अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| सर्ग २ ] | युद्धकाण्ड | २३९ |
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| कुम्भकर्णवचः श्रुत्वा वाक्यमिन्द्रजिदब्रवीत् ।<br>देहि देव ममानुज्ञां हत्वा रामं सलक्ष्मणम् ।<br>सुग्रीवं वानरांश्चैव पुनर्यास्यामि तेऽन्तिकम् ॥१९॥<br><br>तत्रागतो भागवतप्रधानो<br>विभीषणो बुद्धिमतां वरिष्ठः ।<br>श्रीरामपादद्वय एकतानः<br>प्रणम्य देवारिमुपोपविष्टः ॥२०॥<br><br>विलोक्य कुम्भश्रवणादिदैत्या-<br>न्मत्तप्रमत्तानतिविस्मयेन ।<br>विलोक्य कामातुरमप्रमत्तो<br>दशाननं प्राह विशुद्धबुद्धिः ॥२१॥<br><br>न कुम्भकर्णेन्द्रजितौ च राजं-<br>स्तथा महापाश्र्वमहोदरौ तौ ।<br>निकुम्भकुम्भौ च तथातिकायः<br>स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥२२॥<br><br>सीताऽभिधानेन महाग्रहेण<br>ग्रस्तोऽसि राजन् न च ते विमोक्षः ।<br>तामेव सत्कृत्य महाधनेन<br>दत्त्वाभिरामाय सुखी भव त्वम् ॥२३॥<br><br>यावन्न रामस्य शिताः शिलीमुखा<br>लङ्कामभिव्याप्य शिरांसि रक्षसाम् ।<br>छिन्दन्ति तावद्रघुनायकस्य भो<br>तां जानकीं त्वं प्रतिदातुमर्हसि ॥२४॥<br><br>यावन्नगाभाः कपयो महाबला<br>हरीन्द्रतुल्या नखदंष्ट्रयोधिनः ।<br>लङ्कां समाक्रम्य विनाशयन्ति ते<br>तावद्द्रुतं देहि रघूत्तमाय ताम् ॥२५॥<br><br>जीवन्न रामेण विमोक्ष्यसे त्वं<br>गुप्तः सुरेन्द्रेरपि शङ्करेण ।<br>न देवराजाङ्कगतो न मृत्योः<br>पाताललोकानपि सम्प्रविष्टः ॥२६॥<br><br>शुभं हितं पवित्रं च विभीषणवचः खलः ।<br>प्रतिजग्राह नैवासौ म्रियमाण इवौषधम् ॥२७॥ | ॥ १८ ॥ कुम्भकर्णके ये वचन सुनकर इन्द्रजित् बोला—"प्रभो ! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं अभी लक्ष्मणके सहित राम, सुग्रीव और समस्त वानरोंको मारकर आपके पास लौट आता हूँ" ॥ १९ ॥<br><br>इसी समय वहाँ भागवत-प्रधान बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ विभीषणजी आये। उनके अन्तःकरणकी वृत्ति एकाग्रता-पूर्वक भगवान् रामके चरणयुगलमें लगी हुई थी। वहाँ आकर वे देवशत्रु रावणको प्रणाम कर उसके पास बैठ गये ॥ २० ॥ वहाँ बैठकर उन्होंने एक बार कुम्भकर्ण आदि समस्त मदोन्मत्त राक्षसोंको अति विस्मयके साथ देखा । फिर यह भी देखा कि रावण कामातुर है, (वह किसीकी माननेवाला नहीं है) । तथापि अति निर्मल-बुद्धि होनेसे वे अपने कर्त्तव्यमें सावधान थे, इसलिये उन्होंने रावणसे कहा—॥ २१ ॥ "हे राजन् ! युद्धमें रघुनाथजीके सामने कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, महापाश्र्व, महोदर, निकुम्भ, कुम्भ तथा अतिकाय आदि कोई भी नहीं ठहर सकते ॥ २२ ॥ हे राजन् ! आपको सीता नामक एक प्रबल ग्रहने ग्रस्त कर लिया है, इससे आपका छुटकारा इस तरह नहीं हो सकता। अब आप उसे सत्कारपूर्वक बहुत-से धनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको लौटा दीजिये और सुखी हो जाइये ॥ २३ ॥ जबतक श्रीरामचन्द्रजीके तीक्ष्ण बाण लंकामें व्याप्त होकर राक्षसोंके शिर नहीं काटते, तबतक ही उचित है कि आप उन्हें जानकीजीको सौंप दें ॥ २४ ॥ नख और दाढ़ोंसे ही लड़नेवाले, सिंहके समान महाबलवान् वे पर्वताकार वानर-गण जबतक लंकामें फैलकर उसे नष्ट-भ्रष्ट नहीं करते तभीतक आप सीताजीको जल्दी-से-जल्दी श्रीरघुनाथजीको सौंप दीजिये ॥ २५ ॥ नहीं तो, भले ही इन्द्र और शंकर भी आपकी रक्षा करें, अथवा देवराज इन्द्र और मृत्यु भी आपको गोदमें लेकर बचायें, या आप पातालमें भी घुस जायें, तो भी रामसे आप जीवित नहीं बच सकते" ॥ २६ ॥<br><br>विभीषणके इन शुभ, हितकर और पवित्र वचनोंको दुष्ट रावणने इसी प्रकार ग्रहण नहीं किया जैसे मरने-वालापुरुष औषध ग्रहण नहीं करता ॥ २७ ॥ बल्कि |