अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ३ ] युद्धकाण्ड २४१
प्रधानपुरुषाभ्यां स जगत्कृत्स्नं सृजत्यजः ।
कालरूपेण कलनां जगतः कुरुतेऽव्ययः ॥४१॥
कालरूपी स भगवान् रामरूपेण मायया ॥४२॥
ब्रह्मणा प्रार्थितो देवस्त्वद्वधार्थमिहागतः ।
दन्यथा कथं कुर्यात्सत्यसङ्कल्प ईश्वरः ॥४३॥
हनिष्यति त्वां रामस्तु सपुत्रबलवाहनम् ।
हन्यमानं न शक्नोमि द्रष्टुं रामेण रावण ॥४४॥
त्वां राक्षसकुलं कृत्स्नं ततो गच्छामि राघवम् ।
मयि याते सुखीभूत्वा रमस्व भवने चिरम् ॥४५॥
विभीषणो रावणवाक्यतः क्षणा-
द्विसृज्य सर्वं सपरिच्छदं गृहम् ।
जगाम रामस्य पदारविन्दयोः
सेवाभिकाङ्क्षी परिपूर्णमानसः ॥४६॥
अजन्मा होकर भी प्रधान और पुरुषरूपसे सम्पूर्ण जगत्की रचना करते हैं और अविनाशी होकर भी कालरूपसे जगत्का संहार करते हैं ॥ ४१ ॥ वे ही कालरूपी भगवान् ब्रह्माकी प्रार्थनासे आपका वध करनेके लिये मायासे रामरूप होकर यहाँ आये हैं। ईश्वर सत्यसंकल्प हैं, इसलिये वे अपनी प्रतिज्ञाको अन्यथा कैसे कर सकते हैं ॥ ४२-४३ ॥ अतः राम अवश्य ही आपको पुत्र, सेना और वाहनादिके सहित मारेंगे। हे रावण ! मैं रामद्वारा सम्पूर्ण राक्षसंवश और आपका संहार होता नहीं देख सकता। अतः मैं रघुनाथजीके पास जाता हूँ। मेरे चले जानेपर आप आनन्दपूर्वक अपने महलमें बहुत समयतक भोग भोगना”॥४४-४५॥
इस प्रकार, सन्तुष्टचित्त विभीषण रावणके कठोर भाषणसे एक क्षणमें ही समस्त सामग्रीके सहित अपने घरको छोड़कर भगवान् रामके चरणकमलोंकी सेवाकी कामनासे उनके पास चले गये ॥ ४६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीय सर्ग
विभीषणकी शरणागति, समुद्रका त्रास तथा सेतु-बन्धका आरम्भ।
श्रीमहादेव उवाच
विभीषणो महाभागश्चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सह ।
आगत्य गगने रामसम्मुखे समवस्थितः ॥ १ ॥
उच्चैरुवाच भोः स्वामिन् राम राजीवलोचन ।
रावणस्यानुजोऽहं ते दारहर्तुर्विभीषणः ॥ २ ॥
नाम्ना भ्रात्रा निरस्तोऽहं त्वामेव शरणं गतः।
हितमुक्तं मया देव तस्य चाविदितात्मनः ॥ ३ ॥
सीतां रामाय वैदेहीं प्रेषयेति पुनः पुनः ।
उक्तोऽपि न शृणोत्येव कालपाशवशं गतः ॥ ४ ॥
हन्तुं मां खड्गमादाय प्राद्रवद्राक्षसाधमः ।
श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! तदनन्तर महाभाग विभीषण अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकर आकाशमें श्रीरघुनाथजीके सामने उपस्थित हुए ॥ १ ॥ और ऊँचे स्वरसे कहने लगे—"हे कमलनयन प्रभो राम ! मैं आपकी भार्याका हरण करनेवाले रावणका छोटा भाई हूँ । मेरा नाम विभीषण है । मुझे भाईने निकाल दिया है, इसलिये मैं आपकी शरणमें आया हूँ । हे देव ! मैंने उस अज्ञानीके हितकी बात कही थी ॥ २-३ ॥ उससे वार-वार कहा है कि ‘तुम विदेहनन्दिनी सीताको रामके पास भेज दो,’ तथापि कालके वशीभूत होनेके कारण वह कुछ सुनता ही नहीं है ॥४॥ इस समय वह राक्षसाधम मुझे तलवारसे मारनेके लिये दौड़ा; तब मैं भयसे तुरन्त ही