके निर्वाहके लिये आपको कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ेगी)। ये रीछोंके अधिपति |
| १८२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ६ |
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एष मे मन्त्रिणां श्रेष्ठः कोटिभल्लूकवृन्दपः ।
हनूमानेष विख्यातो महासत्त्वपराक्रमः ॥१२॥
वायुपुत्रोऽतितेजस्वी मन्त्री बुद्धिमतां वरः ।
नलो नीलश्च गवयो गवाक्षो गन्धमादनः ॥१३॥
शरभो मैन्दवश्चैव गजः पनस एव च ।
वलीमुखो दधिमुखः सुषेणस्तार एव च ॥१४॥
केसरी च महासत्त्वः पिता हनुमतो बली ।
एते ते यूथपा राम प्राधान्येन मयोदिताः ॥१५॥
महात्मानो महावीर्याः शक्रतुल्यपराक्रमाः ।
एते प्रत्येकतः कोटिकोटिवानरयूथपाः ॥१६॥
तवाज्ञाकारिणः सर्वे सर्वे देवांशसम्भवाः ।
एष वालिसुतः श्रीमानङ्गदो नाम विश्रुतः ॥१७॥
वालितुल्यबलो वीरो राक्षसानां बलान्तकः ।
एते चान्ये च बहवस्त्वदर्थे त्यक्तजीविताः ॥१८॥
योद्धारः पर्वताग्रैश्च निपुणाः शत्रुघातने ।
आज्ञापय रघुश्रेष्ठ सर्वे ते वशवर्तिनः ॥१९॥
रामः सुग्रीवमालिङ्ग्य हर्षपूर्णाश्रुलोचनः ।
प्राह सुग्रीव जानासि सर्वं त्वं कार्यगौरवम् ॥२०॥
मार्गणार्थं हि जानक्या नियुङ्क्ष्व यदि रोचते ।
श्रुत्वा रामस्य वचनं सुग्रीवः प्रीतमानसः ॥२१॥
प्रेषयामास बलिनो वानरान् वानरर्षभः ।
दिक्षु सर्वासु विविधान्वानरान् प्रेष्य सत्वरम् ॥२२॥
दक्षिणां दिशमत्यर्थं प्रयत्नेन महाबलान् ।
युवराजं जाम्बवन्तं हनूमन्तं महाबलम् ॥२३॥
नलं सुषेणं शरभं मैन्दं द्विविदमेव च ।
प्रेषयामास सुग्रीवो वचनं चेदमब्रवीत् ॥२४॥
विचिन्वन्तु प्रयत्नेन भवन्तो जानकीं शुभाम् ।
मासादर्वाङ्निवर्तध्वं मच्छासनपुरःसराः ॥२५॥
जाम्बवान् बड़े ही वीर और बुद्धिमान् हैं। ये एक करोड़ भालुओंके यूथपति हैं और मेरे मन्त्रियोंमें अग्रगण्य हैं। अपने महान् बल और पराक्रमके लिये सर्वत्र विख्यात ये परम तेजस्वी पवन-पुत्र हनूमान्जी हैं। ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ और मेरे (प्रमुख) मन्त्री हैं। इनके अतिरिक्त हे रामजी ! नल, नील, गवय, गवाक्ष, गन्धमादन, शरभ, मैंदव, गज, पनस, वलीमुख, दधिमुख, सुषेण, तार, तथा हनूमान्के पिता महाबली और परम धीर केशरी—ये मेरे प्रधान-प्रधान यूथपति हैं, सो मैंने आपको बता दिये ॥ ११-१५ ॥ ये सब बड़े महात्मा, वीर और इन्द्रके समान पराक्रमी हैं; तथा इनमेंसे प्रत्येक करोड़ों वानरोंके यूथका अधिपति है ॥ १६ ॥ ये सभी आपके आज्ञाकारी और देवताओंके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। ये वालीके पुत्र परम विख्यात श्रीमान् अंगदजी हैं ॥ १७ ॥ ये भी वालीके समान ही बलवान् और राक्षसदलका दलन करनेवाले हैं। इस प्रकार ये सब तथा और भी बहुत-से वानर-वीर आपके लिये प्राण निछावर करनेको उद्यत हैं ॥१८॥ ये पर्वत-शिखर लेकर लड़ा करते हैं और शत्रु का नाश करनेमें बड़े कुशल हैं। हे रघुश्रेष्ठ ! ये सब आपके अधीन हैं, आप इन्हें इच्छानुसार आज्ञा दीजिये” ॥१९॥
तब श्रीरामचन्द्रजीने नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरकर सुग्रीवको हृदय लगा लिया और कहा—"सुग्रीव ! तुम मेरे कार्यकी कठिनताके विषयमें जानते ही हो ॥ २० ॥ यदि तुम ठीक समझो तो इन्हें यथायोग्य जानकीजीकी खोजके लिये नियुक्त कर दो।" रामका यह वचन सुनकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीवने प्रसन्न होकर बहुत-से बलवान् वानरोंको सीताकी खोजके लिये भेजा। इस प्रकार तुरन्त ही समस्त दिशाओंमें अनेकों वानरोंको भेजकर दक्षिण-दिशामें अधिक प्रयत्नके साथ महाबली युवराज अंगद, जाम्बवान्, हनूमान्, नल, सुषेण, शरभ, मैंद और द्विविद आदिको भेजा तथा उनसे इस प्रकार कहा—॥२१-२४॥ "मेरी आज्ञासे तुम सब लोग बड़े प्रयत्नसे शुभलक्षणा जानकीजीकी खोज करो और एक मासके भीतर ही लौट आओ ॥ २५॥
सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८३
सीतामदृष्ट्वा यदि वो मासादूर्ध्वं दिनं भवेत् ।
तदा प्राणान्तिकं दण्डं मत्तः प्राप्स्यथ वानराः ॥२६॥
इति प्रस्थाप्य सुग्रीवो वानरान् भीमविक्रमान् ।
रामस्य पार्श्वे श्रीरामं नत्वा चोपविवेश सः ॥२७॥
गच्छन्तं मारुतिं दृष्ट्वा रामो वचनमब्रवीत् ।
अभिज्ञानार्थमेतन्मे अङ्गुलीयकमुत्तमम् ॥२८॥
मन्नामाक्षरसंयुक्तं सीतायै दीयतां रहः ।
अस्मिन् कार्ये प्रमाणं हि त्वमेव कपिसत्तम ॥
जानामि सत्त्वं ते सर्वं गच्छ पन्थाः शुभस्तव ॥२९॥
एवं कपीनां राज्ञा ते विसृष्टाः परिमार्गणे ।
सीताया अङ्गदमुखा बभ्रमुस्तत्र तत्र ह ॥३०॥
भ्रमन्तो विन्ध्यगहने ददृशुः पर्वतोपमम् ।
राक्षसं भीषणाकारं भक्षयन्तं मृगान् गजान् ॥३१॥
रावणोऽयमिति ज्ञात्वा केचिद्वानरपुङ्गवाः ।
जघ्नुः किलकिलाशब्दं मुञ्चन्तो मुष्टिभिः क्षणात् ॥३२॥
नायं रावण इत्युक्त्वा ययुरन्यन्महद्वनम् ।
तृषार्ताः सलिलं तत्र नाविन्दन् हरिपुङ्गवाः ॥३३॥
विभ्रमन्तो महारण्ये शुष्ककण्ठोष्ठतालुकाः ।
ददृशुर्गह्वरं तत्र तृणगुल्मावृतं महत् ॥३४॥
आर्द्रपक्षान् क्रौञ्चहंसान्निःसृतान्ददृशुस्ततः ।
अत्रास्ते सलिलं नूनं प्रविशामो महागुहाम् ॥३५॥
इत्युक्त्वा हनुमानग्रे प्रविवेश तमन्वयुः ।
सर्वे परस्परं धृत्वा बाहून्बाहुभिरुत्सुकाः ॥३६॥
अन्धकारे महद्दूरं गत्वाऽपश्यन् कपीश्वराः ।
जलाशयान्मणिनिभतोयान् कल्पद्रुमोपमान् ॥३७॥
यदि सीताजीको बिना देखे तुम्हें एक माससे एक दिन भी अधिक हो जायगा तो हे वानरो ! याद रखो, तुम्हें मेरे हाथसे प्राणान्त-दण्ड भोगना पड़ेगा" ॥ २६ ॥
उन महापराक्रमी वानरोंको इस प्रकार भेजकर सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजीको प्रणाम कर उनके पास जा बैठे ॥ २७ ॥ उस समय पवन-नन्दन हनूमान्को जाते देख श्रीरघुनाथजीने कहा—"हे कपिश्रेष्ठ ! तुम मेरी यह अँगूठी ले जाओ, इसपर मेरे नामाक्षर गुदे हुए हैं। इसे अपने परिचयके लिये तुम एकान्तमें सीताजीको देना । हे कपिश्रेष्ठ ! इस कार्यमें तुम्हीं समर्थ हो । मैं तुम्हारा बुद्धिबल अच्छी तरह जानता हूँ। अच्छा, जाओ । तुम्हारा मार्ग कल्याणमय हो" ॥ २८-२९॥
