भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१४४अध्यात्मरामायण[सर्ग ९

रुद्रोऽहङ्काररूपस्ते वाचश्छन्दांसि तेऽव्यय ।<br>यमस्ते दंष्ट्रदेशस्थो नक्षत्राणि द्विजालयः ॥४२॥आपका अहंकार है, वेद आपकी अविनाशी वाणी है, यम आपकी दाढ़ें हैं और नक्षत्रगण आपकी दन्तावलि है ॥४२॥
हासो मोहकरी माया सृष्टिस्तेऽपाङ्गमोक्षणम् ।<br>धर्मः पुरस्तेऽधर्मश्च पृष्ठभाग उदीरितः ॥४३॥सबको मोहित करनेवाली माया आपका हास्य है, सृष्टि आपका कटाक्ष है, धर्म आपका आगेका भाग है और अधर्म पीठिका भाग है ॥४३॥
निमिषोन्मेषणे रात्रिर्दिवा चैव रघूत्तम ।<br>समुद्राः सप्त ते कुक्षिर्नाड्यो नद्यस्तव प्रभो ॥४४॥हे रघूत्तम ! रात्रि और दिन आपके निमेषोन्मेष हैं, हे प्रभो ! सातों समुद्र आपकी कुक्षि और नदियाँ नाड़ियाँ हैं ॥४४॥
रोमाणि वृक्षौषधयो रेतो वृष्टिस्तव प्रभो ।<br>महिमा ज्ञानशक्तिस्ते एवं स्थूलं वपुस्तव ॥४५॥हे प्रभो ! वृक्ष और ओषधियाँ आपके रोम, वृष्टि आपका वीर्य और ज्ञानशक्ति आपकी महिमा है। यही आपका स्थूल शरीर है ॥४५॥
यदस्मिन् स्थूलरूपे ते मनः सन्धार्यते नरैः ।<br>अनायासेन मुक्तिः स्यादतोऽन्यन्नहि किञ्चन ॥४६॥यदि पुरुष आपके इस स्थूल शरीरमें मन स्थिर करें तो वह अनायास ही मुक्त हो जाता है। हे राम ! आपके इस स्थूल रूपसे पृथक् और कोई पदार्थ नहीं है ॥४६॥
अतोऽहं राम रूपं ते स्थूलमेवानुभावये ।<br>यस्मिन्ध्याते प्रेमरसः सरोमपुलको भवेत् ॥४७॥अतः हे राम ! मैं आपके उस स्थूल रूपका ही सदा चिन्तन करता हूँ जिसके ध्यानमात्रसे ही शरीरमें रोमाञ्चके सहित मनुष्यके हृदयमें प्रेम-रसका सञ्चार हो जाता है ॥४७॥
तदैव मुक्तिः स्याद्राम यदा ते स्थूलभावकः ।<br>तदप्यास्तां तथैवाहमेतद्रूपं विचिन्तये ॥४८॥हे राम ! जब यह जीव आपके विराट् रूपका चिन्तन करता है तो तत्काल ही उसकी मुक्ति हो जाती है तो भी मुझे उसकी आवश्यकता नहीं। मैं तो आपके इस रामरूपका ही चिन्तन करूँगा ॥४८॥
धनुर्बाणधरं श्यामं जटावल्कलभूषितम् ।<br>अपीच्यवयसं सीतां विचिन्वन्तं सलक्ष्मणम् ॥४९॥<br>इदमेव सदा मे स्यान्मानसे रघुनन्दन ।<br>सर्वज्ञः शङ्करः साक्षात्पार्वत्या सहितः सदा ॥५०॥<br>त्वद्रूपमेवं सततं ध्यायन्नास्ते रघूत्तम ।<br>मुमूर्षूणां तदा काश्यां तारकं ब्रह्मवाचकम् ॥५१॥<br>रामरामेत्युपदिशन्सदा सन्तुष्टमानसः ।<br>अतस्त्वं जानकीनाथ परमात्मा सुनिश्चितः ॥५२॥हे रघुनन्दन ! (मेरी यही प्रार्थना है कि) लक्ष्मणजीके सहित सीताको खोजता हुआ आपका यह जटा-वल्कल-विभूषित धनुषबाणधारी अति सुन्दर सुकुमार श्याम शरीर सदा मेरे मनमें विराजमान रहे। हे रघुश्रेष्ठ ! आपके इस दिव्य रूपका पार्वतीजीके सहित सर्वज्ञ श्रीशंकरभगवान् सर्वदा चिन्तन किया करते हैं और काशीमें मरनेवालोंको ब्रह्मवाचक रामनाम-रूप तारक-मन्त्रका उपदेश करते हुए सदा अति आनन्दमें मग्न रहते हैं। अतः हे जानकीनाथ ! आप निश्चय ही परमात्मा हैं ॥४९-५२॥
सर्वे ते मायया मूढास्त्वां न जानन्ति तत्त्वतः ।<br>नमस्ते रामभद्राय वेधसे परमात्मने ॥५३॥आपकी मायासे मोहित होनेके कारण सब लोग आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जानते। हे संसारकी रचना करनेवाले परमात्मा राम ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ ॥५३॥
अयोध्याधिपते तुभ्यं नमः सौमित्रिसेवित ।<br>त्राहि त्राहि जगन्नाथ मां माया नावृतोणुतु ते ॥५४॥हे सौमित्रिसेवित अयोध्यानाथ ! आपको नमस्कार है। हे जगन्नाथ ! आप मेरी रक्षा कीजिये, आपकी माया मुझे मोहित न करे ॥५४॥
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