भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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१९६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ८

कदा निष्क्रमणं मे स्याद्गर्भान्नरकसन्निभात् ।<br> इत ऊर्ध्वं नित्यमहं विष्णुमेवानुपूजये ॥३८॥

इत्यादि चिन्तयन् जीवो योनियन्त्रप्रपीडितः ।<br> जायमानोऽतिदुःखेन नरकात्पातकी यथा ॥३९॥

पूतिव्रणान्निपतितः कृमिरेष इवापरः ।<br> ततो बाल्यादिदुःखानि सर्व एवं विभुङ्क्ते ॥४०॥

त्वया चैवानुभूतानि सर्वत्र विदितानि च ।<br> न वर्णितानि मे गृध्र यौवनादिषु सर्वतः ॥४१॥

एवं देहोऽहमित्यस्मादभ्यासान्निरयादिकम् ।<br> गर्भवासादिदुःखानि भवन्त्यभिनिवेशतः ॥४२॥

तस्माद्देहद्वयादन्यमात्मानं प्रकृतेः परम् ।<br> ज्ञात्वा देहादिममतां त्यक्त्वात्मज्ञानवान् भवेत् ४३

जाग्रदादिविनिर्मुक्तं सत्यज्ञानादिलक्षणम् ।<br> शुद्धं बुद्धं सदा शान्तमात्मानमवधारयेत् ॥४४॥

चेदात्मनि परिज्ञाते नष्टे मोहेऽज्ञसम्भवे ।<br> देहः पततु वाऽऽरब्धकर्मवेगेन तिष्ठतु ॥४५॥

योगिनो नहि दुःखं वा सुखं वाऽज्ञानसम्भवम् ।

तस्माद्देहेन सहितो यावत्प्रारब्धसङ्क्षयः ॥४६॥

तावत्तिष्ठ सुखेन त्वं धृतकञ्चुकसर्पवत् ।<br> अन्यद्वक्ष्यामि ते पक्षिन् शृणु मे परमं हितम्॥४७॥

त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणोऽव्ययः ।<br> रावणस्य वधार्थाय दण्डकानागमिष्यति ॥४८॥

सीतया भार्यया सार्धं लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br> तत्राश्रमे जनकजां भ्रातृभ्यां रहिते वने ॥४९॥

रावणश्चोरवन्नीत्वा लङ्कायां स्थापयिष्यति ।<br> तस्याः सुग्रीवनिर्देशाद्वानराः परिमार्गणे ॥५०॥


हिन्दी अनुवाद

"न जाने इस नरकतुल्य गर्भसे मैं कब निकलूँगा । फिर तो मैं सर्वदा श्रीविष्णुभगवान्‌की ही उपासना करूँगा" ॥ ३८ ॥ ऐसा ही चिन्ता करते-करते वह जीव योनियन्त्रसे पीड़ित होता हुआ अति कष्टसे जन्म लेता है, जैसे कोई पापी जीव नरकसे निकलता हो ॥ ३९ ॥ उस समय यह दुर्गन्धित व्रण (घाव) से गिरे हुए एक कीड़ेके समान होता है। फिर इसे बाल्यादि अवस्थाओंके क्लेश भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार सभी देहधारियोंको ये कष्ट उठाने पड़ते हैं ॥४०॥

"हे गृध्र ! इसके पीछे होनेवाले युवावस्था आदिके सब दुःख तूने भी स्वयं देखे ही हैं और भी सब इन्हें जानते ही हैं, इसलिये मैंने इनका वर्णन नहीं किया ॥ ४१ ॥ इस प्रकार 'मैं देह हूँ' इस अभ्याससे उत्पन्न हुए देहाभिमानके कारण जीवको नरक और गर्भवास आदि अनेक दुःख उठाने पड़ते हैं ॥ ४२ ॥ अतः मनुष्यको चाहिये कि अपने आत्माको प्रकृतिसे अतीत तथा स्थूल-सूक्ष्म दोनों प्रकारके शरीरोंसे पृथक् जानकर देहादिकी ममता छोड़कर आत्मज्ञानसम्पन्न हो ॥ ४३ ॥ आत्माको सर्वदा जाग्रत् आदि अवस्थाओं- से रहित, सत्-चित्स्वरूप तथा शुद्ध, बुद्ध और शान्त-रूप जाने ॥ ४४ ॥ चेतनस्वरूप आत्माका ज्ञान हो जानेपर जब अज्ञानजनित मोह नष्ट हो जाता है तो फिर यह देह प्रारब्ध-कर्मके वेगसे रहे अथवा जाय योगीको किसी प्रकारका अज्ञान-जन्य सुख-दुःख नहीं होता ।

"अतः जबतक तेरा प्रारब्ध क्षय न हो तबतक काँचुलीसहित सर्पके समान आनन्दपूर्वक देह धारण करके रह । इसके अतिरिक्त हे पक्षिन् ! तेरे परम हितकी एक बात और बतलाता हूँ, सुन ॥ ४५--४७ ॥ त्रेतायुगमें अविनाशी नारायणदेव महाराज दशरथके यहाँ अवतार लेकर रावणका वध करनेके लिये अपनी भार्या सीता और भाई लक्ष्मणके सहित दण्डकारण्यमें आयेंगे ॥ ४८ ॥ वहाँ दोनों भाइयोंके तपोवनसे चले जानेपर रावण श्रीजानकीजी- को सूने आश्रमसे चोरके समान ले जाकर लंकामें रखेगा । तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे उन्हें खोजते हुए कुछ वानरगण समुद्रतटपर आयेंगे, वहाँ

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