इस प्रकार वानरराज सुग्रीवके भेजे हुए वे अंगदादि वानरगण सीताजीकी खोज करते हुए पृथिवीपर जहाँ-तहाँ विचरने लगे ॥ ३० ॥ घूमते-घूमते उन्होंने विन्ध्याचलके गहन वनमें एक पर्वताकार भयंकर राक्षस देखा, जो जंगलके मृग और हाथियोंको पकड़-पकड़कर खा रहा था ॥ ३१ ॥ कुछ वानरोंने यह समझकर कि 'यही रावण है' बड़ा किलकिला-शब्द करते हुए उसे एक क्षणमें ही घूँसोंसे मार डाला ॥ ३२ ॥ फिर ( उसे इतनी सुगमतासे मरा हुआ देख-कर ) 'यह रावण नहीं है' ऐसा कहते हुए वे एक दूसरे घोर वनमें गये । वहाँ उन्हें बड़ी प्यास लगी किन्तु जल कहीं भी दिखायी न देता था ॥ ३३ ॥
उस भयंकर वनमें घूमते-घूमते उनके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये; तब उन्होंने वहाँ तृण, गुल्म और लता आदिसे ढँकी हुई एक विशाल गुहा देखी ॥ ३४ ॥ उसमेंसे उन्होंने भीगे हुए पंखोंवाले क्रौञ्च और हंसों-को निकलते देखा । तब यह कहकर कि 'चलो इस गुहामें चलें, इसमें अवश्य जल होगा' सबसे आगे हनूमान्जीने उसमें प्रवेश किया, उनके ही पीछे अन्य सब वानर भी एक दूसरेकी बाँहमें बाँह डालकर उत्सुकतापूर्वक उसमें घुस गये ॥ ३५-३६ ॥
बहुत दूरतक अन्धकारहीमें जानेके अनन्तर उन वानरोंने देखा किं वहाँ ( स्फटिक ) मणिके समान
| १८४ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ६ |
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वृक्षान्पक्वफलैर्नम्राम्धुद्रोणसमन्वितान् ।<br>गृहान् सर्वगुणोपेतान् मणिवस्त्रादिपूरितान् ॥३८॥<br><br>दिव्यभक्ष्यान्नसहितान्मानुषैः परिवर्जितान् ।<br>विस्मितास्तत्र भवने दिव्ये कनकविष्टरे ॥३९॥<br><br>प्रभया दीप्यमानां तु ददृशुः स्त्रियमेककाम् ।<br>ध्यायन्तीं चीरवसनां योगिनीं योगमास्थिताम् ४०<br><br>प्रणेमुस्तां महाभागां भक्त्या भीत्या च वानराः ।<br>दृष्ट्वा तान्वानरान्देवी प्राह यूयं किमागताः॥४१॥<br><br>कुतो वा कस्य दूता वा मत्स्थानं किं प्रधर्षथ ।<br>तच्छ्रुत्वा हनुमान्प्राह शृणु वक्ष्यामि देवि ते ॥४२॥<br><br>अयोध्याधिपतिः श्रीमान् राजा दशरथः प्रभुः ।<br>तस्य पुत्रो महाभागो ज्येष्ठो राम इति श्रुतः ॥४३॥<br><br>पितुराज्ञां पुरस्कृत्य सभार्यः सानुजो वनम् ।<br>गतस्तत्र हृता भार्या तस्य साध्वी दुरात्मना ॥४४॥<br><br>रावणेन ततो रामः सुग्रीवं सानुजो ययौ ।<br>सुग्रीवो मित्रभावेन रामस्य प्रियवल्लभाम् ॥४५॥<br><br>मृगयध्वमिति प्राह ततो वयमुपागताः ।<br>ततो वनं विचिन्वन्तो जानकीं जलकाङ्क्षिणः॥४६॥<br><br>प्रविष्टा गह्वरं घोरं दैवादत्र समागताः ।<br>त्वं वा किमर्थमत्रासि का वा त्वं वद नः शुभे॥४७॥<br><br>योगिनी च तथा दृष्ट्वा वानरान् प्राह हृष्टधीः ।<br>यथेष्टं फलमूलानि जग्ध्वा पीत्वाऽमृतं पयः ॥४८॥<br><br>आगच्छत ततो वक्ष्ये मम वृत्तान्तमादितः ।<br>तथेति भुक्त्वा पीत्वा च हृष्टास्ते सर्ववानराः ॥४९॥ | स्वच्छ जलसे पूर्ण कई सरोवर हैं; उनके पास ही पके फलोंके भारसे झुके हुए कल्पतरुके समान सुन्दर वृक्ष हैं जिनमें शहदके छत्ते लगे हुए हैं। पास ही, मणिमय वस्त्रालंकारोंसे युक्त और दिव्य भक्ष्य-भोज्य आदि सामग्रियोंसे पूर्ण सर्वगुणसम्पन्न निर्जन भवन हैं। उनमेंसे एक दिव्य भवनमें उन्होंने अति आश्चर्यचकित हो एक रमणीको अकेली सुवर्ण-सिंहासनपर विराजमान देखा । वह सुन्दरी योगाभ्यासमें तत्पर एक योगिनी थी, अपने तेजसे वह उस स्थानको प्रकाशित कर रही थी तथा शरीरपर चीर-वस्त्र धारण किये उस समय ध्यान कर रही थी ॥३७-४०॥<br><br>उस महाभागा युवतीको देखकर वानरोंने भय और प्रीतिसे उसे प्रणाम किया । तब उस देवीने उनकी ओर देखकर कहा—"तुमलोग क्यों और कहाँसे आये हो ? तुम किसके दूत हो ? तथा मेरे स्थानको क्यों भ्रष्ट कर रहे हो ?" यह सुनकर हनूमान्जीने कहा—"देवि ! मैं आपसे सब वृत्तान्त निवेदन करता हूँ, सुनिये—॥ ४१-४२ ॥ परम ऐश्वर्यसम्पन्न महाराज दशरथ अयोध्याके अधिपति थे । उनके महा भाग्यशाली ज्येष्ठ पुत्र राम नामसे विख्यात हैं ॥ ४३ ॥ वे अपने पिताकी आज्ञा मानकर अपनी भार्या और छोटे भाईके सहित वनमें आये थे, यहाँ उनकी परम साध्वी पत्नीको दुरात्मा रावण हर ले गया । तब वे अपने अनुजके सहित वानरराज सुग्रीवके पास आये । सुग्रीवने उनसे मित्र-भाव हो जानेके कारण हमें यह आज्ञा दी है कि तुमलोग रामकी प्राणप्रियाकी खोज करो । अतः हम वहींसे आये हैं। यहाँ वनमें जानकीको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हमें जलकी आवश्यकता हुई । इससे हम इस भयंकर कन्दरामें घुसे और दैवयोगसे यहाँ आ गये । हे शुभे ! आप यहाँ किसलिये रहती हैं और कौन हैं ? यह हमें बताइये" ॥ ४४-४७ ॥<br><br>यह सब देखकर उस योगिनीको बड़ा हर्ष हुआ और वह वानरोंसे बोली—"पहले तुम इच्छानुसार फल-मूलादि खाकर अमृतमय जल पान करो । फिर मेरे पास आना, तब मैं आरम्भसे तुम्हें अपना सब वृत्तान्त सुनाऊँगी ।" तब उन वानरोंने 'बहुत अच्छा' कह यथेष्ट फल-मूलादि खाकर जल पीया और फिर |
सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड १८५
देव्याः समीपं गत्वा ते बद्धाञ्जलिपुटाः स्थिताः ।
ततः प्राह हनूमन्तं योगिनी दिव्यदर्शना ॥५०॥
हेमा नाम पुरा दिव्यरूपिणी विश्वकर्मणः ।
पुत्री महेशं नृत्येन तोषयामास भामिनी ॥५१॥
तुष्टो महेशः प्रददाविदं दिव्यपुरं महत् ।
अत्र स्थिता सा सुदती वर्षाणामयुतायुतम् ॥५२॥
तस्या अहं सखी विष्णुतत्परा मोक्षकाङ्क्षिणी ।
नाम्ना स्वयम्प्रभा दिव्यगन्धर्वतनया पुरा ॥५३॥
गच्छन्ती ब्रह्मलोकं सा मामाहेदं तपश्चर ।
अत्रैव निवसन्ती त्वं सर्वप्राणिविवर्जिते ॥५४॥
त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणोऽव्ययः ।
भूभारहरणार्थाय विचरिष्यति कानने ॥५५॥
मार्गन्तो वानरास्तस्य भार्यामायान्ति ते गुहाम् ।
पूजयित्वाऽथ तान् नत्वा रामं स्तुत्वा प्रयत्नतः ॥५६॥
यातासि भवनं विष्णोर्योगिगम्यं सनातनम् ।
इतोऽहं गन्तुमिच्छामि रामं द्रष्टुं त्वरान्विता ॥५७॥
यूयं पिदध्वमक्षीणि गमिष्यथ वहिर्गुहाम् ।
तथैव चक्रुस्ते वेगाद्गताः पूर्वस्थितं वनम् ॥५८॥
साऽपि त्यक्त्वा गुहां शीघ्रं ययौ राघवसन्निधिम् ।
तत्र रामं ससुग्रीवं लक्ष्मणं च ददर्श ह ॥५९॥
कृत्वा प्रदक्षिणं रामं प्रणम्य बहुशः सुधीः ।
आह गद्गदया वाचा रोमाञ्चिततनूरुहा ॥६०॥
दासी तवाहं राजेन्द्र दर्शनार्थमिहागता ।
बहुवर्षसहस्राणि तप्तं मे दुष्करं तपः ॥६१॥
गुहायां दर्शनार्थं ते फलितं मेऽद्य तत्तपः ।
