भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३] सुन्दरकाण्डम् २१३


तृतीय सर्ग

जानकीजीसे भेंट, वाटिका-विध्वंस और ब्रह्मपाश-बन्धन ।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! इस प्रकार रोते-रोते सीताजीने सोचा—"अच्छा तो, मैं फाँसी लगाकर ही अपना शरीर क्यों न छोड़ दूँ ? इन राक्षिसयोंके बीचमें रहकर रघुनाथजीके बिना जीनेसे लाभ ही क्या है ? ॥ १ ॥ फाँसी लगानेके लिये मेरी लम्बी वेणी पर्याप्त होगी।" जानकीजीको इस प्रकार मरनेका निश्चय करती देख सूक्ष्मरूपधारी श्रीहनुमान्‌जी हृदयमें कुछ विचारकर उनके कानोंमें पड़नेयोग्य धीमी वाणीसे शनैः-शनैः इस प्रकार कहने लगे ॥ २-३ ॥ "इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न हुए अयोध्यापति महाराज दशरथ बड़े प्रतापी थे। उनके त्रिलोकीमें विख्यात चार पुत्र हुए। वे राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न चारों ही देवताओंके समान शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं ॥ ४-५ ॥ उनमेंसे बड़े भाई राम भ्राता लक्ष्मण और भार्या सीताके सहित अपने पिताकी आज्ञासे दण्डकारण्यमें आये थे। वे महामना वहाँ गौतमी नदीके तीरपर पञ्चवटी आश्रममें रहते थे। उस आश्रमसे श्रीरामचन्द्रजीकी अनुपस्थितिमें दुरात्मा रावण महाभागा जनकनन्दिनी सीताजीको ले गया। तब अति शोकाकुल भगवान् रामने जानकीजीको इधर-उधर ढूँढ़ते हुए पृथिवीपर पड़े पक्षिराज जटायुको देखा। उसे तुरन्त ही दिव्यधाम पहुँचाकर वे ऋष्यमूक-पर्वतपर आये ॥ ६-९ ॥ वहाँ आकर आत्मदर्शी भगवान् रामने सुग्रीवसे मित्रता की और उसकी स्त्रीका हरण करनेवाले दुष्ट वालीको मारकर उसे राज्यपदपर अभिषिक्त किया। इस प्रकार श्रीरघुनन्दनने मित्रका कार्य सिद्ध किया। वानरराज सुग्रीवने भी समस्त वानरोंको बुलाकर सब ओर सीताजीकी खोज करनेके लिये भेजा। उन्हींमेंसे एक मैं भी सुग्रीवका मन्त्री वानर हूँ। मैं सम्पातिके कथनानुसार सौ योजन समुद्र लाँघकर तुरन्त लङ्कापुरीमें आया और यहाँ सर्वत्र शुभलक्षणा सीताजीको ढूँढ़ा। शनैः-शनैः अशोकवाटिका में ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मैंने यह शिंशपा वृक्ष देखा और यहाँ रामचन्द्रजीकी महारानी देवी
उद्बन्धनेन वा मोक्ष्ये शरीरं राघवं विना ।<br>जीवितेन फलं किं स्यान्मम रक्षोऽधिमध्यतः ॥१॥<br>दीर्घा वेणी समात्यर्थमुद्बन्धाय भविष्यति ।<br>एवं निश्चितबुद्धिं तां मरणायाथ जानकीम् ॥ २ ॥<br>विलोक्य हनुमान्किञ्चिद्विचार्यैतदभाषत ।<br>शनैः शनैः सूक्ष्मरूपो जानक्याः श्रोत्रगं वचः ॥३॥<br>इक्ष्वाकुवंशसम्भूतॊ राजा दशरथो महान् ।<br>अयोध्याधिपतिस्तस्य चत्वारो लोकविश्रुताः ॥४॥<br>पुत्रा देवसमाः सर्वे लक्षणैरुपलक्षिताः ।<br>रामश्च लक्ष्मणश्चैव भरतश्चैव शत्रुहा ॥ ५ ॥<br>ज्येष्ठो रामः पितुर्वाक्याद्दण्डकारण्यमागतः ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया भार्यया सह ॥ ६ ॥<br>उवास गौतमीतीरे पञ्चवट्यां महामनाः ।<br>तत्र नीता महाभागा सीता जनकनन्दिनी ॥ ७ ॥<br>रहिते रामचन्द्रेण रावणेन दुरात्मना ।<br>ततो रामोऽतिदुःखार्तो मार्गमाणोऽथ जानकीम् ॥८॥<br>जटायुषं पक्षिराजमपश्यत्पतितं भुवि ।<br>तस्मै दत्त्वा दिवं शीघ्रमृष्यमूकमुपागमत् ॥ ९ ॥<br>सुग्रीवेण कृता मैत्री रामस्य विदितात्मनः ।<br>तद्भार्याहारिणं हत्वा वालिनं रघुनन्दनः ॥१०॥<br>राज्येऽभिषिच्य सुग्रीवं मित्रकार्यं चकार सः ।<br>सुग्रीवस्तु समानाय्य वानरान्वानरप्रभुः ॥११॥<br>प्रेषयामास परितो वानरान्परिमार्गणे ।<br>सीतायास्तत्र चैकोऽहं सुग्रीवसचिवो हरिः ॥१२॥<br>सम्पातिवचनाच्छीघ्रमुल्लङ्घ्य शतयोजनम् ।<br>समुद्रं नगरीं लङ्कां विचिन्वन् जानकीं शुभाम् ॥१३॥<br>शनैरशोकवनिकां विचिन्वन् शिंशपातरोः ।