भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१९४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ८

शृणु वत्स वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ।<br>देहमूलमिदं दुःखं देहः कर्मसमुद्भवः ॥१२॥ | जल भरकर मेरी ओर देखते हुए बोले—॥ ११ ॥<br>“वत्स ! अब तुम मेरी बात सुनो । उसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करना । इस दुःखका आश्रय देह ही है और देह कर्मजन्य है ॥ १२ ॥ कर्म प्रवर्तते देहेऽहंबुद्ध्या पुरुषस्य हि ।<br>अहङ्कारस्त्वनादिः स्यादाविद्यासम्भवो जडः॥१३॥ | पुरुष जब देहमें अहं-बुद्धि करता है तभी कर्मकी प्रवृत्ति होती है; और यह अविद्या-जनित जड अहंकार अनादि है ॥ १३ ॥ चिच्छायाया सदा युक्तस्तप्तायःपिण्डवत्सदा ।<br>तेन देहस्य तादात्म्याद्देहश्चेतनवान्भवेत् ॥१४॥ | ( अग्निसे व्याप्त ) तप्त लोहपिण्डके समान यह अहंकार सर्वदा चिदाभाससे व्याप्त है । उस चिदाभासविशिष्ट अहंकारका देहसे तादात्म्य (ऐक्य) होनेके कारण देह चेतनायुक्त होता है ॥ १४ ॥ देहोऽहमिति बुद्धिः स्यादात्मनोऽहङ्कृतेर्बलात् ।<br>तन्मूल एष संसारः सुखदुःखादिसाधकः ॥१५॥ | अहंकारके कारण ही आत्माको ‘मैं देह हूँ’ यह बुद्धि होती है और उसके कारण यह सुख-दुःखादिका देनेवाला जन्म-मरणरूप संसार प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ आत्मनो निर्विकारस्य मिथ्या तादात्म्यतः सदा ।<br>देहोऽहं कर्मकर्ताहमिति सङ्कल्प्य सर्वदा ॥१६॥<br>जीवः करोति कर्माणि तत्फलैर्बद्ध्यतेऽवशः ।<br>ऊर्ध्वाधो भ्रमते नित्यं पापपुण्यात्मकः स्वयम् ॥१७॥ | निर्विकार आत्माके साथ देहके इस मिथ्या तादात्म्यसे ही जीव सर्वदा यह संकल्प करके कि ‘मैं देह हूँ और कर्मोंका करनेवाला हूँ’ नाना प्रकारके कर्म करता है तथा विवश होकर उनके फलोंसे बँधता है । और इस प्रकार पाप-पुण्यके वशीभूत होकर सदा ऊँची-नीची योनियोंमें भ्रमता रहता है ॥ १६-१७ ॥ कृतं मयाऽधिकं पुण्यं यज्ञदानादि निश्चितम् ।<br>स्वर्गं गत्वा सुखं भोक्ष्य इति सङ्कल्पवान्भवेत्॥१८॥ | वह ऐसे संकल्प करने लगता है कि मैंने यज्ञ, दान आदि बहुत-से पुण्य-कर्म किये हैं अतः मैं निश्चय ही स्वर्गमें जाकर सुख भोगूँगा ॥ १८ ॥ तथैवाध्यासतस्तत्र चिरं भुक्त्वा सुखं महत् ।<br>क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन्कर्मचोदितः ॥१९॥ | ऐसे अध्याससे वह वहाँ ( जाकर ) चिरकालतक महान् सुख भोगता है और अन्तमें पुण्यक्षय हो जानेपर प्रारब्धकी प्रेरणासे, इच्छा न रहते हुए भी, नीचे गिरता है ॥ १९ ॥ पतित्वा मण्डले चेन्दोस्ततो नीहारसंयुतः ।<br>भूमौ पतित्वा व्रीह्यादौ तत्र स्थित्वा चिरं पुनः॥२०॥ | “पहले वह चन्द्रमण्डलपर गिरता है । वहाँसे (चन्द्र-रश्मियोंके द्वारा) कुहरेके रूपमें पृथ्वीपर आकर बहुत दिनोंतक व्रीहि आदि धान्योंमें रहता है ॥२०॥ भूत्वा चतुर्विधं भोज्यं पुरुषैर्भुज्यते ततः ।<br>रेतो भूत्वा पुनस्तेन ऋतौ स्त्रीयोनिसिञ्चितः॥२१॥ | फिर वह (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य) चार प्रकारके अन्न रूपसे पुरुषोंद्वारा खाया जाता है और वीर्यरूपमें परिणत हो जाता है तदनन्तर वह उसके द्वारा ऋतुकालमें स्त्रीकी योनिमें डाला जाता है ॥ २१ ॥ योनिरक्तेन संयुक्तं जरायुपरिवेष्टितम् ।<br>दिनेनैकेन कललं भूत्वा रूढत्वमाप्नुयात् ॥२२॥ | योनिमें स्थित रजसे मिलकर वह एक दिनमें ही झिल्लीसे लिपटे हुए कललके रूपमें परिणत होकर कुछ कठिन-सा हो जाता है ॥ २२ ॥ तत्पुनः पञ्चरात्रेण बुद्बुदाकारतामियात् ।<br>सप्तरात्रेण तदपि मांसपेशित्वमाप्नुयात् ॥२३॥ | फिर पाँच रात्रिमें वह बुद्बुदाकार हो जाता है और सात रात्रि बीतनेपर मांसपेशीके समान ( अण्डाकार ) हो जाता है ॥ २३ ॥ पन्द्रह दिनके