अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग २ ]
सुन्दरकाण्ड
२११
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ज्ञास्यसेऽमानुषं रामं गमिष्यसि यमान्तिकम्।<br>समुद्रं शोषयित्वा वा शरैर्बद्ध्वाऽथ वारिधिम् ॥३४॥<br>हन्तुं त्वां समरे रामो लक्ष्मणेन समन्वितः।<br>आगमिष्यत्यसन्देहो द्रक्ष्यसे राक्षसाधम ॥३५॥<br>त्वां सपुत्रं सहबलं हत्वा नेष्यति मां पुरम्।<br>श्रुत्वा रक्षःपतिः क्रुद्धो जानक्याः परुषाक्षरम्॥३६॥<br>वाक्यं क्रोधसमाविष्टः खड्गमुद्यम्य सत्वरः।<br>हन्तुं जनकराजस्य तनयां ताम्रलोचनः ॥३७॥<br>मन्दोदरी निवार्याह पतिं पतिहिते रता।<br>त्यजैनां मानुषीं दीनां दुःखितां कृपणां कृशाम् ३८<br>देवगन्धर्वनागानां बह्व्यः सन्ति वराङ्गनाः।<br>त्वामेव वरयन्त्युच्चैर्मदमत्तविलोचनाः ॥३९॥ | होकर तू यमलोकको जायगा उस समय ही तू अमानव रामको जानेगा। अरे राक्षसाधम ! इसमें सन्देह नहीं, तू शीघ्र ही देखेगा कि तुझे युद्धमें मारनेके लिये भाई लक्ष्मणसहित भगवान् राम समुद्रको सुखाकर अथवा उसपर बाणोंका पुल बनाकर यहाँ आयेंगे ॥ ३२-३५॥ और तुझे पुत्र और सेनाके सहित मारकर मुझे अयोध्यापुरी ले जायेंगे।”<br><br>जानकीजीके ये कठोर वचन सुनकर राक्षसराज रावणको अत्यन्त क्रोध हुआ और वह क्रोधसे नेत्र लाल कर तुरन्त ही खड्ग खींचकर जनकनन्दिनी सीताजीको मारनेपर उतारू हो गया ॥ ३६-३७ ॥ तब, पतिके हितमें तत्पर रहनेवाली महारानी मन्दोदरीने अपने पतिको रोकते हुए कहा— “पतिदेव ! इस दीना, क्षीणा, दुःखिया एवं कातर मानवीको छोड़ दीजिये ॥ ३८॥ आपके लिये तो देवता, गन्धर्व और नागादिकोंकी ऐसी अनेकों मदमत्तनयना मनोहारिणी महिलाएँ हैं जो बड़े चावसे आपहीको वरण करना चाहती हैं” ॥ ३९ ॥ |
| ततोऽब्रवीद्दशग्रीवो राक्षसीर्विकृताननाः।<br>यथा मे वशगा सीता भविष्यति सकामना।<br>तथा यतध्वं त्वरितं तर्जनादरणादिभिः ॥४०॥<br>द्विमासाभ्यन्तरे सीता यदि मे वशगा भवेत्।<br>तदा सर्वसुखोपेतं राज्यं भोक्ष्यति सा मया ॥४१॥<br>यदि मासद्वयादूर्ध्वं मच्छां नाभिनन्दति।<br>तदा मे प्रातराशाय हत्वा कुरुत मानुषीम् ॥४२॥<br>इत्युक्त्वा प्रययौ स्त्रीभी रावणोऽन्तःपुरालयम्।<br>राक्षस्यो जानकीमेत्य भीषयन्त्यः स्वतर्जनैः॥४३॥ | तब रावणने बहुत-सी विकराल वदनवाली राक्षसों-से कहा— “हे निशाचरियो ! भय अथवा आदर जिस उपायसे भी सीता कामनायुक्त होकर शीघ्र ही मेरे अधीन हो जाय, तुम सब लोग वही करो ॥ ४० ॥ यदि दो महीनेके भीतर वह मेरे वशीभूत हो जायगी तो सर्व-सुख-सम्पन्न होकर मेरे साथ राज्य भोगेगी ॥४१॥ और यदि दो महीनेतक भी यह मेरी शय्यापर आना स्वीकार न करे तो इस मानवीको मारकर मेरा प्रातःकालका कलेवा बना देना” ॥ ४२ ॥<br><br>ऐसा कह रावण अपनी स्त्रियोंके साथ अन्तःपुरको चला गया और राक्षसियाँ सीताजीके पास आकर उन्हें अपने-अपने उपायोंसे भयभीत करने लगीं ॥४३॥ |
| तत्रैका जानकीमाह यौवनं ते वृथा गतम्।<br>रावणेन समासाद्य सफलं तु भविष्यति ॥४४॥<br>अपरा चाह कोपेन किं विलम्बेन जानकि।<br>इदानीं छेद्यतामङ्गं विभज्य च पृथक् पृथक् ॥४५॥<br>अन्या तु खड्गमुद्यम्य जानकीं हन्तुमुद्यता।<br>अन्या करालवदना विदार्यास्यमभीषयत् ॥४६॥ | उनमेंसे एक बोली— “जानकि ! तेरा यौवन वृथा ही गया, यदि तू रावणका सहवास करे तो यह सफल हो जाय” ॥ ४४ ॥ दूसरीने क्रोध दिखाते हुए कहा— “जानकि ! अब (हमारी बात माननेमें) देर क्यों करती है?” इसी प्रकार कोई खड्ग निकालकर जानकीजीको मारनेके लिये तैयार होकर बोली कि “इसके अंगोंको काटकर अभी अलग-अलग कर डालो।” तथा कोई भयंकर मुखवाली राक्षसी अपना मुख फाड़कर डराने लगी ॥४५-४६॥ |