भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 239
२१२अध्यात्मरामायणं[ सर्ग २

एवं तां भीषयन्तीस्ता राक्षसीर्विकृताननाः ।<br>निवार्य त्रिजटा वृद्धा राक्षसी वाक्यमब्रवीत् ॥४७॥<br>शृणुध्वं दुष्टराक्षस्यो मद्वाक्यं वो हितं भवेत् ॥४८॥<br>न भीषयध्वं रुदतीं नमस्कुरुत जानकीम् ।<br>इदानीमेव मे स्वप्ने रामः कमललोचनः ॥४९॥<br>आरुह्यैरावतं शुभ्रं लक्ष्मणेन समागतः ।<br>दग्ध्वा लङ्कापुरीं सर्वां हत्वा रावणमाहवे ॥५०॥<br>आरोप्य जानकीं स्वाङ्के स्थितो दृष्टोऽद्रिमूर्धनि ।<br>रावणो गोमयह्रदे तैलाभ्यक्तो दिगम्बरः ॥५१॥<br>अगाहत्पुत्रपौत्रैश्च कृत्वा वदनमालिकाम् ।<br>विभीषणस्तु रामस्य सन्निधौ हृष्टमानसः ॥५२॥<br>सेवां करोति रामस्य पादयोर्भक्तिसंयुतः ।<br>सर्वथा रावणं रामो हत्वा सकुलमञ्जसा ॥५३॥<br>विभीषणायाधिपत्यं दत्त्वा सीतां शुभाननाम् ।<br>अङ्के निधाय स्वपुरीं गमिष्यति न संशयः ॥५४॥<br><br>त्रिजटाया वचः श्रुत्वा भीतास्ता राक्षसास्त्रियः ।<br>तूष्णीमासंस्तत्र तत्र निद्रावशमुपागताः ॥५५॥<br>तर्जिता राक्षसीभिः सा सीता भीताऽतिविह्वला ।<br>त्रातारं नाधिगच्छन्ती दुःखेन परिमूर्च्छिता ॥५६॥<br>अश्रुभिः पूर्णनयना चिन्तयन्तीदमब्रवीत् ।<br>प्रभाते भक्षयिष्यन्ति राक्षस्यो मां न संशयः ।<br>इदानीमेव मरणं केनोपायेन मे भवेत् ॥५७॥<br>एवं सुदुःखेन परिप्लुता सा<br>विमुक्तकण्ठं रुदती चिराय ।<br>आलम्ब्य शाखां कृतनिश्चया मृतौ<br>न जानती कञ्चिदुपायमङ्गना ॥५८॥ | तब, सीताजीको इस प्रकार डराती हुई उन विक्रतवदना राक्षसियोंको रोककर त्रिजटा नामकी एक वृद्धा राक्षसी बोली—॥४७॥ “अरी दुष्टा राक्षसियो ! मेरी बात सुनो, इसीसे तुम्हारा हित होगा ॥४८॥ तुम इन रोती-विलखती जानकीजीको मत डराओ, बल्कि इन्हें नमस्कार करो । मैंने अभी-अभी स्वप्नमें देखा है कि कमललोचन भगवान् राम लक्ष्मणके साथ श्वेत ऐरावत हाथीपर चढ़कर आये हैं। और मैंने उन्हें सम्पूर्ण लंकापुरीको जलाकर तथा रावणको युद्धमें मारकर सीताजीको अपनी गोदमें लिये पर्वत-शिखर पर बैठे हुए देखा है। रावण गलेमें मुण्डमाला पहने शरीरमें तैल लगाये नंगा होकर अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ गोबरके कुण्डमें डुबकी लगा रहा है और विभीषण प्रसन्नचित्तसे रघुनाथजीके पास बैठा हुआ अति भक्तिपूर्वक उनकी चरण-सेवा कर रहा है। इससे निश्चय होता है कि रामचन्द्रजी अनायास ही रावणका कुलसहित नाश कर विभीषणको लंकाका राज्य देंगे और सुमुखी सीताको गोदमें बिठाकर निस्सन्देह अपने नगरको चले जायेंगे” ॥४९-५४॥<br><br>त्रिजटाके ये वचन सुनकर वे राक्षसियाँ डर गयीं । वे चुपचाप जहाँ-तहाँ बैठ गयीं और कुछ देर पीछे उन्हें नींद आ गयी ॥५५॥ राक्षसोंके डरानेसे सीताजी अत्यन्त भयभीत और विह्वल हो गयीं और अपना कोई सहायक न देखकर वे दुःखसे मूर्छित हो गयीं ॥ ५६ ॥ फिर आँखोंमें आँसू भरकर अति चिन्ताकुल होकर इसप्रकार कहने लगीं— “इसमें सन्देह नहीं प्रातःकाल होते ही राक्षसियाँ मुझे खा जायँगी। ऐसा कौन उपाय है जिससे मुझे अभी मौत आ जाय” ॥५७॥ इस प्रकार मौतका निश्चय करके भी उसका कोई साधन न देखकर कल्याणी सीता वृक्षकी शाखा पकड़े हुए अत्यन्त दुःखसे भरकर बहुत देरतक फूट-फूटकर रोती रहीं ॥ ॥ ५८ ॥

<div align="center">

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
सुन्दरकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥


</div>