अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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१४६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १०
| सम्पूज्य विधिवद्रामं ससौमित्रिं सपर्यया ।<br>सङ्गृहीतानि दिव्यानि रामार्थं शबरी मुदा ॥८॥<br>फलान्यमृतकल्पानि ददौ रामाय भक्तितः ।<br>पादौ सम्पूज्य कुसुमैः सुगन्धैः सानुलेपनैः ॥९॥ | विविध सामग्रियोंसे राम और लक्ष्मणका विधिवत् पूजन-कर जो अमृतके समान दिव्य फल उसने श्रीरामचन्द्रजीके लिये इकट्ठे कर रखे थे वे अत्यन्त हर्षसे लाकर उन्हें दिये और उनके चरण-कमलोंका सुगन्धित पुष्प और चन्दन आदिसे पूजन किया ॥ ८-९ ॥ |
| कृतातिथ्यं रघुश्रेष्ठमुपविष्टं सहानुजम् ।<br>शबरी भक्तिसम्पन्ना प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥१०॥ | इसप्रकार आतिथ्य-सत्कार हो चुकनेपर जब श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके सहित आसनपर विराजमान थे, शबरीने भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर कहा— ॥ १०॥ |
| अत्राश्रमे रघुश्रेष्ठ गुरवो मे महर्षयः ।<br>स्थिताः शुश्रूषणं तेषां कुर्वती समुपस्थिता ॥११॥<br>बहुवर्षसहस्राणि गतास्ते ब्रह्मणः पदम् ।<br>गमिष्यन्तोऽब्रुवन्मां त्वं वसात्रैव समाहिता ॥१२॥<br>रामो दाशरथिर्जातः परमात्मा सनातनः ।<br>राक्षसानां वधार्थाय ऋषीणां रक्षणाय च ॥१३॥<br>आगमिष्यति सैकाग्रध्यानानिष्ठा स्थिरा भव ।<br>इदानीं चित्रकूटार्द्रावाश्रमे वसति प्रभुः ॥१४॥<br>यावदागमनं तस्य तावद्रक्ष कलेवरम् ।<br>दृष्ट्वैव राघवं दग्ध्वा देहं यास्यसि तत्पदम् ॥१५॥ | "हे रघुश्रेष्ठ ! इस आश्रममें पहले मेरे गुरु महर्षि ( मतंग ) रहा करते थे; मैं उनकी सेवा-शुश्रूषा करती हुई यहाँ हज़ारों वर्षोंसे रहती हूँ। अब वे महर्षिश्रेष्ठ ब्रह्मलोकको चले गये हैं। जाते समय उन्होंने मुझसे कहा था कि तू एकाग्रचित्त होकर यहीं रह ॥ ११-१२ ॥ सनातन परमात्माने राक्षसोंको मारने और ऋषियोंकी रक्षा करनेके लिये राजा दशरथके पुत्र रामरूपसे अवतार लिया है ॥ १३ ॥ वे (शीघ्र ही) यहाँ आयेंगे। तू एकाग्र-चित्तसे उनका ध्यान करती हुई यहाँ रह। आजकल भगवान् रामजी चित्रकूट पर्वतके आश्रममें विराजमान हैं ॥ १४ ॥ जबतक वे आवें तबतक तू अपने शरीरका पालन कर। रघुनाथजीके आनेपर उनका दर्शन करते हुए इस शरीरको जलाकर तू उनके परमधामको चली जायगी ॥ १५ ॥ |
| तथैवाकरवं राम त्वद्ध्यानैकपरायणा ।<br>प्रतीक्ष्यागमनं तेऽद्य सफलं गुरुभाषितम् ॥१६॥ | हे राम ! गुरुजीके कथनानुसार मैं तभीसे आपका ध्यान करती हुई आपके आनेकी बाट देख रही थी। आज गुरुजीका वह वाक्य सफल हो गया ॥ १६ ॥ |
| तव सन्दर्शनं राम गुरूणामपि मे नहि ।<br>योषिन्मूढाऽप्रमेयात्मन् हीनजातिसमुद्भवा ॥१७॥ | हे राम ! आपका दर्शन तो मेरे गुरुदेवको भी नहीं हुआ। फिर हे अप्रमेयात्मन् ! मैं तो नीच-जातिमें उत्पन्न हुई एक गँवारी नारी ही हूँ ! मेरी तो बात ही क्या है ? ॥ १७ ॥ |
| तव दासस्य दासानां शतसङ्ख्योत्तरस्य वा ।<br>दासीत्वे नाधिकारोऽस्ति कुतः साक्षात्तवैव हि ॥१८॥ | जो आपके दासोंके दास हैं उनके भी जो उत्तरोत्तर सैकड़ों दासानुदास हैं मैं तो उनकी दासी होनेकी भी अधिकारिणी नहीं हूँ; फिर साक्षात् आपकी दासी कहलानेका तो मेरा मुँह ही कहाँ है ? ॥ १८ ॥ |
| कथं रामाद्य मे दृष्टस्त्वं मनोवागगोचरः ।<br>स्तोतुं न जाने देवेश किं करोमि प्रसीद मे ॥१९॥ | हे राम ! आप तो मन या वाणीके विषय नहीं हैं फिर न जाने आज मुझे आपका दर्शन कैसे हो गया। हे देवेश्वर ! मैं आपकी स्तुति करना नहीं जानती। अब मैं क्या करूँ? प्रभो ! आप स्वयं ही (अपनी दयालुतासे) मुझपर प्रसन्न होइये" ॥ १९ ॥ |