प्रसन्नचित्तसे उस देवीके पास आकर हाथ जोड़कर खड़े हो गये।
तदनन्तर वह दिव्यदर्शना योगिनी हनूमान्जीसे इस प्रकार कहने लगी—॥४८-५०॥ "पूर्वकालमें विश्वकर्माकी हेमा नामवाली एक दिव्यरूपिणी पुत्री थी। उस सुन्दरीने अपने नृत्यसे श्रीमहादेवजीको प्रसन्न किया ॥५१॥ प्रसन्न होनेपर श्रीशंकरने उसे यह विशाल और दिव्य नगर (रहनेके लिये) दिया। यहाँ वह सुन्दर दाँतोंवाली हजारों वर्ष रही ॥५२॥ मैं उसकी सखी दिव्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हूँ। मेरा नाम स्वयंप्रभा है। मुझे मोक्षकी इच्छा है अतः मैं सर्वदा विष्णु भगवान्की उपासनामें तत्पर रहती हूँ। पूर्वकालमें, जब वह ब्रह्मलोकको जाने लगी तब उसने मुझसे कहा कि 'तू सब प्रकारके प्राणियोंसे रहित इस स्थानमें ही रहकर तपस्या कर ॥५३-५४॥ त्रेतायुगमें साक्षात् अव्यय नारायण राजा दशरथके यहाँ जन्म लेकर पृथिवीका भार उतारनेके लिये वनमें विचरेंगे ॥५५॥ उनकी भार्याको ढूँढ़ते हुए कुछ वानर तेरी गुहामें आयेंगे। उनका भली प्रकार सत्कार कर तू रामचन्द्रजीकी (उनके पास जाकर) प्रयत्नपूर्वक वन्दना और स्तुति करके भगवान् विष्णुके नित्यधामको चली जायगी, जो योगियोंको ही प्राप्त होने योग्य है।' अतः अब मैं तुरन्त ही भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये जाना चाहती हूँ ॥५६-५७॥ तुमलोग अपनी-अपनी आँखें मूँद लो, अभी गुहाके बाहर पहुँच जाओगे।"
उन्होंने ऐसा ही किया और तुरन्त ही पहले वनमें पहुँच गये ॥५८॥ इधर वह योगिनी भी उस गुहाको छोड़कर तत्काल श्रीरघुनाथजीके पास आयी और वहाँ सुग्रीव तथा लक्ष्मणजीके सहित उनका दर्शन किया ॥५९॥
उस बुद्धिमतीने श्रीरामचन्द्रजीकी प्रदक्षिणा कर उन्हें बारम्बार प्रणाम किया और फिर पुलकित-तनु होकर गद्गदवाणीसे इस प्रकार कहने लगी—॥६०॥ "हे राजाधिराज ! मैं आपकी दासी आपके दर्शनोंके लिये यहाँ आयी हूँ; मैंने आपका दर्शन पानेके लिये ही गुहामें रहकर सहस्रों वर्षोंसे बड़ी कठोर तपस्या की है। आज मेरा वह तप सफल हो गया। अहो !
| १८६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ६ |
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अद्य हि त्वां नमस्यामि मायायाः परतः स्थितम्६२<br>सर्वभूतेषु चालक्ष्यं बहिरन्तरवस्थितम् ।<br>योगमायाजवनिकाऽऽच्छन्नो मानुषविग्रहः ॥६३॥<br>न लक्ष्यसेऽज्ञानदृशां शैलूष इव रूपधृक् ।<br>महाभागवतानां त्वं भक्तियोगविधित्सया ॥६४॥<br>अवतीर्णोऽसि भगवन् कथं जानामि तामसी ।<br>लोके जानातु यः कश्चित्तव तत्त्वं रघूत्तम ॥६५॥<br>ममैतदेव रूपं ते सदा भातु हृदालये ।<br>राम ते पादयुगलं दर्शितं मोक्षदर्शनम् ॥६६॥<br>अदर्शनं भवार्णानां सन्मार्गपरिदर्शनम् ।<br>धनपुत्रकलत्रादिविभूतिपरिदर्पितः ।<br>अकिञ्चनधनं त्वाद्य नाभिधातुं जनोऽर्हति ॥६७॥<br>निवृत्तगुणमार्गाय निष्किञ्चनधनाय ते ॥६८॥<br>नमः स्वात्माभिरामाय निर्गुणाय गुणात्मने ।<br>कालरूपिणमीशानमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥६९॥<br>समं चरन्तं सर्वत्र मन्ये त्वां पुरुषं परम् ।<br>देव ते चेष्टितं कश्चिन्न वेद नृविडम्बनम् ॥७०॥<br>न तेऽस्ति कश्चिद्दयितो द्वेष्यो वाऽपर एव च ।<br>त्वन्मायापिहितात्मानस्त्वां पश्यन्ति तथाविधम् ॥<br>अजस्याकर्तुरीशस्य देवतिर्यङ्नरादिषु ।<br>जन्मकर्मादिकं यद्यत्तदत्यन्तविडम्बनम् ॥७२॥<br>त्वामाहुरक्षरं जातं कथाश्रवणसिद्धये ।<br>केचित्कोसलराजस्य तपसः फलसिद्धये ॥७३॥ | आज ( यह कैसा शुभ दिन है कि) मैं साक्षात् मायातीत तथा समस्त भूतोंमें अलक्षितभावसे बाहर-भीतर विराजमान आप परमेश्वरको प्रणाम कर रही हूँ। आप अपने शुद्धस्वरूपको योगमायासे आवृत कर मनुष्य-शरीरमें प्रकट हुए हैं। अतः जिस प्रकार मायिक-रूप धारण करनेवाले मायावीको साधारण पुरुष नहीं देख सकते उसी प्रकार आपके शुद्धस्वरूपको अज्ञानी लोग नहीं देख सकते । हे भगवन् ! आपने महान् भगवद्भक्तोंके भक्तियोगका विधान करनेके लिये ही अवतार लिया है। मैं तमोगुणी बुद्धिवाली आपको कैसे जान सकती हूँ ? हे रघुश्रेष्ठ ! संसारमें जो कोई आपका परमतत्त्व जानते हों वे उसे भले ही जाना करें, मेरे हृदयभवनमें तो सदा आपका यही रूप विराजमान रहे। हे राम ! आज मुझे आपके उन मोक्षदायक चरणकमलोंका दर्शन हुआ है, जो संसाररूपी सरिता-से पार करनेवाले और सन्मार्गका ज्ञान करानेवाले हैं ।<br>“हे आदिपुरुष ! जो मनुष्य धन, पुत्र, कलत्र और विभूति आदिके मदसे उन्मत्त हो रहा है वह आपकी स्तुति नहीं कर सकता, क्योंकि आप तो अकिञ्चनोंके ही सर्वस्व हैं ॥ ६१-६७॥ जो गुणोंकी पहुँचसे बाहर, निष्किञ्चनोंके धन, अपने आत्मस्वरूपमें ही रमण करनेवाले और (स्वरूपसे) निर्गुण तथा (आरोपसे) सगुण हैं, उन आपको मैं बारम्बार प्रणाम करती हूँ। मैं आपको कालरूपसे सबका नियन्ता, आदि, मध्य और अन्तसे रहित, सर्वत्र समानभावसे व्याप्त तथा परात्पर पुरुष मानती हूँ। हे देव ! मानव-चरित्रोंका अनुकरण करते हुए आप जो-जो लीलाएँ करते हैं उनका मर्म कोई भी नहीं जान सकता ॥ ६८-७० ॥ प्रभो ! आपका न कोई प्रिय है, न अप्रिय है और न उदासीन है। आपकी मायासे जिनके अन्तःकरण आवृत हैं वे ही लोग (अपनी-अपनी भावनाके अनुसार) आपको वैसा देखते हैं ॥ ७१ ॥ आप अजन्मा, अकर्ता और ईश्वर हैं, आपके जो देव, तिर्यक् और मनुष्य आदि योनियोंमें जन्म और कर्म होते हैं वह आपकी महान् लीला ही है ॥ ७२ ॥<br>“कहते हैं, आप अविनाशी ईश्वरने ( अपनी कीर्ति फैलाकर ) कथा-श्रवणकी सिद्धिके लिये ही अवतार लिया। कोई यह भी कहते हैं कि कोसलाधिपति
सर्ग ६ ] किष्किन्धाकाण्ड [ १८७
