भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ५ ] युद्धकाण्ड २५७

कोटीशतयुताश्चान्ये रुरुधुर्नगरं भृशम् ।<br>आप्लवन्तः प्लवन्तश्च गर्जन्तश्च प्लवङ्गमाः ॥५२॥<br>रामो जयत्यतिबलो लक्ष्मणश्च महाबलः ।<br>राजा जयति सुग्रीवो राघवेणानुपालितः ॥५३॥<br>इत्येवं घोषयन्तश्च समं युयुधिरेऽरिभिः ।<br>हनूमानङ्गदश्चैव कुमुदो नील एव च ॥५४॥<br>नलश्च शरभश्चैव मैन्दो द्विविद एव च ।<br>जाम्बवान्दधिवक्त्रश्च केसरी तार एव च ॥५५॥<br>अन्ये च बलिनः सर्वे यूथपाश्च प्लवङ्गमाः ।<br>द्वाराण्युत्प्लुत्य लङ्कायाः सर्वतो रुरुधुर्भृशम् ।<br>तदा वृक्षैर्महाकायाः पर्वताग्रैश्च वानराः ॥५६॥<br>निजघ्नुस्तानि रक्षांसि नखैर्दन्तैश्च वेगिताः ।<br><br>राक्षसाश्च तदा भीमा द्वारेभ्यः सर्वतो रुषा ॥५७॥<br>निर्गत्य भिन्दिपालैश्च खड्गैः शूलैः परश्वधैः ।<br>निजघ्नुर्वानरानीकं महाकाया महाबलाः ॥५८॥<br>राक्षसांश्च तथा जघ्नुर्वानरा जितकाशिनः ।<br>तदा बभूव समरो मांसशोणितकर्दमः ॥५९॥<br>रक्षांसां वानराणां च सम्प्रभूवाद्वुतोपमः ।<br>ते हयैश्च गजैश्चैव रथैः काञ्चनसंनिभैः ॥६०॥<br>रक्षोव्याघ्रा युयुधिरे नादयन्तो दिशो दश ।<br>राक्षसाश्च कपीन्द्राश्च परस्परजयैषिणः ॥६१॥<br>राक्षसान्वानरा जघ्नुर्वानरांश्चैव राक्षसाः ।<br>रामेण विष्णुना दृष्टा हरयो दिविजांशजाः ॥६२॥<br>बभूवुर्बलिनो हृष्टास्तदा पीतामृता इव ।<br>सीताभिमर्शपापेन रावणेनाभिपालितान् ॥६३॥<br>हृतश्रीकान्हतबलान् राक्षसान् जघ्नुरोजसा ।<br>चतुर्थांशावशेषेण निहतं राक्षसं बलम् ॥६४॥<br>स्वसैन्यं निहतं दृष्ट्वा मेघनादोऽथ दुष्टधीः ।<br>ब्रह्मदत्तवरः श्रीमानन्तर्धानं गतोऽसुरः ॥६५॥वृक्ष, पर्वतशिखर और मुट्ठियाँ तानकर नगरको सब ओर-<br>से घेर लिया ॥५१-५२॥ 'महाबली राम और वीरवर<br>लक्ष्मणकी जय हो, रघुनाथजीसे सुरक्षित राजा सुग्रीवकी<br>जय हो' इस प्रकार शब्द करते हुए वे शत्रुओंसे लड़ने<br>लगे। हनुमान्, अंगद, कुमुद, नील, नल, शरभ, मैन्द,<br>द्विविद, जाम्बवान्, दधिमुख, केसरी, तार तथा<br>अन्य समस्त बलवान् वानर और यूथपतियोंने उछल-<br>उछलकर लंकाके सब द्वारोंको चारों ओरसे घेर<br>लिया। तब ये महाकाय वानरगण वृक्ष, पर्वतशिखर<br>और नख तथा दाँतोंसे अति वेगपूर्वक उन राक्षसोंको<br>मारने लगे।<br><br>तब, महाभयानक और बड़े-बड़े डीलवाले महा-<br>बली राक्षसगण भी अति रोषपूर्वक सब द्वारोंसे<br>निकलकर भिन्दिपाल, खड्ग, शूल और परशु आदि<br>विविध अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-सेनापर प्रहार करने लगे<br>॥ ५३-५८ ॥ इसी प्रकार विजयी वानरवीर<br>भी राक्षसोंको मारने लगे। उस समय वहाँ राक्षसों<br>और वानरोंका बड़ा विचित्र युद्ध छिड़ गया, जिससे<br>उस रणभूमिमें रक्त और मांसकी कीच हो गयी। वीर<br>राक्षसकेसरी घोड़ों, हाथियों और सुवर्णमय रथोंपर चढ़-<br>कर अपने शब्दसे दशों दिशाओंको गुञ्जायमान करते हुए<br>लड़ रहे थे, और राक्षस तथा वानर दोनों ही परस्पर एक<br>दूसरेको जीतना चाहते थे ॥ ५९-६१ ॥ वानरगण<br>राक्षसोंको और राक्षसलोग वानरोंको मारने लगे।<br>विष्णुरूप भगवान् रामकी दृष्टि पड़नेसे देवताओंके अंश-<br>से उत्पन्न हुए वानरगण बड़े प्रबल हो गये; और मानो<br>अमृतपान कर अति हर्षसे उत्साहपूर्वक, सीताजीको<br>(हरण करते समय) स्पर्श करनेके कारण महापापी<br>रावणसे पालित निस्तेज और बलहीन राक्षसोंको<br>मारने लगे। धीरे-धीरे राक्षसोंकी सेना नष्ट होकर केवल<br>एक चौथाई रह गयी ॥ ६२-६४॥<br><br>अपनी सेनाको नष्ट हुई देख ब्रह्माजीके वरसे<br>श्रीसम्पन्न हुआ दुष्टबुद्धि राक्षस मेघनाद अन्तर्धान हो<br>गया ॥६५॥ वह दैत्य सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र चलानेमें

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