भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

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सर्ग १ ]युद्धकाण्डे२३५

| सङ्क्रमैर्विविधैर्लङ्का शतघ्नीभिश्च संयुता ।<br>एवं स्थितेऽपि देवेश शृणु मे तत्र चेष्टितम् ॥२३॥<br>दशाननबलौघस्य चतुर्थांशो मया हतः ।<br>दग्ध्वा लङ्कां पुरीं स्वर्णप्रासादो धर्षितो मया ॥२४॥<br>शतघ्न्यः सङ्क्रमाश्चैव नाशिता मे रघूत्तम ।<br>देव त्वद्दर्शनादेव लङ्का भस्मीकृता भवेत् ॥२५॥<br>प्रस्थानं कुरु देवेश गच्छामो लवणाम्बुधेः ।<br>तीरं सह महावीरैर्वानरौघैः समन्ततः ॥२६॥<br>श्रुत्वा हनूमतो वाक्यमुवाच रघुनन्दनः ।<br>सुग्रीव सैनिकान्सर्वान्प्रस्थानायाभिनोदय ॥२७॥<br>इदानीमेव विजयो मुहूर्तः परिवर्तते ।<br>अस्मिन्मुहूर्ते गत्वाऽहं लङ्कां राक्षससङ्कुलाम् ॥२८॥<br>सप्राकारां सुदुर्धर्षां नाशय्यामि सरावाणाम् ।<br>आनेष्यामि च सीतां मे दक्षिणाक्षि स्फुरत्यधः ॥२९॥<br>प्रयातु वाहिनी सर्वा वानराणां तरस्विनाम् ।<br>रक्षन्तु यूथपाः सेनामग्रे पृष्ठे च पार्श्वयोः ॥३०॥<br>हनूमन्तमथारुह्य गच्छाम्यग्रेऽङ्गदं ततः ।<br>आरुह्य लक्ष्मणो यातु सुग्रीव त्वं मया सह ॥३१॥<br>गजो गवाक्षो गवयो मैन्दो द्विविद एव च ।<br>नलो नीलः सुषेणश्च जाम्बवांश्च तथाऽपरे ॥३२॥<br>सर्वे गच्छन्तु सर्वत्र सेनायाः शत्रुघातिनः ।<br>इत्याज्ञाप्य हरीन् रामः प्रतस्थे सहलक्ष्मणः ॥३३॥<br>सुग्रीवसहितो हर्षात्सेनामध्यगतो विभुः ।<br>वारणेन्द्रनिभाः सर्वे वानराः कामरूपिणः ॥३४॥<br>क्ष्वेलन्तः परिगर्जन्तो जग्मुस्ते दक्षिणां दिशम् ।<br>भक्षयन्तो ययुः सर्वे फलानि च मधूनि च ॥३५॥<br>ब्रुवन्तो राघवस्याग्रे हनिष्यामोऽद्य रावणम् । | जानेके मार्ग नाना प्रकारके संक्रम (सुरंग) और शतघ्नियों<br>(तोपों) से सुरक्षित हैं; किन्तु हे देवेश्वर ! यह सब<br>कुछ होते हुए भी मैंने जो कुछ किया है वह सुनिये<br>॥ २३ ॥ मैंने रावणकी चौथाई सेना मार डाली और<br>लङ्कापुरीको जलाकर उसका सोनेका महल नष्ट कर दिया<br>॥ २४॥ हे रघुश्रेष्ठ ! संक्रमों और तोपोंको मैंने तोड़ डाला ।<br>हे देव ! (मुझे तो विश्वास है) आपकी दृष्टि पड़ते<br>ही लङ्का भस्मीभूत हो जायगी ॥ २५ ॥ हे देवेश्वर !<br>अब चलनेकी तैयारी कीजिये । हम सब ओरसे<br>महाबलवान् वानर-वीरोंकी सेना लेकर क्षार (खारे<br>पानीके) समुद्रके तटपर चलें” ॥ २६ ॥<br>हनुमान्‌जीका कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीने कहा—<br>“सुग्रीव ! सब सैनिकोंको इसी समय कूच करनेकी<br>आज्ञा दो, क्योंकि इस समय विजयनामक मुहूर्त्त बीत<br>रहा है । इस मुहूर्त्तमें जाकर मैं राक्षससंकुलित लङ्काको,<br>जो परकोटे आदिके कारण अति दुर्जय है, रावणके<br>सहित नष्ट कर दूँगा और सीताजीको ले आऊँगा ।<br>इस समय मेरी दायीं आँखका नीचेका भाग फड़क<br>रहा है ॥ २७-२९ ॥ इसी समय बलवान् वानरोंकी<br>सम्पूर्ण सेना चले; जो यूथपति हों वे अपने-अपने<br>यूथकी आगे-पीछे और इधर-उधरसे रक्षा करें ॥३०॥<br>मैं हनुमान्‌के कन्धेपर चढ़कर सबसे आगे चलता हूँ,<br>उसके पीछे लक्ष्मण अंगदके ऊपर चढ़कर चलें और<br>हे सुग्रीव ! तुम मेरे साथ चलो ॥ ३१ ॥ गज, गवाक्ष,<br>गवय, मैन्द, द्विविद, नल, नील, सुषेण और जाम्बवान्<br>तथा शत्रुओंका नाश करनेवाले और भी समस्त<br>सेनापतिगण सेनाके चारों ओर चलें ।” वानरोंको<br>इस प्रकार आज्ञा दे श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके सहित<br>कूच किया ॥ ३२-३३ ॥<br>भगवान् राम अति हर्षसे सुग्रीवके साथ सेनाके<br>बीचमें जा रहे थे । समस्त वानरगण गजराजके समान<br>बड़े डीलवाले और इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले<br>थे ॥३४॥ वे सब बड़े वेगसे उछलते-कूदते, गरजते और<br>फल तथा मधु खाते दक्षिण दिशाको चले ॥ ३५ ॥<br>इस प्रकार वे अतुल पराक्रमी वानरश्रेष्ठ श्रीरघुनाथजीके |

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