| कौसल्याया प्रार्थ्यमानं जातमाहुः परे जनाः।<br>दुष्टराक्षसभूभारहरणार्थार्थितो विभुः ॥७४॥<br>ब्रह्मणा नररूपेण जातोऽयमिति केचन ।<br>शृण्वन्ति गायन्ति च ये कथास्ते रघुनन्दन ॥७५॥<br>पश्यन्ति तव पादाब्जं भवार्णवसुतारणम् ।<br>त्वन्मायागुणबद्धाऽहं व्यतिरिक्तं गुणाश्रयम् ॥७६॥<br>कथं त्वां देव जानीयां स्तोतुं वाऽविषयं विभुम् ।<br>नमस्यामि रघुश्रेष्ठं वाणासनशरान्वितम् ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सुग्रीवादिभिरन्वितम् ॥७७॥ | महाराज दशरथको उनकी तपस्याका फल देनेके लिये आपने जन्म लिया है ॥ ७३ ॥ किन्हीं लोगोंका कहना है कि आप कौसल्याजीकी प्रार्थनासे प्रकट हुए हैं; तथा, किन्हीं-किन्हींका मत ऐसा भी है कि ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर भूमिके भारभूत राक्षसोंका नाश करनेके लिये ही आप सर्वव्यापक होते हुए भी मनुष्यरूपसे अवतीर्ण हुए हैं। हे रघुनन्दन ! जो लोग आपकी कथाओंको सुनेंगे या कहेंगे वे अवश्य ही संसार-सागरको पार करनेके लिये नौकारूप आपके चरण-कमलोंका दर्शन करेंगे। हे देव ! मैं आपकी मायाके गुणोंके वशीभूत हूँ, फिर उन गुणोंसे अत्यन्त पृथक् और उनके आश्रयरूप आपको मैं कैसे जान सकती हूँ ? ऐसे ही वाणीके विषय न होनेके कारण मैं आप विभुकी स्तुति भी कैसे कर सकती हूँ ? अतः भाई लक्ष्मण और सुग्रीवादि (पार्षदों ) के सहित आप धनुर्बाण-धारी रघुश्रेष्ठको मैं केवल प्रणाम करती हूँ” ॥७४–७७॥ |
| एवं स्तुतो रघुश्रेष्ठः प्रसन्नः प्रणताघहृत् ।<br>उवाच योगिनीं भक्तां किं ते मनसि काङ्क्षितम् ॥७८॥ | उसके इस प्रकार स्तुति करनेसे प्रणतपापापहारी श्रीरघुनाथजी अति प्रसन्न हुए और उस अनन्यभक्ता योगिनीसे बोले—"तेरी हार्दिक इच्छा क्या है ?" ॥७८॥ |
| सा प्राह राघवं भक्त्या भक्तिं ते भक्तवत्सल ।<br>यत्र कुत्रापि जाताया निश्चलां देहि मे प्रभो ॥७९॥<br>त्वद्भक्तेषु सदा सङ्गो भूयान्मे प्राकृतेषु न ।<br>जिह्वा मे रामरामेति भक्त्या वदतु सर्वदा ॥८०॥<br>मानसं श्यामलँ रूपं सीतालक्ष्मणसंयुतम् ।<br>धनुर्बाणधरं पीतवाससं मुकुटोज्ज्वलम् ॥८१॥<br>अङ्गदैर्नूपुरैर्मुक्ताहारैः कौस्तुभकुण्डलैः ।<br>भान्तं स्मरतु मे राम वरं नान्यं वृणे प्रभो ॥८२॥ | उसने अति भक्तिपूर्वक श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे भक्तवत्सल प्रभो ! मैं जहाँ कहीं भी जन्म लूँ आप मुझे अपनी अविचल भक्ति दीजिये ॥७९॥ प्रत्येक जन्ममें मेरा संग आपके भक्तोंसे ही हो, संसारी लोगोंसे न हो और मेरी जिह्वा सदा भक्तिपूर्वक 'राम-राम' ऐसा रटा करे ॥ ८० ॥ और हे राम ! मेरा मन आपकी उस शोभायमान श्यामल मूर्त्तिका श्रीसीताजी और लक्ष्मणके सहित सर्वदा चिन्तन करता रहे जो धनुष-बाण धारण किये हुए है तथा जो पीताम्बरधारी, मुकुट-विभूषित एवं भुजबन्द, नूपुर, मोतियोंकी माला, कौस्तुभ-मणि और कुण्डलोंसे सुशोभित है। हे प्रभो ! इसके सिवा मैं और कोई वर नहीं माँगती ॥ ८१-८२ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>भवत्वेवं महाभागे गच्छ त्वं बदरीवनम् ।<br>तत्रैव मां स्मरन्ती त्वं त्यक्त्वेदं भूतपञ्चकम् ।<br>मामेव परमात्मानमचिरात्प्रतिपद्यसे ॥८३॥ | श्रीरामचन्द्रजी बोले—हे महाभागे ! ऐसा ही होगा। अब तू बद्रिकाश्रमको जा, वहाँ मेरा स्मरण करती हुई तू शीघ्र ही इस पाञ्चभौतिक शरीरको छोड़कर मुझ परमात्माको ही प्राप्त हो जायगी ॥ ८३ ॥ |
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ७: वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पाति-से भेंट
| १८८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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| श्रुत्वा रघूत्तमवचोऽमृतसारकल्पं<br> गत्वा तदैव बदरीतरुखण्डजुष्टम् ।<br>तीर्थं तदा रघुपतिं मनसा स्मरन्ती<br> त्यक्त्वा कलेवरमवाप परं पदं सा ॥८४॥ | रघुनाथजीके ये अमृतके समान मधुर वचन सुनकर स्वयंप्रभा उसी समय पुण्यक्षेत्र बद्रिकाश्रमको चली गयी, जहाँ बहुत-से बेरीके वृक्ष लगे हुए हैं। वहाँ अपने अन्तःकरणमें श्रीरघुनाथजीका स्मरण करती हुई वह अन्तमें शरीर-पात होनेपर परमपदको प्राप्त हुई ॥८४॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तम सर्ग
वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पातिसे भेंट।
| श्रीमहादेव उवाच | |
|---|---|
| अथ तत्र समासीना वृक्षखण्डेषु वानराः ।<br>चिन्तयन्तो विमुह्यन्तः सीतामार्गणकर्शिताः ॥१॥ | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर, सीताजीकी खोजसे थके हुए वानरगण उस गुहाके समीप सघन वृक्षोंवाले स्थानपर बैठकर (सीताको न पानेके कारण) मोहित होकर आपसमें सोचने लगे ॥ १ ॥ |
| तत्रोवाचाङ्गदः कांश्चिद्वानरान् वानरर्षभः ।<br>भ्रमतां गह्वरेऽस्माकं मासो नूनं गतोऽभवत् ॥२॥ | उस समय वानरश्रेष्ठ अंगदजीने कुछ वानरोंसे कहा—"मालूम होता है इस कन्दरामें घूमते-घूमते हमारा एक मास अवश्य पूरा हो गया ॥ २ ॥ |
| सीता नाधिगतास्माभिर्न कृतं राजशासनम् ।<br>यदि गच्छाम किष्किन्धां सुग्रीवोऽस्मान् हनिष्यति | परन्तु अभीतक हमें सीताजी नहीं मिलीं । हम वानरराज सुग्रीवकी आज्ञाका पालन नहीं कर सके । अब यदि हम किष्किन्धापुरीको लौट चलें तो वह हमें अवश्य मार डालेगा ॥ ३ ॥ |
| विशेषतः शत्रुसुतं मां मिषाच्चिहनिष्यति ।<br>मयि तस्य कुतः प्रीतिरहं रामेण रक्षितः ॥ ४ ॥ | विशेषतः, अपने शत्रुके पुत्र मुझे तो वह इस मिषसे अवश्य ही मार डालेगा । मुझमें उसका प्रेम कहाँ हो सकता है ? मेरी रक्षा तो श्रीरामचन्द्रजीने ही की है ॥ ४ ॥ |
| इदानीं रामकार्यं मे न कृतं तन्मिषं भवेत् ।<br>तस्य मद्हनने नूनं सुग्रीवस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥ | अब मुझसे श्रीरघुनाथजीका कार्य नहीं सधा; अतः मेरा वध करनेके लिये उस दुरात्मा सुग्रीवको निश्चय ही यह अच्छा बहाना मिल जायगा ॥ ५ ॥ |
| मातृकल्पां भ्रातृभार्यां पापात्मानुभवत्यसौ ।<br>न गच्छेयमतः पार्श्वं तस्य वानरपुङ्गवाः ॥ ६ ॥<br>त्यक्ष्यामि जीवितं चात्र येन केनापि मृत्युना । | वह पापात्मा अपने बड़े भाईकी पत्नीको, जो उसकी माताके समान है, भोगता है; अतः हे वानरश्रेष्ठो ! मैं अब उसके पास तो जाऊँगा नहीं ॥ ६ ॥ किसी-न-किसी उपायसे यहीं अपने जीवनका अन्त कर दूँगा ।” |
| इत्यश्रुनयनं केचिद्दृष्ट्वा वानरपुङ्गवाः ॥ ७ ॥<br>व्यथिताः साश्रुनयना युवराजमथाब्रुवन् ॥ ८ ॥ | इस प्रकार उन्हें नेत्रोंमें जल भरे देखकर कितने ही प्रमुख वानरोंको बड़ा खेद हुआ और उन्होंने आँखोंमें आँसू भरकर युवराजसे कहा—॥ ७-८ ॥ |
| किमर्थं तव शोकोऽत्र वयं ते प्राणरक्षकाः ।<br>भवामो निवसामोऽत्र गुहायां भयवर्जिताः ॥ ९ ॥ | “आप इतना शोक क्यों करते हैं, हम सब आपके प्राणोंकी रक्षा करेंगे और निर्भय होकर इस गुहामें ही रहेंगे ॥ ९ ॥ इसमें जो नगर है वह अमरावतीपुरीके |
