भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२५६अध्यात्मरामायण[सर्ग ५

मानवं कृपणं राममेकं शाखामृगाश्रयम् ।<br>समर्थं मन्यसे केन हीनं पित्रा मुनिप्रियम् ॥३८॥<br>रामेण प्रेषितो नूनं भाषसे त्वमनर्गलम् ।<br>गच्छ वृद्धोऽसि बन्धुस्त्वं सोढं सर्वं त्वयोदितम् ३९<br>इतो मत्कर्णपदवीं दहेत्येतद्वचस्तव ।<br>इत्युक्त्वा सर्वसचिवैः सहितः प्रस्थितस्तदा ॥४०॥<br>प्रासादाग्रे समासीनः पश्यन्वानरसैनिकान् ।<br>युद्धाययोजयत्सर्वराक्षसान्समुपस्थितान् ॥४१॥ | मनुष्य रामको, जिसने बन्दरका आश्रय लिया हुआ है और जिसे उसके पिताने भी निकाल दिया है, तुम किस बातमें समर्थ मानते हो ? वह तो केवल वनवासी मुनिजनोंका ही प्यारा है ॥ ३८ ॥ मालूम होता है, तुम्हें रामने ही भेजा है इसीलिये तुम इस प्रकार ऊटपटांग बातें बनाते हो । जाओ, तुम बूढ़े और अपने सगे-सम्बन्धी हो इसलिये मैंने तुम्हारी सब बातें सहन कर लीं हैं ॥ ३९ ॥ किन्तु अब तुम्हारे वचन मेरे कानोंको जलाते हैं ।” ऐसा कहकर वह अपने समस्त मन्त्रियोंसहित वहाँसे चल दिया ॥ ४० ॥ और अपने राजभवनके सर्वोच्च तलपर बैठकर वानर-सैनिकों- को देखता हुआ अपने आस-पास बैठे हुए राक्षसोंको युद्धके लिये नियुक्त करने लगा ॥ ४१ ॥ रामोऽपि धनुरादाय लक्ष्मणेन समाहृतम् ।<br>दृष्ट्वा रावणमासीनं कोपेन कलुषीकृतः ॥४२॥<br>किरीटिनं समासीनं मन्त्रिभिः परिवेष्टितम् ।<br>शशाङ्कार्धनिभेनेव बाणेनैकेन राघवः ॥४३॥<br>श्वेतच्छत्रसहस्राणि किरीटदशकं तथा ।<br>चिच्छेद निमिषार्धेन तदद्भुतमिवाभवत् ॥४४॥<br>लज्जितो रावणस्तूर्णं विवेश भवनं स्वकम् ।<br>आहूय राक्षसान् सर्वान्प्रहस्तप्रमुखान् खलः॥४५॥<br>वानरैः सह युद्धाय नोदयामास सत्वरः । | इधर, रामचन्द्रजीने रावणको बैठा देख अति क्रोधातुर हो लक्ष्मणजीका लाया हुआ धनुष उठाया ॥ ४२ ॥ वह शिरपर मुकुट धारण किये अपने अनेकों मन्त्रियोंसे घिरा हुआ बैठा था भगवान् रामने आधे निमेषमें ही एक अर्धचन्द्राकार बाणसे उसके हजारों श्वेत छत्र और दसों मुकुट काट डाले । यह बड़ा आश्चर्य-सा हो गया ॥ ४३-४४ ॥ इससे लज्जित होकर रावण तुरन्त अपने घरमें घुस गया; और उस दुष्टने शीघ्र ही प्रहस्त आदि मुख्य-मुख्य राक्षसोंको बुलाकर वानरोंके साथ युद्ध करनेकी आज्ञा दी । ततो भेरीमृदङ्गाद्यैः पणवानकगोमुखैः ॥४६॥<br>महिषोष्ट्रैः खरैः सिंहैर्द्दीपिभिः कृतवाहनाः ।<br>खड्गशूलधनुःपाशयष्टितोमरशक्तिभिः ॥४७॥<br>लक्षिताः सर्वतो लङ्कां प्रतिद्वारमुपाययुः ।<br>तत्पूर्वमेव रामेण नोदिता वानरर्षभाः ॥४८॥<br>उद्यम्य गिरिशृङ्गाणि शिखराणि महान्ति च ।<br>तरूंश्चोत्पाट्य विविधान्युद्धाय हरियूथपाः ॥४९॥<br>प्रेक्षमाणा रावणस्य तान्यनीकानि भागशः ।<br>राघवप्रियकामार्थं लङ्कामारुरुहुस्तदा ॥५०॥<br>ते द्रुमैः पर्वताग्रैश्च मुष्टिभिश्च प्लवङ्गमाः ।<br>ततः सहस्रयूथाश्च कोटियूथाश्च यूथपाः ॥५१॥ | तब राक्षसलोग भेरी, मृदंग, पणव, आनक और गोमुख आदि बाजे बजाते भैंसों, ऊँटों, गधों, सिंहों और हाथियोंपर चढ़कर खड्ग, शूल, धनुष, पाश, यष्टि (डण्डे), तोमर और शक्ति आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो लङ्काके प्रत्येक द्वारपर आ गये । भगवान् रामने वानरोंको पहले ही आज्ञा दे दी थी ॥४५-४८॥ अतः वे पर्वतोंकी शिलाएँ तथा बड़े-बड़े शिखर उठ कर और नाना प्रकारके वृक्ष उखाड़कर युद्धके लिये चले और रावणकी वह पृथक्-पृथक् सेना देखकर रघुनाथजीका प्रिय कार्य करनेके लिये लंकापर चढ़ गये ॥ ४९-५० ॥ उनमेंसे कोई सहस्रयूथपति, कोई कोटियूथप और कोई शतकोटि-यूथनायकथे। उन वानरों ने उछलते-कूदते और गर्जते हुए