अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ६ ] युद्धकाण्ड २५९
अतिकायः प्रहस्तश्च महानादमहोदरौ ॥७९॥ देवशत्रुर्निकुम्भश्च देवान्तकनरान्तकौ । अपरे बलिनः सर्वे ययुर्युद्धाय वानरैः ॥८०॥ एते चान्ये च बहवः शूराः शतसहस्रशः । प्रविश्य वानरं सैन्यं ममन्थुर्गलदर्पिताः ॥८१॥ भुशुण्डीभिन्दिपालैश्च बाणैः खड्गैः परश्वधैः । अन्यैश्च विविधैरस्त्रैर्निजघ्नुर्हरियूथपान् ॥८२॥ ते पादपैः पर्वतशृंगैर्नखदंष्ट्रैश्च मुष्टिभिः । प्राणैर्विमोचयामासुः सर्वराक्षसयूथपान् ॥८३॥ रामेण निहताः केचित्सुग्रीवेण तथाऽपरे । हनूमता चाङ्गदेन लक्ष्मणेन महात्मना । यूथपैर्वानराणां ते निहताः सर्वराक्षसाः ॥८४॥ रामतेजः समाविश्य वानरा बलिनोऽभवन् । रामशक्तिविहीनानामेवं शक्तिः कुतो भवेत् ॥८५॥ सर्वेश्वरः सर्वमयो विधाता मायामनुष्यत्वविडम्बनेन । सदा चिदानन्दमयोऽपि रामो युद्धादिलीलां वितनोति मायाम् ॥८६॥
देवशत्रु, निकुम्भ, देवान्तक और नरान्तक आदि रणकुशल वीर तथा और भी समस्त बलवान् योद्धा भयभीत होकर वानरोंके साथ युद्ध करनेके लिये चले ॥७९-८०॥ ये तथा और भी बहुत-से सैकड़ों-सहस्रों शूरवीर अपने-अपने बलके गर्वसे उन्मत्त हो वानर-सेनामें घुसकर उसे दलित करने लगे ॥ ८१ ॥ वे भुशुण्डी, भिन्दिपाल, बाण, खड्ग, परशु तथा और भी नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे वानर-यूथपतियोंपर प्रहार करने लगे ॥ ८२ ॥
इधर, वानरवीर भी वृक्षों, पर्वतशिखरों, नखों, दाढ़ों और मुष्टियोंसे समस्त राक्षस-यूथपोंको निष्प्राण करने लगे ॥ ८३ ॥ उन राक्षसोंमेंसे कोई श्रीरामके हाथसे, कोई सुग्रीवके द्वारा, कोई हनुमान् और अंगदके द्वारा, कोई महात्मा लक्ष्मणजीके हाथसे और कोई अन्यान्य वानर-यूथपोंके द्वारा मारे गये । इस प्रकार उन समस्त राक्षसोंका अन्त हो गया ॥ ८४ ॥ राम-तेजके समावेश-से वानरगण अत्यन्त प्रबल हो रहे थे । राम-शक्तिसे शून्य होनेपर उनमें इतनी सामर्थ्य कैसे हो सकती थी ? ॥ ८५ ॥ भगवान् राम सर्वेश्वर, सर्वमय, सबके नियन्ता और सर्वदा चिदानन्दमय हैं, तथापि मायासे मानव-चरित्रका अनुकरण करते हुए युद्धादि लीलाका विस्तार करते हैं ॥ ८६ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे युद्धकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
लक्ष्मण-मूर्च्छा, राम-रावण-संग्राम, हनुमानजीका ओषधि लेने जाना और रावण-कालनेमि-संवाद ।
श्रीमहादेव उवाच श्रुत्वा युद्धे बलं नष्टमतिकायमुखं महत् । रावणो दुःखसन्तप्तः क्रोधेन महताऽऽवृतः ॥ १ ॥ निधायेन्द्रजितं लङ्कारक्षणार्थं महाद्युतिः । स्वयं जगाम युद्धाय रामेण सह राक्षसः ॥ २ ॥
**श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! युद्धमें अतिकाय आदि राक्षसोंकी महती सेनाको नष्ट हुई सुन रावण अति दुःखार्तुर हो महान् क्रोधसे भर गया ॥ १ ॥ और वह महातेजस्वी राक्षस लङ्काकी रक्षाके लिये इन्द्रजीतको नियुक्त कर स्वयं रघुनाथजीसे लड़नेके लिये चला ॥ २ ॥ महाबली राक्षसराज समस्त शस्त्रास्त्र-