सर्ग ७] किष्किन्धाकाण्ड १८९
| सर्वसौभाग्यसहितं पुरं देवपुरोपमम् ।<br>शनैः परस्परं वाक्यं वदतां मारुतात्मजः ॥१०॥<br><br>श्रुत्वाऽऽङ्गदं समालिङ्गय प्रोवाच नयकोविदः ।<br>विचार्यते किमर्थं ते दुर्विचारो न युज्यते ॥११॥<br><br>राज्ञोऽत्यन्तप्रियस्त्वं हि तारापुत्रोऽतिवल्लभः ।<br>रामस्य लक्ष्मणात्प्रीतिस्त्वयि नित्यं प्रवर्धते ॥१२॥<br><br>अतो न राघवाद्भीतिस्तव राज्ञो विशेषतः ।<br>अहं तव हिते सक्तो वत्स नान्यं विचारय ॥१३॥<br><br>गुहावासश्च निर्भेद्य इत्युक्तं वानरैस्तु यत् ।<br>तदेतद्रामवाणानामभेद्यं किं जगत्त्रये ॥१४॥<br><br>ये त्वां दुर्बोधयन्त्येते वानरा वानरर्षभ ।<br>पुत्रदारादिकं त्यक्त्वा कथं स्थास्यन्ति ते त्वया ॥१५॥<br><br>अन्यद्गुह्यतमं वक्ष्ये रहस्यं शृणु मे सुत ।<br>रामो न मानुषो देवः साक्षान्नारायणोऽव्ययः ॥१६॥<br><br>सीता भगवती माया जनसम्मोहकारिणी ।<br>लक्ष्मणो भुवनाधारः साक्षाच्छेषः फणीश्वरः ॥१७॥<br><br>ब्रह्मणा प्रार्थिताः सर्वे रक्षोगणविनाशने ।<br>मायामानुषभावेन जाता लोकैकरक्षकाः ॥१८॥<br><br>वयं च पार्षदाः सर्वे विष्णोर्वैकुण्ठवासिनः ।<br>मनुष्यभावमापन्ने स्वेच्छया परमात्मनि ॥१९॥<br><br>वयं वानररूपेण जातास्तस्यैव मायया ।<br>वयं तु तपसा पूर्वमाराध्य जगतां पतिम् ॥२०॥<br><br>तेनैवानुगृहीताः स्मः पार्षदत्वमुपागताः ।<br>इदानीमपि तस्यैव सेवां कृत्वैव मायया ॥२१॥<br><br>पुनर्वैकुण्ठमासाद्य सुखं स्थास्यामहे वयम् ।<br><br>इत्यङ्कदमथ आश्वास्य गता विन्ध्यं महाचलम् ॥२२॥ | समान समस्त सुख-सामग्रियोंसे सम्पन्न है।” इस प्रकार उनके आपसमें धीरे-धीरे कहे हुए ये शब्द नीतिनिपुण श्रीहनुमान्जीके कानोंमें पड़े तो उन्होंने अंगदजीको हृदयसे लगाकर कहा—“अंगद ! तुम ऐसी चिन्ता क्यों करते हो, तुम्हें किसी प्रकारकी दुर्भावना न करनी चाहिये। तुम ताराके अत्यन्त लाडिले लाल हो, अतः महाराज सुग्रीवको भी तुम बहुत प्रिय हो। और श्रीरामचन्द्रजी-की तो तुममें नित्यप्रति लक्ष्मणजीसे भी अधिकं प्रीति बढ़ती जाती है ॥ १०-१२॥ इसलिये तुम्हें श्रीरघुनाथजी या राजा सुग्रीवसे किसी प्रकारका खटका न होना चाहिये। और फिर मैं भी सब प्रकार तुम्हारा हित करनेमें तत्पर हूँ। अतः हे वत्स ! तुम किसी ऐसी-वैसी बातकी चिन्ता मत करो ॥ १३ ॥ और इन वानरोंने जो कहा कि 'गुहामें किसी प्रकारका खटका न होगा' सो त्रिलोकीमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भगवान् रामके बाणोंके लिये अभेद्य हो ? ॥ १४ ॥ हे कपिश्रेष्ठ ! जो वानरगण तुम्हें यह बुरी सलाह दे रहे हैं वे भी अपनी स्त्री और बालकोंको छोड़कर तुम्हारे साथ कैसे रह सकेंगे ? ॥ १५ ॥<br><br>इसके सिवा, बेटा ! एक अत्यन्त गुप्त रहस्य और बताता हूँ, सावधान होकर सुनो—भगवान् राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं वे साक्षात् निर्विकार नारायणदेव हैं ॥ १६ ॥ भगवती सीताजी जगन्मोहिनी माया हैं और लक्ष्मणजी त्रिभुवनाधार साक्षात् नागनाथ शेषजी हैं ॥ १७ ॥ ये सब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे राक्षसोंका नाश करनेके लिये माया-मानवरूपसे उत्पन्न हुए हैं। इनमेंसे प्रत्येक त्रिलोकीकी रक्षा करनेमें समर्थ है ॥ १८॥ हम सब भी वैकुण्ठलोकमें रहनेवाले भगवान् विष्णुके पार्षद हैं। जब परमात्माने अपनी इच्छासे मनुष्यरूप धारण किया तो हम भी उन्हींकी माया-शक्तिसे वानररूपसे उत्पन्न हो गये। पूर्वकालमें हमने तपस्याद्वारा श्रीजगदीश्वरकी आराधना की थी; तब उन्हींकी कृपासे हम उनके पार्षद हुए थे। अब भी हम मायाकी प्रेरणासे उन्हींकी सेवा करते हुए अन्तमें फिर वैकुण्ठमें जाकर आनन्दपूर्वक ( उन्हींके साथ ) रहेंगे।”<br><br>इस प्रकार अंगदजीको ढाँढस बँधाकर वे सब |
| १९० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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विचिन्वन्तोऽथ शनकैर्जानकीं दक्षिणाम्बुधेः ।<br>तीरे महेन्द्राख्यगिरेः पवित्रं पादमाययुः ॥२३॥ | विन्ध्याचल पर्वतपर गये ॥ १९—२२ ॥ फिर धीरे-धीरे श्रीजानकीजीको खोजते हुए दक्षिण-समुद्रके तटपर महेन्द्रपर्वतकी पवित्र तराईमें पहुँचे ॥ २३ ॥ दृष्ट्वा समुद्रं दुष्पारमगाधं भयवर्धनम् ।<br>वानराः भयसन्त्रस्ताः किं कुर्म इति वादिनः ॥२४॥ | वहाँ पहुँचनेपर वे अपार, अगाध और भयको बढ़ानेवाले समुद्रको देखकर भयभीत हो गये और एक-दूसरेसे कहने लगे कि अब क्या करना चाहिये ? ॥२४॥ निषेधुरुदधेस्तीरे सर्वे चिन्तासमन्विताः ।<br>मन्त्रयामासुरन्योन्यमङ्गदाद्या महाबलाः ॥२५॥ | अंगद आदि समस्त महापराक्रमी वानर अति चिन्ता-ग्रस्त होकर समुद्रतटपर बैठ गये और आपसमें सलाह करने लगे—॥२५॥ भ्रमतो मे वने मासो गतोऽत्रैव गुहान्तरे ।<br>न दृष्टो रावणो वाऽद्य सीता वा जनकात्मजा ॥२६॥ | 'अहो ! वनमें घूमते-घूमते हमें एक मास तो उस गुहामें ही बीत गया । परन्तु रावण अथवा जनक-नन्दिनी सीताजीको हम अभीतक नहीं देख सके ॥ २६ ॥ सुग्रीवस्तीक्ष्णदण्डोऽस्मान्निहन्त्येव न संशयः ।<br>सुग्रीववधतोऽस्माकं श्रेयः प्रायोपवेशनम् ॥२७॥ | राजा सुग्रीव बड़ा दुर्दण्ड है, वह हमें निस्सन्देह मार डालेगा । सुग्रीवके हाथसे मरनेकी अपेक्षा तो प्रायोपवेशन ( अन्न-जल छोड़कर मर जाने) हीमें हमारा अधिक कल्याण है' ॥ २७ ॥ इति निश्चित्य तत्रैव दर्भानास्तीर्य सर्वतः ।<br>उपाविवेशुस्ते सर्वे मरणे कृतनिश्चयाः ॥२८॥ | ऐसा निर्णय करके वे सब जहाँ-तहाँ कुशा बिछाकर मरनेका निश्चय कर वहीं बैठ गये ॥ २८ ॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र महेन्द्राद्रिगुहान्तरात् ।<br>निर्गत्य शनकैरागाद्गृध्रः पर्वतसन्निभः ॥२९॥ | इसी समय महेन्द्रपर्वतकी कन्दरासे निकलकर वहाँ एक पर्वताकार गृध्र धीरे-धीरे चलकर आया ॥ २९ ॥ दृष्ट्वा प्रायोपवेशेन स्थितान्वानरपुङ्गवान् ।<br>उवाच शनकैर्गृध्रः प्राप्तो भक्ष्योऽद्य मे बहुः ॥३०॥ | उन बड़े-बड़े वानरोंको प्रायोपवेशनके लिये बैठे देख वह मन्द स्वरमें कहने लगा—"आज मुझे ( एक साथ ही ) बहुत-सा भक्ष्य प्राप्त हो गया ॥ ३० ॥ एकैकशः क्रमात्सर्वान् भक्ष्यामि दिनेदिने ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं वानरा भीतमानसाः ॥३१॥ | अब मैं इन सबको नित्यप्रति क्रमशः एक-एक करके खाऊँगा ।" भक्षयिष्यति नः सर्वानसौ गृध्रो न संशयः ।<br>रामकार्यं च नास्माभिः कृतं किञ्चिच्छरीश्वराः ॥३२॥ | गृध्रके ये वचन सुनकर वे समस्त वानर भयभीत होकर कहने लगे—॥ ३१ ॥ "अहो ! निस्सन्देह अब यह गृध्र हम सबको खा जायगा । हे वानरेश्वरगण ! हमसे न तो भगवान् रामका ही कुछ काम सधा और न सुग्रीवस्यापि च हितं न कृतं स्वात्मनामपि ।<br>वृथाऽनेन वधं प्राप्ता गच्छामो यमसादनम् ॥३३॥ | राजा सुग्रीवका या अपना ही कुछ हित हुआ; अब हम व्यर्थ इसके हाथसे मरकर यमलोकको जायेंगे ॥ ३२-३३ ॥ अहो जटायुर्धर्मात्मा रामस्यार्थे मृतः सुधीः ।<br>मोक्षं प्राप दुरावापं योगिनामप्यरिन्यमः ॥३४॥ | अहो ! धर्मात्मा जटायु धन्य है जिस बुद्धिमान्ने श्रीरामके कार्यमें अपने प्राण दे दिये । देखो, उस शत्रुदमनने वह मोक्षपद प्राप्त कर लिया जो योगियोंको भी दुर्लभ है" ॥ ३४ ॥ सम्पातिस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा वानरभाषितम् ।<br>के वा यूयं मम भ्रातुः कर्णपीयूषसन्निभम् ॥३५॥ | वानरोंके कहे हुए इस वाक्यको सुनकर सम्पाति बोला—"हे कपिश्रेष्ठगण ! आपलोग कौन हैं जो आपसमें, मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लगने-
सर्ग ७ ] किष्किन्धाकाण्ड १९१
जटायुरिति नामाद्य व्याहरन्तः परस्परम् ।
उच्यतां वो भयं माभून्मत्तः प्लवगसत्तमाः ॥३६॥
तमुवाचाङ्गदः श्रीमानुत्थितो गृध्रसन्निधौ ।
रामो दाशरथिः श्रीमान् लक्ष्मणेन समन्वितः ॥३७॥
सीतया भार्यया सार्धं विचचार महावने ।
तस्य सीता हृता साध्वी रावणेन दुरात्मना ॥३८॥
मृगयां निर्गते रामे लक्ष्मणे च हृता बलात् ।
रामरामेति क्रोशन्ती श्रुत्वा गृध्रः प्रतापवान् ॥३९॥
जटायुर्नाम पक्षीन्द्रो युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ।
रावणेन हतो वीरो राघवार्थे महाबलः ॥४०॥
रामेण दग्धो रामस्य सायुज्यमगमत्क्षणात् ।
रामः सुग्रीवमासाद्य सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ४१
सुग्रीवचोदितो हत्वा वालिनं सुदुरासदम् ।
राज्यं ददौ वानराणां सुग्रीवाय महाबलः ॥४२॥
सुग्रीवः प्रेषयामास सीतायाः परिमार्गणे ।
अस्मान्यानरवृन्दान्यै महासत्त्वान्महाबलः ॥४३॥
मासादार्वाङ्निवर्तध्वं नोचेत्प्राणान्हरामि वः ।
इत्याज्ञया भ्रमन्तोऽस्मिन्वने गह्वरमध्यगाः ॥४४॥
गतो मासो न जानीमः सीतां वा रावणं च वा ।
मर्तुं प्रायोपविष्टाः स्मस्तीरे लवणवारिधेः ॥४५॥
यदि जानासि हे पक्षिन्सीतां कथय नः शुभाम् ।
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा सम्पातिर्हृष्टमानसः ॥४६॥
उवाच मत्प्रियो भ्राता जटायुः प्लवगेश्वराः ।
बहुवर्षसहस्रान्ते भ्रातृवार्ता श्रुता मया ॥४७॥
वाक्साहाय्यं करिष्येऽहं भवतां प्लवगेश्वराः ।
वाला मेरे भाईका 'जटायु' नाम ले रहे हैं । आप मुझसे किसी प्रकारका भय न करके अपना वृत्तान्त कहिये ।" ॥ ३५-३६ ॥
तब श्रीमान् अंगदजी उठकर उस गृध्रके पास गये और बोले—"दशरथकुमार श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण और प्राणप्रिया सीताके सहित घोर दण्डकारण्यमें विचर रहे थे । वहाँ उनकी साध्वी भार्या सीताको दुरात्मा रावण हर ले गया ॥३७-३८॥ जिस समय राम और लक्ष्मण मृगयाके लिये गये हुए थे उसी समय वह बलात्कारसे उन्हें ले चला। उस समय वे 'हा राम ! हा राम !' कहकर रोने लगीं । उनका शब्द सुनकर महाप्रतापी पक्षिराज गृध्रवर जटायुने श्रीरघुनाथजीके लिये रावणसे घोर युद्ध किया, किन्तु अन्तमें वे महाबलवान् वीरवर रावणके हाथसे मारे गये ॥ ३९-४० ॥ फिर स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने उनका दाह-संस्कार किया और उन्होंने तत्काल भगवान् राममें ( लीन होकर ) सायुज्यमोक्ष प्राप्त किया । तदनन्तर श्रीरघुनाथजी सुग्रीवके पास आये और अग्निको साक्षी बनाकर उनसे मित्रता की ॥ ४१ ॥ फिर सुग्रीवके कहनेसे महाबली रामजीने अति दुर्जय वालीको मारा और वानरोंका राज्य सुग्रीवको दिया ॥ ४२ ॥ महाबली सुग्रीवने हमारे-जैसे अनेकों महापराक्रमी वानरोंको सीताकी खोजके लिये भेजा है ॥ ४३ ॥ और यह कह दिया है कि 'सब लोग एक मासके भीतर ही लौट आना नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा ।' उनकी आज्ञासे इस वनमें घूमते हुए हम एक गुहामें चले गये ॥ ४४ ॥ वहाँ हमारा मास समाप्त हो गया, किन्तु अभीतक हमें न तो सीताका पता चला है और न रावणका । अतः अब हम प्रायोपवेशन करके मरनेके लिये इस क्षार (खारी) समुद्रके तटपर बैठे हैं ॥ ४५ ॥ हे पक्षिन् ! यदि तुम्हें शुभलक्षणा सीताका कुछ पता हो तो बतलाओ ।"
अंगदके ये वचन सुनकर सम्पाति चित्तमें प्रसन्न होकर बोला—"हे कपीश्वरो ! जटायु मेरा परम प्रिय भाई था । आज कई सहस्र वर्षोंके अनन्तर मैंने भाईका समाचार सुना है ॥ ४६-४७ ॥ हे वानरो ! मैं बातोंसे अवश्य आपलोगोंकी कुछ सहायता करूँगा । पहले भाईको जलाञ्जलि देनेके लिये मुझे जलके पास ले
| १९२ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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| भ्रातुः सलिलदानाय नयध्वं मां जलान्तिकम् ॥४८॥<br>पश्चात्सर्वं शुभं वक्ष्ये भवतां कार्यसिद्धये ।<br>तथेति निन्युस्ते तीरं समुद्रस्य विहङ्गमम् ॥४९॥<br>सोऽपि तत्सलिले स्नात्वा भ्रातुर्दत्त्वा जलाञ्जलिम् ।<br>पुनः स्वस्थानमासाद्य स्थितो नीतो हरीश्वरैः ।<br>सम्पातिः कथयामास वानरान्परिहर्षयन् ॥५०॥<br>लङ्कानाम नगर्य्यास्ते त्रिकूटगिरिमूर्धनि ।<br>तत्राशोकवने सीता राक्षसीभिः सुरक्षिता ॥५१॥<br>समुद्रमध्ये सा लङ्का शतयोजनदूरतः ।<br>दृश्यते मे न सन्देहः सीता च परिदृश्यते ॥५२॥<br>गृध्रत्वादूरदृष्टिर्मे नात्र संशयितुं क्षमम् ।<br>शतयोजनविस्तीर्णं समुद्रं यस्तु लङ्घयेत् ॥५३॥<br>स एव जानकीं दृष्ट्वा पुनरायास्यति ध्रुवम् ।<br>अहमेव दुरात्मानं रावणं हन्तुमुत्सहे ।<br>भ्रातुर्हन्तारमेकाकी किन्तु पक्षविवर्जितः ॥५४॥<br>यतध्वं मतियत्नेन लङ्घितुं सरितां पतिम् ।<br>ततो हन्ता रघुश्रेष्ठो रावणं राक्षसाधिपम् ॥५५॥<br>उल्लङ्घ्य सिन्धुं शतयोजनायतं<br>लङ्कां प्रविश्याथ विदेहकन्यकाम् ।<br>दृष्ट्वा समाभाष्य च वारिधिं पुन-<br>र्त्तर्तुं समर्थः कतमो विचार्यताम् ॥५६॥ | चलो ॥