अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १४८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १० |
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शबर्युवाच देव जानासि सर्वज्ञ सर्वं त्वं विश्वभावन । तथाऽपि पृच्छसे यन्मां लोकानुसृतः प्रभो ॥३४॥ ततोऽहमभिधास्यामि सीता यत्राधुना स्थिता । रावणेन हृता सीता लङ्कायां वर्ततेऽधुना ॥३५॥ इतः समीपे रामास्ते पम्पानाम सरोवरम् । ऋष्यमूकगिरिर्नाम तत्समीपे महानगः ॥३६॥ चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं सुग्रीवो वानराधिपः । भीतभीतः सदा यत्र तिष्ठत्यतुलविक्रमः ॥३७॥ वालिनश्च भयाद्भ्रातुस्तदगम्यमृषेर्भयात् । वालिनस्तत्र गच्छ त्वं तेन सख्यं कुरु प्रभो ॥३८॥ सुग्रीवेण स सर्वं ते कार्यं सम्पादयिष्यति । अहमग्निं प्रवेक्ष्यामि तवाग्रे रघुनन्दन ॥३९॥ मुहूर्तं तिष्ठ राजेन्द्र यावद्दग्ध्वा कलेवरम् । यास्यामि भगवन् राम तव विष्णोः परं पदम् ॥४०॥ इति रामं समामन्त्र्य प्रविवेश हुताशनम् । क्षणात्रिर्धूय सकलमविद्याकृतबन्धनम् । रामप्रसादाच्छबरी मोक्षं प्रापातिदुर्लभम् ॥४१॥ किं दुर्लभं जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले । प्रसन्नेऽधमजन्माऽपि शबरी मुक्तिमाप सा ॥४२॥ किं पुनर्ब्राह्मणा मुख्याः पुण्याः श्रीरामचिन्तकाः । मुक्तिं यान्तीति तद्भक्तिर्मुक्तिरेव न संशयः ॥४३॥ भक्तिर्मुक्तिविधायिनी भगवतः $\qquad\quad$श्रीरामचन्द्रस्य हे । लोकाः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजयुगलं $\qquad\quad$सेवध्वमत्युत्सुकाः । नानाज्ञानविशेषमन्त्रविततिं $\qquad\quad$त्यक्त्वा सुदूरे भृशं । रामं श्यामतनुं स्मरारिहृदये $\qquad\quad$भान्तं भजध्वं बुधाः ॥४४॥
शबरी बोली—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे विश्वभावन ! आप सभी कुछ जानते हैं । तथापि हे प्रभो ! लोकाचारका अनुसरण करते हुए यदि आप मुझसे पूछते हैं तो इस समय सीताजी जहाँ हैं वह मैं आपको बतलाती हूँ । सीताजीको रावण हर ले गया है और इस समय वे लङ्कामें हैं ॥ ३४-३५ ॥ हे राम ! यहाँसे पास ही पम्पा नामका एक सरोवर है । उसके समीप ऋष्यमूक नामका एक बहुत बड़ा पर्वत है ॥ ३६ ॥ वहाँ अतुलित पराक्रमी वानरराज सुग्रीव अपने भाई वालीके भयसे सदा डरता हुआ अपने चार मन्त्रियोंके साथ रहता है । ऋषि-शापके भयसे वह स्थान वालीके लिये सर्वथा अगम्य है हे प्रभो ! आप वहाँ जाइये और उस सुग्रीवके मित्रत कीजिए वह आपका सब कार्य सिद्ध करेगा । हे रघुनन्दन ! अब मैं आपके सामने ही अग्निमें प्रवेश करूँगी ॥ ३७-३९ ॥ हे राजेश्वर ! हे भगवन् ! हे राम ! जबतक मैं अपने शरीरको जलाकर आप विष्णुभगवान्के परमधामको जाऊँ तबतक आप एक मुहूर्त्त यहाँ और ठहरिये ॥ ४० ॥
श्रीरामचन्द्रजीके साथ इस प्रकार सम्भाषण करनेके अनन्तर शबरीने अग्निमें प्रवेश किया और एक क्षणमें ही समस्त अविद्याजन्य बन्धनोंको नष्ट कर भगवान् रामकी कृपासे अति दुर्लभ मोक्ष-पद प्राप्त किया ॥ ४१ ॥ भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीरामके प्रसन्न होनेपर संसारमें क्या दुर्लभ है । देखो, उनकी कृपासे नीच जातिमें उत्पन्न हुई शबरीने भी मोक्ष-पद प्राप्त कर लिया ॥ ४२ ॥ फिर श्रीरामका ध्यान करनेवाले पुण्यजन्मा ब्राह्मणादि यदि मुक्त हो जायें तो इसमें क्या आश्चर्य है ? निस्सन्देह, भगवान् रामकी भक्ति ही मुक्ति है ॥ ४३ ॥ अरे लोगो ! भगवान् श्रीरामचन्द्रकी भक्ति ही मोक्ष देनेवाली है । अतः कामधेनुरूप उनके चरण-युगलोंकी अति उत्साहपूर्वक सेवा करो । हे बुद्धिमान् लोगो ! इन विविध विज्ञान-वार्ताओं और मन्त्र-विस्तारको अलग रखकर तुरन्त ही श्रीशंकरके हृदयधाममें शोभा पानेवाले श्यामशरीर भगवान् रामका भजन करो ॥ ४४ ॥
'इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अरण्यकाण्डे दशमः सर्गः ॥ १० ॥
समाप्तमिदमरण्यकाण्डम् ।