भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ५ ] युद्धकाण्ड २५५


ततः समागमद्वृद्धो माल्यवान् राक्षसो महान् ।<br>बुद्धिमान्नीतिनिपुणो राज्ञो मातुःप्रियः पिता ॥२५॥( शुकके चले जानेपर ) राजा रावणकी माताका प्रिय पिता अति बुद्धिमान् और नीतिनिपुण वृद्ध राक्षस माल्यवान् वहाँ आया ॥ २५ ॥
प्राह तं राक्षसं वीरं प्रशान्तेनान्तरात्मना ।<br>शृणु राजन्वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ॥२६॥वह शान्त-चित्तसे उस राक्षसवीर ( रावण ) से बोला—"हे राजन् ! मेरी प्रार्थना सुनिये, फिर आपकी जैसी इच्छा हो वह करना ॥ २६ ॥
यदा प्रविष्टा नगरीं जानकी रामवल्लभा ।<br>तदादि पुर्यां दृश्यन्ते निमित्तानि दशानन ॥२७॥<br>घोराणि नाशहेतूनि तानि मे वदतः शृणु ।<br>खरस्तनितनिर्घोषा मेघा अतिभयङ्कराः ॥२८॥<br>शोणितेनाभिवर्षन्ति लङ्काममुष्णेन सर्वदा ।<br>रुदन्ति देवलिङ्गानि खिद्यन्ति प्रचलन्ति च ॥२९॥हे दशानन ! जबसे नगरमें राम-भार्या जानकीका प्रवेश हुआ है तभीसे यहाँ बड़े भयंकर नाशकारी हेतु दिखायी दे रहे हैं, सो मैं आपको बतलाता हूँ, सुनिये—अति भयंकर मेघगण तीक्ष्ण कड़कके साथ गर्जते हैं और सर्वदा लंकाके ऊपर गर्म-गर्म रक्तकी वर्षा करते हैं । देवमूर्तियाँ रोती हैं, उनके शरीरमें पसीना आ जाता है और वे अपने स्थानसे स्खलित हो जाती हैं ॥ २७-२९ ॥
कालिका पाण्डुरैर्दन्तैः प्रहसन्त्यग्रतः स्थिता ।<br>खरा गोषु प्रजायन्ते मूषका नकुलैः सह ॥३०॥<br>मार्जारैण तु युध्यन्ति पन्नगा गरुडेन तु ।<br>करालो विकटो मुण्डः पुरुषः कृष्णपिङ्गलः ॥३१॥<br>कालो गृहाणि सर्वेषां काले काले त्ववेक्षते ।<br>एतान्यन्यानि दृश्यन्ते निमित्तान्युद्भवन्ति च ॥३२॥कालिकाएँ राक्षसोंके आगे अपने पीले-पीले दाँत निकालकर हँसती हैं, गौओंके गधे उत्पन्न होते हैं और चूहे न्यौले तथा बिल्लीसे एवं सर्प गरुडसे युद्ध करते हैं । समस्त राक्षसोंके घरोंको समय-समयपर काले और पीले रंगका एक महाभयंकर विकरालवदन मुण्डित-केश कालपुरुष देखा करता है । इस प्रकार ये तथा और भी बहुत-से अपशकुन उत्पन्न होते और दिखायी देते हैं ॥ ३०-३२ ॥
अतः कुलस्य रक्षार्थं शान्तिं कुरु दशानन ।<br>सीतां सत्कृत्य सधनां रामायाशु प्रयच्छ भोः ॥३३॥अतः हे दशशीश ! अपने कुलकी रक्षाके लिये इनकी शान्ति कीजिये और तुरन्त ही सीताको सत्कारपूर्वक बहुत-से धनके सहित रघुनाथजीको दे दीजिये ॥ ३३ ॥
रामं नारायणं विद्धि विद्वेषं त्यज राघवे ।<br>यत्पादपोतमाश्रित्य ज्ञानिनो भवसागरम् ॥३४॥<br>तरन्ति भक्तिपूतान्तास्ततो रामो न मानुषः ।<br>भजस्व भक्तिभावेन रामं सर्वहृदालयम् ॥३५॥रामको आप साक्षात् नारायण समझिये, इसलिये उनमें द्वेषभाव छोड़ दीजिये । इन रघुनाथजीके चरण-कमल-रूप नौकाका आश्रय लेकर भक्तिसे पवित्र अन्तःकरण हुए योगिजन संसारसागरको पार कर जाते हैं। अतः ये कोई साधारण पुरुष नहीं हैं । ये सबके अन्तःकरणोंमें विराजमान हैं, आप भक्तिभावसे इन रघुनाथजीका भजन कीजिये ॥ ३४-३५ ॥
यद्यपि त्वं दुराचारो भक्त्या पूतो भविष्यसि ।<br>मद्वाक्यं कुरु राजेन्द्र कुलकौशलहेतवे ॥३६॥यद्यपि आपका आचरण अच्छा नहीं है, तथापि उनकी भक्तिसे आप पवित्र हो जायेंगे । हे राजेन्द्र ! अपने कुलकी कुशलताके लिये मेरा यह वचन मान लीजिये” ॥ ३६ ॥
तत्त माल्यवतो वाक्यं हितमुक्तं दशाननः ।<br>न मर्षयति दुष्टात्मा कालस्य वशमागतः ॥३७॥किन्तु माल्यवान्‌के ये हितकर वाक्य दुष्टचित्त रावणको सहन न हुए, क्योंकि वह कालके वशीभूत हो रहा था॥३७॥ वह बोला—‘इस बेचारे एक तुच्छ