भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १० ] अरण्यकाण्ड १४७


श्रीराम उवाचश्रीरामचन्द्रजी बोले—पुरुषत्व-स्त्रीत्वका भेद अथवा
पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनामाश्रमादयः ।जाति, नाम और आश्रम—ये कोई भी मेरे भजन-
न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम् ॥२०॥के कारण नहीं हैं। उसका कारण तो एकमात्र मेरी भक्ति ही है ॥२०॥ जो मेरी भक्तिसे विमुख हैं वे
यज्ञदानतपोभिर्वा वेदाध्ययनकर्मभिः ।यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्मसे
नैवं द्रष्टुमंहं शक्यो मद्भक्तिविमुखैः सदा ॥२१॥मुझे कभी नहीं देख सकते ॥२१॥ अतः हे भामिनि ! मैं संक्षेपसे अपनी भक्तिके साधनोंका वर्णन
तस्माद्भाभिनि सङ्क्षेपाद्वक्ष्येऽहं भक्तिसाधनम् ।करता हूँ। उनमें पहला साधन तो सत्सङ्ग ही है
सतां सङ्गतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम् ॥२२॥॥२२॥ मेरे जन्म-कर्मोंकी कथाका कीर्तन करना
द्वितीयं मत्कथालापस्तृतीयं मद्गुणेरणम् ।दूसरा साधन है, मेरे गुणोंकी चर्चा करना—यह तीसरा उपाय है और (गीता-उपनिषदादि) मेरे वाक्योंकी
व्याख्यातृत्वं मद्वचसां चतुर्थं साधनं भवेत् ॥२३॥व्याख्या करना उसका चौथा साधन है ॥२३॥ हे
आचार्योपासनं भद्रे मद्बुद्ध्याऽमायया सदा ।भद्रे ! अपने गुरुदेवकी निष्कपट होकर भगवद्बुद्धिसे सेवा करना पाँचवाँ, पवित्र स्वभाव, यम-नियमादिका
पञ्चमं पुण्यशीलत्वं यमादि नियमादि च ॥२४॥पालन और मेरी पूजामें प्रेम होना छठा, तथा मेरे
निष्ठा मत्पूजने नित्यं षष्ठं साधनमीरितम् ।मन्त्रकी सांगोपांग उपासना करना सातवाँ साधन कहा
मम मन्त्रोपासकत्वं साङ्गं सप्तममुच्यते ॥२५॥जाता है ॥२४-२५॥ मेरे भक्तोंकी मुझसे भी अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियोंमें मेरी भावना करना,
मद्भक्तेष्वधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः ।बाह्य पदार्थोंमें आसक्त न होना और शम-दमादि-
वाह्यार्थेषु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ॥२६॥सम्पन्न होना—यह मेरी भक्तिका आठवाँ साधन है तथा तत्त्व-विचार करना नवाँ है। हे भामिनि !
अष्टमं नवमं तत्त्वविचारो मम भामिनि ।इस प्रकार यह नौ प्रकारकी भक्ति है। हे शुभ-
एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ॥२७॥लक्षणे ! जिस किसीमें ये साधन होते हैं वह स्त्री, पुरुष अथवा पशु-पक्षी आदि कोई भी क्यों न हो उसमें प्रेम-
स्त्रियो वा पुरुषस्यापि तिर्यग्योनिगतस्य वा ।लक्षणा-भक्तिका आविर्भाव हो ही जाता है ॥२६-
भक्तिः सञ्जायते प्रेमलक्षणा शुभलक्षणे ॥२८॥२८॥ भक्तिके उत्पन्न होने मात्रसे ही मेरे स्वरूपका
भक्तौ सञ्जातमात्रायां मत्तत्त्वानुभवस्तदा ।अनुभव हो जाता है और जिसे मेरा अनुभव हो जाता है उसकी उसी जन्ममें निस्सन्देह मुक्ति हो जाती है
ममानुभवसिद्धस्य मुक्तिस्तत्रैव जन्मनि ॥२९॥अतः यह सिद्ध हुआ कि मोक्षका कारण भक्ति ही
स्यात्तस्मात्कारणं भक्तिर्मोक्षस्येति सुनिश्चितम् ।है। (भक्तिके उपरोक्त नौ साधनोंमेंसे) जिसमें पहला
प्रथमं साधनं यस्य भवेत्तस्य क्रमेण तु ॥३०॥साधन होता है उसमें क्रमशः ये सभी आ जाते हैं। तब फिर उसे भक्ति तथा मुक्तिका प्राप्त होना निश्चित
भवेत्सर्वं ततो भक्तिर्मुक्तिरेव सुनिश्चितम् ।ही है। तू मेरी भक्तिसे युक्त है इसीलिये मैं तेरे पास
यस्मान्मद्भक्तियुक्ता त्वं ततोऽहं त्वामुपस्थितः॥३१॥आया हूँ ॥२९-३१॥ अब, मेरा दर्शन होनेसे तेरी मुक्ति हो ही जायगी—इसमें सन्देह नहीं। यदि तुझे
इतो मदर्शनान्मुक्तिस्तव नास्त्यत्र संशयः ।पता हो तो बता इस समय कमललोचना सीता
यदि जानासि मे ब्रूहि सीता कमललोचना ॥३२॥कहाँ है। मेरी प्रियदर्शना प्रियाको कौन ले गया है ?
कुत्रास्ते केन वा नीता प्रिया मे प्रियदर्शना ॥३३॥॥३२-३३॥
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