४८॥ फिर आपलोगोंकी कार्य-सिद्धिके लिये जो ठीक होगा वह सब बतलाऊँगा।"<br><br>तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सम्पातिको समुद्रतटपर ले गये ॥४९॥ वहाँ पहुँचकर उसने जलमें स्नान कर भाईको जलाञ्जलि दी। तदनन्तर वानरगण उसे उसके स्थानपर ले गये। वहाँ बैठकर सम्पाति (अपने वचनसे) वानरोंको आनन्दित करता हुआ बोला—॥५०॥ "त्रिकूट-पर्वतपर लंका नामकी एक नगरी है। वहाँ श्रीसीताजी अशोकवनमें राक्षसियोंकी देख-रेखमें रहती हैं ॥५१॥ वह लंकापुरी यहाँसे सौ योजनकी दूरीपर समुद्रके बीचमें है। इसमें सन्देह नहीं मुझे तो वह और सीताजी यहींसे दीख रही हैं ॥५२॥ आपलोग इसमें सन्देह न करें। गृध्र होनेके कारण मेरी दृष्टि बहुत दूरतक जाती है। आपमेंसे जो कोई सौ योजन समुद्रको लाँघ सकता हो वही निश्चय जानकीजीको देखकर आ सकता है। मेरे भाईको मारनेवाले इस दुरात्मा रावणको मारनेमें तो मैं अकेला ही समर्थ हूँ; परन्तु (करूँ क्या?) मेरे पंख नहीं रहे ॥५३-५४॥ आपलोग किसी-न-किसी तरह समुद्र लाँघनेका प्रयत्न कीजिये; फिर राक्षसराज रावणको तो श्रीरघुनाथजी स्वयं मार डालेंगे ॥५५॥ आपलोग, अब यह विचार करें कि आपमेंसे ऐसा शक्तिशाली कौन है जो सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघकर लंकामें जाय और श्रीजानकीजीसे मिलकर तथा उनके साथ सम्भाषण कर फिर समुद्र पार करके लौट आवे" ॥५६॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥७॥
</div>किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ८: सम्पातीकी आत्मकथा
सर्ग ८ ] किष्किन्धाकाण्ड १९३
अष्टम सर्ग सम्पातिकी आत्मकथा।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहान्देवजी बोले—हे पार्वति ! यह सुनकर उन सब वानरोंने बड़े कुतूहल में भरकर सम्पातिसे पूछा—"भगवन् ! आप आरम्भसे ही अपना वृत्तान्त सुनाइये" ॥ १ ॥ तब सम्पातिने पहले जैसा-जैसा किया था वह सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा— पूर्वकालमें मैं और भाई जटायु जिस समय पूर्ण युवा थे बलके गर्वसे उन्मत्त होकर यह जाननेके लिये कि हममें कितना बल है, बड़े घमण्डसे आकाशमें सूर्यमण्डलपर्यन्त जानेको उड़े ॥ २-३ ॥ जब हम कई सहस्र योजन ऊँचे चले गये तो जटायु ( सूर्यके तेजसे ) जलने लगा। मैं उसकी रक्षाके लिये मोहवश उसे अपने पंखोंसे ढँककर चलने लगा और अन्तमें सूर्यकी किरणोंसे पंख जल जानेके कारण यहाँ विन्ध्याचलके शिखरपर गिर पड़ा और हे कपीश्वरो ! बहुत ऊँचेसे गिरनेके कारण मूर्च्छित हो गया ॥ ४-५ ॥ जब तीन दिन पश्चात् मुझे चेत हुआ तो पंख जल जानेसे मेरा चित्त भ्रममें पड़ गया और मैं यह कुछ भी न जान सका कि यह कौन-सा देश अथवा गिरिशिखर है ॥ ६ ॥ |
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| अथ ते कौतुकाविष्टाः सम्पातिं सर्ववानराः।<br>पप्रच्छुर्भगवन् ब्रूहि स्वमुदन्तं त्वमादितः॥ १ ॥ | |
| सम्पातिः कथयामास स्ववृत्तान्तं पुरा कृतम्।<br>अहं पुरा जटायुश्च भ्रातरौ रूढयौवनौ॥ २ ॥ | |
| बलेन दर्पितावावां बलजिज्ञासया खगौ।<br>सूर्यमण्डलपर्यन्तं गन्तुमुत्पतितौ मदात्॥ ३॥ | |
| बहुयोजनसाहस्रं गतौ तत्र प्रतापिताः।<br>जटायुस्तं परित्रातुं पक्षैराच्छाद्य मोहतः ॥ ४ ॥ | |
| स्थितोऽहं रश्मिभिर्दग्धपक्षोऽस्मिन्विन्ध्यमूर्धनि।<br>पतितो दूरपतनान्मूर्च्छितोऽहं कपीश्वराः॥ ५ ॥ | |
| दिनत्रयात्पुनः प्राणसहितो दग्धपक्षतः।<br>देशं वा गिरिकूटान्वा न जाने भ्रान्तमानसः॥ ६ ॥ | |
| शनैरून्मील्य नयने दृष्ट्वा तत्राश्रमं शुभम्।<br>शनैः शनैराश्रमस्य समीपं गतवानहम् ॥ ७ ॥ | फिर धीरे-धीरे नेत्र खोलनेपर मुझे वहाँ एक सुन्दर आश्रम दिखायी दिया। तब मैं शनैः-शनैः उस आश्रमके पास गया ॥ ७ ॥ वहाँ चन्द्रमा नामक मुनीश्वर रहते थे। उन्होंने मुझे देखकर विस्मयपूर्वक कहा—"सम्पाते ! यह क्या, तुम्हें आज इस प्रकार विरूप किसने कर दिया ? ॥ ८ ॥ मैं तुम्हें पहलेसे ही जानता हूँ; तुम तो बड़े बलवान् हो, फिर तुम्हारे पंख कैसे जल गये ? यदि तुम ठीक समझो तो अपना सब वृत्तान्त कहो" ॥ ९ ॥ |
| चन्द्रमा नाम मुनिराड् दृष्ट्वा मां विस्मितोऽवदत्।<br>सम्पाते किमिदं तेऽद्य विरूपं केन वा कृतम् ॥ ८ ॥ | |
| जानामि त्वामहं पूर्वमत्यन्तं बलवानसि।<br>दग्धौ किमर्थं ते पक्षौ कथयतां यदि मन्यसे ॥ ९ ॥ | |
| ततः स्वचेष्टितं सर्वं कथयित्वातिदुःखितः।<br>अब्रवं मुनिशार्दूलं दग्धोऽहं दाववह्निना ॥१०॥ | तब मैंने उन मुनिश्रेष्ठको अपनी सब करतूत सुनायी और फिर अति दुःखित होकर उनसे कहा—"अब मैं दावाग्निमें जल मरूँगा ॥ १० ॥ क्योंकि हे प्रभो ! बिना पंखोंके मैं किस प्रकार जीवन धारणकर सकता हूँ ?" |
| कथं धारयितुं शक्तो विपक्षो जीवितं प्रभो। | |
| इत्युक्तोऽथ मुनिर्वीक्ष्य मां दयार्द्रविलोचनः॥११॥ | मेरे इस प्रकार कहनेपर मुनिवर दयावश नेत्रोंमें |
२५
| १९४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ८ |
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शृणु वत्स वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ।<br>देहमूलमिदं दुःखं देहः कर्मसमुद्भवः ॥१२॥ | जल भरकर मेरी ओर देखते हुए बोले—॥ ११ ॥<br>“वत्स ! अब तुम मेरी बात सुनो । उसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करना । इस दुःखका आश्रय देह ही है और देह कर्मजन्य है ॥ १२ ॥ कर्म प्रवर्तते देहेऽहंबुद्ध्या पुरुषस्य हि ।<br>अहङ्कारस्त्वनादिः स्यादाविद्यासम्भवो जडः॥१३॥ | पुरुष जब देहमें अहं-बुद्धि करता है तभी कर्मकी प्रवृत्ति होती है; और यह अविद्या-जनित जड अहंकार अनादि है ॥ १३ ॥ चिच्छायाया सदा युक्तस्तप्तायःपिण्डवत्सदा ।<br>तेन देहस्य तादात्म्याद्देहश्चेतनवान्भवेत् ॥१४॥ | ( अग्निसे व्याप्त ) तप्त लोहपिण्डके समान यह अहंकार सर्वदा चिदाभाससे व्याप्त है । उस चिदाभासविशिष्ट अहंकारका देहसे तादात्म्य (ऐक्य) होनेके कारण देह चेतनायुक्त होता है ॥ १४ ॥ देहोऽहमिति बुद्धिः स्यादात्मनोऽहङ्कृतेर्बलात् ।<br>तन्मूल एष संसारः सुखदुःखादिसाधकः ॥१५॥ | अहंकारके कारण ही आत्माको ‘मैं देह हूँ’ यह बुद्धि होती है और उसके कारण यह सुख-दुःखादिका देनेवाला जन्म-मरणरूप संसार प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ आत्मनो निर्विकारस्य मिथ्या तादात्म्यतः सदा ।