अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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मूल संस्कृत श्लोक:
सर्वास्त्रकुशलो व्योम्नि ब्रह्मास्त्रेण समन्ततः ।
नानाविधानि शस्त्राणि वानरानीकमर्दयन् ॥ ६६ ॥
ववर्ष शरजालानि तदद्भुतमिवाभवत् ।
रामोऽपि मानयन्ब्राह्ममस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ६७ ॥
क्षणं तूष्णीमुवासाथ ददर्श पतितं बलम् ।
वानराणां रघुश्रेष्ठश्चुकोपानलसन्निभः ॥ ६८ ॥
चापमानय सौमित्रे ब्रह्मास्त्रेणासुरं क्षणात् ।
भस्मीकरोमि मे पश्य बलमद्य रघूत्तम ॥ ६९ ॥
मेघनादोऽपि तच्छ्रुत्वा रामवाक्यमतन्द्रितः ।
तूर्णं जगाम नगरं मायया मायिकोऽसुरः ॥ ७० ॥
पतितं वानरानीकं दृष्ट्वा रामोऽतिदुःखितः ।
उवाच मारुतिं शीघ्रं गत्वा क्षीरमहोदधिम् ॥ ७१ ॥
तत्र द्रोणगिरिर्नाम दिव्यौषधिसमुद्भवः ।
तमानय द्रुतं गत्वा सञ्जीवय महामते ॥ ७२ ॥
वानरौघान्महासत्त्वान्कीर्तिस्ते सुस्थिरा भवेत् ।
आज्ञाप्रमाणमित्युक्त्वा जगामानिलनन्दनः ॥ ७३ ॥
आनीय च गिरिं सर्वान्वानरान्वानरर्षभः ।
जीवयित्वा पुनस्तत्र स्थापयित्वाऽऽययौ द्रुतम् ॥ ७४ ॥
पूर्ववच्चोद्भरं नादं वानराणां बलौघतः ।
श्रुत्वा विस्मयमापन्नो रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ ७५ ॥
राघवो मे महान् शत्रुः प्राप्तो देवविनिर्मितः ।
हन्तुं तं समरे शीघ्रं गच्छन्तु मम यूथपाः ॥ ७६ ॥
मन्त्रिणो बान्धवाः शूरा ये च मत्प्रियकाङ्क्षिणः ।
सर्वे गच्छन्तु युद्धाय त्वरितं मम शासनात् ॥ ७७ ॥
ये न गच्छन्ति युद्धाय भीरवः प्राणविप्लवात् ।
तान्हनिष्याम्यहं सर्वान्मच्छासनपराङ्मुखान् ॥ ७८ ॥
तच्छ्रुत्वा भयसन्त्रस्ता निर्जग्मू रणकोविदाः । -
हिन्दी अनुवाद:
कुशल था। अतः वह आकाशमें चढ़कर ब्रह्मास्त्रद्वारा वानर-सेनाको दलित करता हुआ सब ओर नाना प्रकारके शस्त्र और बाणसमूह बरसाने लगा। यह बड़ा आश्चर्य-सा होने लगा। अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् राम भी ब्रह्मास्त्रका मान रखनेके लिये एक क्षणतक चुपचाप वानर-सेनाका पतन देखते रहे। अन्तमें वे रघुश्रेष्ठ क्रोधसे अग्निके समान प्रज्वलित हो उठे ॥ ६६-६८ ॥ और बोले— "लक्ष्मण! मेरा धनुष तो लाओ, मैं एक क्षणमें ही इस दुष्ट दानवको ब्रह्मास्त्रसे भस्म कर डालूँगा। हे रघूश्रेष्ठ! आज तुम मेरा पराक्रम देखना" ॥ ६९ ॥
मेघनाद भी बहुत सावधान था; रामचन्द्रजीके ये वाक्य सुनते ही वह मायामयी दैत्य मायापूर्वक तुरन्त अपने नगरको चला गया ॥ ७० ॥
वानर-सेनाको नष्ट हुई देख श्रीरामचन्द्रजी अति दुःखित होकर हनुमान्जीसे बोले— "हनुमान् ! तुम तुरन्त ही क्षीर-सागरपर जाओ। वहाँ द्रोणाचल नामक पर्वत है, जिसपर नाना प्रकारकी दिव्य ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं। हे महामते ! तुम झटपट जाकर उस पर्वतको ले आओ और इन महापराक्रमी वानरयूथोंको जीवित करो। इससे तुम्हारी कीर्ति अविचल हो जायगी।" यह सुनकर पवन-कुमार 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर चल दिये ॥ ७१-७३ ॥
और तुरन्त ही उस पर्वतको लाकर (उसकी ओषधियों-से) समस्त वानरोंको जीवित कर उसे फिर वहीं रख आये ॥ ७४ ॥
तब वानर-सेनाका फिर पूर्ववत् भयानक शब्द सुनकर रावण अति विस्मित होकर कहने लगा—॥ ७५ ॥
"देवताओंका प्रकट किया हुआ यह राम मेरा महान् शत्रु आया है। इसे युद्धमें मारनेके लिये मेरे सेनापति, मन्त्री, बन्धु-बान्धव तथा और भी जो शूरवीर मेरा हित चाहते हों, वे सब मेरी आज्ञा मानकर तुरन्त जायँ ॥ ७६-७७ ॥
जो डरपोक अपने प्राणोंके भयसे युद्ध करने नहीं जायेंगे, अपनी आज्ञा न मानने-वाले उन सबको मैं मार डालूँगा" ॥ ७८ ॥
रावणकी यह आज्ञा सुनकर अतिकाय, प्रहस्त, महानाद, महोदर,