भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२४६अध्यात्मरामायणे[ सर्ग ३
ब्रूहि मे रामचन्द्रस्य भार्या हृत्वा क्व यास्यसि ।<br>ततो राजाज्ञया धृत्वा शुकं बध्वान्वरक्षयत् ॥५८॥मेरे हाथसे मारा जायगा। तू हमारे रामचन्द्रजीकी भार्याका हरण करके अब कहाँ जा सकता है ? तदनन्तर भगवान् रामकी आज्ञासे शुकको पकड़ उन्होंने बन्धनमें डालकर वानरोंकी रक्षामें छोड़ दिया॥५७-५८॥
शार्दूलोऽपि ततः पूर्वं दृष्ट्वा कपिवलं महत् ।<br>यथावत्कथयामास रावणाय स राक्षसः ॥५९॥शुकसे पहले ही शार्दूल नामक राक्षसने वानरोंकी महान् सेना देखकर रावणसे उसका यथावत् वर्णन कर दिया था ॥ ५९ ॥ यह सब सुनकर रावणको बड़ी चिन्ता हुई और वह दीर्घ निःश्वास छोड़ता अपने महलमें बैठा रहा। इसी समय भगवान् रामने समुद्रकी ओर देखकर क्रोधसे नेत्र लाल कर कहा—
दीर्घचिन्तापरो भूत्वा निःश्वसन्नास मन्दिरे ।<br>ततः समुद्रमावेक्ष्य रामो रक्तान्तलोचनः ॥६०॥॥ ६० ॥ “लक्ष्मण ! देखो, यह समुद्र कैसा दुष्ट है ? मैं इसके तीरपर आया हूँ किन्तु हे अनघ ! इस दुरात्माने दर्शन करके भी मेरा अभिनन्दन नहीं किया ॥ ६१ ॥ यह समझता है, ‘यह एक मनुष्य ही तो है, वानरोंके साथ मिलकर भी यह मेरा क्या कर सकता है ?’ सो हे महाबाहो ! देखो, आज मैं इसे सुखाये डालता हूँ ॥ ६२ ॥ फिर वानरगण निश्चिन्त होकर पैदल ही इसके पार चले जायेंगे।” ऐसा कह भगवान् रामने क्रोधसे नेत्र लाल कर अपना धनुष चढ़ाया और तूणीरसे एक कालाग्निके समान तेजोमय वाण निकालकर उसे धनुषपर रखकर खींचते हुए कहा—॥६३-६४॥ “समस्त प्राणी रामके वाणका पराक्रम देखें; मैं इसी समय नदीपति समुद्रको भस्म किये डालता हूँ” ॥६५॥
पश्य लक्ष्मण दुष्टोऽसौ वारिधिर्मामुपागतम् ।<br>नाभिनन्दति दुष्टात्मा दर्शनार्थं समानघ ॥६१॥
जानाति मानुषोऽयं मे किं करिष्यति वानरैः ।<br>अद्य पश्य महाबाहो शोषयिष्यामि वारिधिम् ॥६२॥
पादेनैव गमिष्यन्ति वानरा विगतज्वराः ।<br>इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्ष आरोपितधनुर्धरः ॥६३॥
तूणीराद्वाणमादाय कालाग्निसदृशप्रभम् ।<br>सन्धाय चापमाकृष्य रामो वाक्यमथाब्रवीत् ॥६४॥
पश्यन्तु सर्वभूतानि रामस्य शरविक्रमम् ।<br>इदानीं भस्मसात्कुर्यां समुद्रं सरितां पतिम् ॥६५॥
एवं ब्रुवति रामे तु सशैलवनकानना ।<br>चचाल वसुधा द्यौश्च दिशश्च तमसाऽऽवृताः ॥६६॥भगवान् रामके ऐसा कहते ही वन और पर्वतादिके सहित सम्पूर्ण पृथिवी हिलने लगी तथा आकाश और दिशाओंमें अन्धकार छा गया ॥६६॥ समुद्र क्षुभित हो गया और भयके कारण अपने तटसे एक योजन आगे बढ़ आया; तथा बड़े-बड़े मत्स्य, नाके, मकर और मछलियाँ सन्तप्त होकर भयभीत हो गये ॥ ६७ ॥
चुक्षुभे सागरो वेलां भयाद्योजनमत्यगात् ।<br>तिमीनक्रझषा मीनाः प्रतप्ताः परित्रत्रसुः ॥६७॥
एतस्मिन्नन्तरे साक्षात्सागरो दिव्यरूपधृक् ।<br>दिव्याभरणसम्पन्नः स्वभासा भासयन् दिशः ॥६८॥इसी समय नाना प्रकारके दिव्य आभूषण धारण किये दिव्यरूपधारी समुद्र, हाथोंमें अपने ही भीतर स्थित दिव्य रत्न लिये, अपने प्रकाशसे दशों दिशाओंको प्रकाशित करता, स्वयं उपस्थित हुआ और भगवान् रामचन्द्रजीके चरणोंके आगे नाना प्रकारके उपहार रख, जिनके नेत्रोंके मध्यभाग क्रोधसे लाल
स्वान्तःस्थदिव्यरत्नानि कराभ्यां परिगृह्य सः ।<br>पादयोः पुरतः क्षिप्त्वा रामस्योपायनं बहु ॥६९॥
दण्डवत्प्रणिपत्याह रामं रक्तान्तलोचनम् ।