भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२४४अध्यात्मरामायण[सर्ग ३

ततः प्रसन्नः प्रोवाच श्रीरामो भक्तवत्सलः।<br>वरं वृणीष्व भद्रं ते वाञ्छितं वरदोऽस्म्यहम् ॥३३॥तब भक्तवत्सल भगवान् रामने प्रसन्न होकर कहा—<br>"विभीषण ! तेरा कल्याण हो, मैं तुझे वर देना चाहता<br>हूँ; अतः तेरी जो इच्छा हो वही वर माँग ले" ॥३३॥
विभीषण उवाचविभीषण बोले—"हे रघुनन्दन ! मैं तो आपके<br>चरणोंका दर्शन पाकर ही धन्य और कृतकृत्य हो<br>गया; मुझे जो कुछ पाना था वह मिल गया। अब तो<br>मैं निःसन्देह मुक्त हो गया ॥ ३४ ॥ हे राम ! आपकी<br>मनोहर मूर्तिकी दर्शन करनेसे आज मेरे समान कोई<br>धन्य और पवित्र नहीं है; अब इस संसारमें (किसी भी<br>प्रकार) मेरी समता करनेवाला कोई नहीं है ॥ ३५ ॥<br>हे रघुनन्दन ! कर्म-बन्धनको नष्ट करनेके लिये आप<br>मुझे अपनी भक्तिसे प्राप्त होनेवाला ज्ञान और अपने<br>परमार्थ-स्वरूपका साक्षात् करानेवाला ध्यान दीजिये<br>॥ ३६ ॥ हे राजराजेश्वर राम ! मुझे विषयजन्य सुखकी<br>इच्छा नहीं है; मैं तो यही चाहता हूँ कि आपके चरण-<br>कमलोंमें सर्वदा मेरी आसक्तिरूपा भक्ति बनी रहे"॥३७॥
धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि कृतकार्योऽस्मि राघव।<br>त्वत्पाददर्शनादेव विमुक्तोऽस्मि न संशयः ॥३४॥
नास्ति मत्सदृशो धन्यो नास्ति मत्सदृशः शुचिः।<br>नास्ति मत्सदृशो लोके राम त्वन्मूर्तिदर्शनात् ॥३५॥
कर्मबन्धविनाशाय त्वज्ज्ञानं भक्तिलक्षणम्।<br>त्वद्ध्यानं परमार्थं च देहि मे रघुनन्दन ॥३६॥
न याचे राम राजेन्द्र सुखं विषयसम्भवम्।<br>त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदास्तु मे ॥३७॥
ओमित्युक्त्वा पुनः प्रीतो रामः प्रोवाच राक्षसम्।<br>शृणु वक्ष्यामि ते भद्र रहस्यं मम निश्चितम् ॥३८॥तब रघुनाथजीने 'तथास्तु' कहकर विभीषणसे प्रसन्न<br>होकर कहा—"भद्र ! सुनो, मैं तुम्हें अपना निश्चित<br>रहस्य सुनाता हूँ ॥ ३८ ॥ जो मेरे शान्तस्वभाव, विरक्त<br>और योगनिष्ठ भक्त हैं, उनके हृदयमें मैं सीताजीके सहित<br>सदा रहता हूँ—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९ ॥ अतः तुम<br>सर्वदा शान्त और पापरहित रहकर मेरा ध्यान करनेसे<br>घोर संसार-सागरसे पार हो जाओगे ॥ ४० ॥ जो<br>पुरुष मुझे प्रसन्न करनेके लिये इस स्तोत्रको पढ़ता,<br>लिखता अथवा सुनता है वह मेरा प्रिय सारूप्यपद<br>प्राप्त करता है" ॥ ४१ ॥
मद्भक्तानां प्रशान्तानां योगिनां वीतरागिणाम्।<br>हृदये सीतया नित्यं वसाम्यत्र न संशयः ॥३९॥
तस्मात्त्वं सर्वदा शान्तः सर्वकल्मषवर्जितः।<br>मां ध्यात्वा मोक्ष्यसे नित्यं घोरसंसारसागरात् ॥४०॥
स्तोत्रमेतत्पठेद्यस्तु लिखेद्वाः शृणुयादपि।<br>मत्प्रीतये समाभीष्टं सारूप्यं समवाप्नुयात् ॥४१॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं प्राह श्रीरामो भक्तभक्तिमान्।<br>पश्यत्विदानीमेवैष मम सन्दर्शने फलम् ॥४२॥विभीषणसे ऐसा कह भक्तवत्सल श्रीरामने<br>लक्ष्मणजीसे कहा—"लक्ष्मण ! यह अभी मेरे दर्शनका<br>फल देखे ॥ ४२ ॥ तुम समुद्रसे जल ले आओ; मैं<br>इसे लंकाके राज्यपर अभिषिक्त किये देता हूँ। जबतक<br>चन्द्र-सूर्य और पृथिवीकी स्थिति है तथा जबतक लोकमें<br>मेरी कथा रहेगी तबतक यह लंकाका राज्य करेगा।"
लङ्काराज्येऽभिषेक्ष्यामि जलमानय सागरात्।<br>यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ॥४३॥
यावन्मम कथा लोके तावद्राज्यं करोत्वसौ।<br>इत्युक्त्वा लक्ष्मणेनाम्बु ह्यानाय्य कलशेन तम्॥४४॥ऐसा कह श्रीरमापतिने लक्ष्मणजीसे कलशमें जल<br>मँगवाया और मन्त्रियों तथा विशेषतः लक्ष्मणजीसे उसे<br>लंकाके राज्यपदपर अभिषिक्त कराया ॥ ४३-४५ ॥<br>उस समय समस्त वानर प्रसन्न होकर 'धन्य है, धन्य
लङ्काराज्याधिपत्यार्थमभिषेकं रमापतिः।<br>कारयामास सचिवैर्लक्ष्मणेन विशेषतः ॥४५॥