<br>देहोऽहं कर्मकर्ताहमिति सङ्कल्प्य सर्वदा ॥१६॥<br>जीवः करोति कर्माणि तत्फलैर्बद्ध्यतेऽवशः ।<br>ऊर्ध्वाधो भ्रमते नित्यं पापपुण्यात्मकः स्वयम् ॥१७॥ | निर्विकार आत्माके साथ देहके इस मिथ्या तादात्म्यसे ही जीव सर्वदा यह संकल्प करके कि ‘मैं देह हूँ और कर्मोंका करनेवाला हूँ’ नाना प्रकारके कर्म करता है तथा विवश होकर उनके फलोंसे बँधता है । और इस प्रकार पाप-पुण्यके वशीभूत होकर सदा ऊँची-नीची योनियोंमें भ्रमता रहता है ॥ १६-१७ ॥ कृतं मयाऽधिकं पुण्यं यज्ञदानादि निश्चितम् ।<br>स्वर्गं गत्वा सुखं भोक्ष्य इति सङ्कल्पवान्भवेत्॥१८॥ | वह ऐसे संकल्प करने लगता है कि मैंने यज्ञ, दान आदि बहुत-से पुण्य-कर्म किये हैं अतः मैं निश्चय ही स्वर्गमें जाकर सुख भोगूँगा ॥ १८ ॥ तथैवाध्यासतस्तत्र चिरं भुक्त्वा सुखं महत् ।<br>क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन्कर्मचोदितः ॥१९॥ | ऐसे अध्याससे वह वहाँ ( जाकर ) चिरकालतक महान् सुख भोगता है और अन्तमें पुण्यक्षय हो जानेपर प्रारब्धकी प्रेरणासे, इच्छा न रहते हुए भी, नीचे गिरता है ॥ १९ ॥ पतित्वा मण्डले चेन्दोस्ततो नीहारसंयुतः ।<br>भूमौ पतित्वा व्रीह्यादौ तत्र स्थित्वा चिरं पुनः॥२०॥ | “पहले वह चन्द्रमण्डलपर गिरता है । वहाँसे (चन्द्र-रश्मियोंके द्वारा) कुहरेके रूपमें पृथ्वीपर आकर बहुत दिनोंतक व्रीहि आदि धान्योंमें रहता है ॥२०॥ भूत्वा चतुर्विधं भोज्यं पुरुषैर्भुज्यते ततः ।<br>रेतो भूत्वा पुनस्तेन ऋतौ स्त्रीयोनिसिञ्चितः॥२१॥ | फिर वह (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य) चार प्रकारके अन्न रूपसे पुरुषोंद्वारा खाया जाता है और वीर्यरूपमें परिणत हो जाता है तदनन्तर वह उसके द्वारा ऋतुकालमें स्त्रीकी योनिमें डाला जाता है ॥ २१ ॥ योनिरक्तेन संयुक्तं जरायुपरिवेष्टितम् ।<br>दिनेनैकेन कललं भूत्वा रूढत्वमाप्नुयात् ॥२२॥ | योनिमें स्थित रजसे मिलकर वह एक दिनमें ही झिल्लीसे लिपटे हुए कललके रूपमें परिणत होकर कुछ कठिन-सा हो जाता है ॥ २२ ॥ तत्पुनः पञ्चरात्रेण बुद्बुदाकारतामियात् ।<br>सप्तरात्रेण तदपि मांसपेशित्वमाप्नुयात् ॥२३॥ | फिर पाँच रात्रिमें वह बुद्बुदाकार हो जाता है और सात रात्रि बीतनेपर मांसपेशीके समान ( अण्डाकार ) हो जाता है ॥ २३ ॥ पन्द्रह दिनके
सर्ग ८ ] किष्किन्धाकाण्ड १९५
पक्षमात्रेण सा पेशी रुधिरेण परिप्लुता ।
तस्या एवाङ्कुरोत्पत्तिः पञ्चविंशतिरात्रिषु ॥२४॥
भीतर उस पेशीमें रुधिर भर जाता है और पच्चीस रात्रिके पश्चात् उसमें अंकुर उत्पन्न होने लगते हैं ॥ २४ ॥
ग्रीवा शिरश्च स्कन्धश्च पृष्ठवंशस्तथोदरम् ।
पञ्चधाङ्गानि चैकैकं जायन्ते मासतः क्रमात् ॥२५॥
एक मास हो जानेपर उसमें एक-एक करके क्रमशः ग्रीवा, शिर, कन्धे, रीढ़की हड्डी और पेट ये पाँच अङ्ग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २५ ॥
पाणिपादौ तथा पार्श्वः कटिर्जङ्घे तथैव च ।
मासद्वयात्प्रजायन्ते क्रमेणैव न चान्यथा ॥२६॥
फिर दो महीनेमें क्रमशः हाथ, पाँव, पसलियाँ, कमर और घुटने बन जाते हैं। इस क्रममें कभी भेद नहीं पड़ता ॥ २६ ॥
त्रिभिर्मासैः प्रजायन्ते अङ्गानां सन्धयः क्रमात् ।
सर्वाङ्गुल्यः प्रजायन्ते क्रमान्मासचतुष्टये ॥२७॥
इसी क्रमसे तीन महीनेमें उसमें अङ्गोंकी सन्धियाँ तथा चार महीनेमें समस्त अङ्गुलियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ॥ २७ ॥
नासा कर्णौ च नेत्रे च जायन्ते पञ्चमासतः ।
दन्तपङ्क्तिर्नखा गुह्यं पञ्चमे जायते तथा ॥२८॥
पाँच मास होनेपर नाक, कान और नेत्र बनते हैं तथा पाँचवें मासमें ही दन्तावली, नख और गुह्य स्थान भी उत्पन्न होते हैं ॥ २८ ॥
अर्वाक्पण्मासतश्छिद्रं कर्णयोर्भवति स्फुटम् ।
पायुर्मेढ्रमुपस्थं च नाभिश्चापि भवेन्नृणाम् ॥२९॥
छठे मासके आरम्भमें ही कानोंके छिद्र स्पष्ट हो जाते हैं तथा इसी समय गुदा, स्त्री-पुरुषके भेदसे योनि अथवा लिंग तथा नाभि उत्पन्न होते हैं ॥ २९ ॥
सप्तमे मासि रोमाणि शिरः केशास्तथैव च ।
विभक्तावयवत्वं च सर्वं सम्पद्यतेऽष्टमे ॥३०॥
सातवें महीनेमें रोम और शिरके केश प्रकट होते हैं तथा आठवें महीनेमें सब अङ्गोपांग अलग-अलग स्पष्ट हो जाते हैं ॥ ३० ॥
जठरे वर्धते गर्भः स्त्रिया एवं विहङ्गम ।
पञ्चमे मासि चैतन्यं जीवः प्राप्नोति सर्वशः ॥३१॥
"हे पक्षिन् ! इस प्रकार स्त्रीके गर्भाशयमें गर्भ बढ़ता है। जिस समय पाँचवाँ महीना होता है उसी समय जीवको चेतना-शक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥
नाभिद्युन्नालपरन्ध्रेण मातृभुक्तान्नसारतः ।
वर्धते गर्भंगः पिण्डो न म्रियेत स्वकर्मतः ॥३२॥
गर्भस्थित पिण्ड अपनी नाभिमें लगे हुए नालके सूक्ष्म छिद्रसे प्राप्त माताके खाये हुए अन्नके रससे बढ़ता है और अपने कर्म-वश मरता नहीं है ॥ ३२ ॥
स्मृत्वा सर्वाणि जन्मानि पूर्वकर्माणि सर्वशः ।
जठरानलतप्तोऽयमिदं वचनमब्रवीत् ॥३३॥
उस समय अपने सम्पूर्ण पूर्व-जन्मोंका और कर्मोंका स्मरण करके जठरानलसे सन्तप्त हुआ यह जीव इस प्रकार कहता है—॥ ३३ ॥
नानायोनिसहस्रेषु जायमानोऽनुभूतवान् ।
पुत्रदारादिसम्बन्धं कोटिशः पशुबान्धवान् ॥३४॥
"पहले कई सहस्र योनियोंमें उत्पन्न होकर मैंने करोड़ों बन्धु-बान्धव, पशुवर्ग और स्त्री-पुत्रादिके सम्बन्धका अनुभव किया है ॥ ३४ ॥
कुटुम्बभरणासक्त्या न्यायान्यायैरथार्जनम् ।
कृतं नाकरवं विष्णुचिन्तां स्वप्नेऽपि दुर्भगः ॥३५॥
मुझ अभागेने उस समय स्वप्नमें भी भगवान् विष्णुका स्मरण नहीं किया; बस, अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें आसक्त होकर न्याय अथवा अन्यायसे धन कमानेमें ही लगा रहा ॥ ३५ ॥
इदानीं तत्फलं भुङ्गे गर्भदुःखं महत्तरम् ।
अशाश्वते शाश्वतवद्देहे तृष्णासमन्वितः ॥३६॥
अब उसका फलरूप यह अति महान् गर्भ-दुःख भोग रहा हूँ और इस नश्वर देहको नित्य-सा समझकर इसकी तृष्णामें फँसा हुआ हूँ ॥ ३६ ॥
अकार्याण्येव कृतवान्न कृतं हितमात्मनः ।
इत्येवं बहुधा दुःखमनुभूय स्वकर्मतः ॥३७॥
मैं सदा अकार्य कर्म ही करता रहा, कभी अपना हित-साधन नहीं किया। अतः अपने कर्मानुसार मैं इसी प्रकार बहुत-से दुःख भोगता रहा ॥ ३७ ॥ अब