भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ८ ] किष्किन्धाकाण्ड १९५


पक्षमात्रेण सा पेशी रुधिरेण परिप्लुता ।
तस्या एवाङ्कुरोत्पत्तिः पञ्चविंशतिरात्रिषु ॥२४॥
भीतर उस पेशीमें रुधिर भर जाता है और पच्चीस रात्रिके पश्चात् उसमें अंकुर उत्पन्न होने लगते हैं ॥ २४ ॥

ग्रीवा शिरश्च स्कन्धश्च पृष्ठवंशस्तथोदरम् ।
पञ्चधाङ्गानि चैकैकं जायन्ते मासतः क्रमात् ॥२५॥
एक मास हो जानेपर उसमें एक-एक करके क्रमशः ग्रीवा, शिर, कन्धे, रीढ़की हड्डी और पेट ये पाँच अङ्ग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २५ ॥

पाणिपादौ तथा पार्श्वः कटिर्जङ्घे तथैव च ।
मासद्वयात्प्रजायन्ते क्रमेणैव न चान्यथा ॥२६॥
फिर दो महीनेमें क्रमशः हाथ, पाँव, पसलियाँ, कमर और घुटने बन जाते हैं। इस क्रममें कभी भेद नहीं पड़ता ॥ २६ ॥

त्रिभिर्मासैः प्रजायन्ते अङ्गानां सन्धयः क्रमात् ।
सर्वाङ्गुल्यः प्रजायन्ते क्रमान्मासचतुष्टये ॥२७॥
इसी क्रमसे तीन महीनेमें उसमें अङ्गोंकी सन्धियाँ तथा चार महीनेमें समस्त अङ्गुलियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ॥ २७ ॥

नासा कर्णौ च नेत्रे च जायन्ते पञ्चमासतः ।
दन्तपङ्क्तिर्नखा गुह्यं पञ्चमे जायते तथा ॥२८॥
पाँच मास होनेपर नाक, कान और नेत्र बनते हैं तथा पाँचवें मासमें ही दन्तावली, नख और गुह्य स्थान भी उत्पन्न होते हैं ॥ २८ ॥

अर्वाक्पण्मासतश्छिद्रं कर्णयोर्भवति स्फुटम् ।
पायुर्मेढ्रमुपस्थं च नाभिश्चापि भवेन्नृणाम् ॥२९॥
छठे मासके आरम्भमें ही कानोंके छिद्र स्पष्ट हो जाते हैं तथा इसी समय गुदा, स्त्री-पुरुषके भेदसे योनि अथवा लिंग तथा नाभि उत्पन्न होते हैं ॥ २९ ॥

सप्तमे मासि रोमाणि शिरः केशास्तथैव च ।
विभक्तावयवत्वं च सर्वं सम्पद्यतेऽष्टमे ॥३०॥
सातवें महीनेमें रोम और शिरके केश प्रकट होते हैं तथा आठवें महीनेमें सब अङ्गोपांग अलग-अलग स्पष्ट हो जाते हैं ॥ ३० ॥

जठरे वर्धते गर्भः स्त्रिया एवं विहङ्गम ।
पञ्चमे मासि चैतन्यं जीवः प्राप्नोति सर्वशः ॥३१॥
"हे पक्षिन् ! इस प्रकार स्त्रीके गर्भाशयमें गर्भ बढ़ता है। जिस समय पाँचवाँ महीना होता है उसी समय जीवको चेतना-शक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥

नाभिद्युन्नालपरन्ध्रेण मातृभुक्तान्नसारतः ।
वर्धते गर्भंगः पिण्डो न म्रियेत स्वकर्मतः ॥३२॥
गर्भस्थित पिण्ड अपनी नाभिमें लगे हुए नालके सूक्ष्म छिद्रसे प्राप्त माताके खाये हुए अन्नके रससे बढ़ता है और अपने कर्म-वश मरता नहीं है ॥ ३२ ॥

स्मृत्वा सर्वाणि जन्मानि पूर्वकर्माणि सर्वशः ।
जठरानलतप्तोऽयमिदं वचनमब्रवीत् ॥३३॥
उस समय अपने सम्पूर्ण पूर्व-जन्मोंका और कर्मोंका स्मरण करके जठरानलसे सन्तप्त हुआ यह जीव इस प्रकार कहता है—॥ ३३ ॥

नानायोनिसहस्रेषु जायमानोऽनुभूतवान् ।
पुत्रदारादिसम्बन्धं कोटिशः पशुबान्धवान् ॥३४॥
"पहले कई सहस्र योनियोंमें उत्पन्न होकर मैंने करोड़ों बन्धु-बान्धव, पशुवर्ग और स्त्री-पुत्रादिके सम्बन्धका अनुभव किया है ॥ ३४ ॥

कुटुम्बभरणासक्त्या न्यायान्यायैरथार्जनम् ।
कृतं नाकरवं विष्णुचिन्तां स्वप्नेऽपि दुर्भगः ॥३५॥
मुझ अभागेने उस समय स्वप्नमें भी भगवान् विष्णुका स्मरण नहीं किया; बस, अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें आसक्त होकर न्याय अथवा अन्यायसे धन कमानेमें ही लगा रहा ॥ ३५ ॥

इदानीं तत्फलं भुङ्गे गर्भदुःखं महत्तरम् ।
अशाश्वते शाश्वतवद्देहे तृष्णासमन्वितः ॥३६॥
अब उसका फलरूप यह अति महान् गर्भ-दुःख भोग रहा हूँ और इस नश्वर देहको नित्य-सा समझकर इसकी तृष्णामें फँसा हुआ हूँ ॥ ३६ ॥

अकार्याण्येव कृतवान्न कृतं हितमात्मनः ।
इत्येवं बहुधा दुःखमनुभूय स्वकर्मतः ॥३७॥
मैं सदा अकार्य कर्म ही करता रहा, कभी अपना हित-साधन नहीं किया। अतः अपने कर्मानुसार मैं इसी प्रकार बहुत-से दुःख भोगता रहा ॥ ३७ ॥ अब