अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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दिव्यं स्यन्दनमारुह्य सर्वशस्त्रास्त्रसंयुतम् ।
राममेवाभिदुद्राव राक्षसेन्द्रो महाबलः ॥ ३ ॥
वानरान्बहुशो हत्वा बाणैराशीविषोपमैः ।
पातयामास सुग्रीवप्रमुखान्यूथनायकान् ॥ ४ ॥
गदापाणिं महासत्त्वं तत्र दृष्ट्वा विभीषणम् ।
उत्ससर्ज महाशक्तिं मयदत्तां विभीषणे ॥ ५ ॥
तामापतन्तीमालोक्य विभीषणविघातिनीम् ।
दत्ताभयोऽयं रामेण वधार्हो नायमासुरः ॥ ६ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणो भीमं चापमादाय वीर्यवान् ।
विभीषणस्य पुरतः स्थितोऽकम्प इवाचलः ॥ ७ ॥
सा शक्तिर्लक्ष्मणतनुं विवेशामोघशक्तितः ।
यावन्त्यः शक्तयो लोके मायायाः सम्भवन्ति हि ॥ ८ ॥
तासामाधारभूतस्य लक्ष्मणस्य महात्मनः ।
मायाशक्त्या भवेत्किं वा शेषांशस्य हरेस्तनोः ॥ ९ ॥
तथापि मानुषं भावमापन्नस्तदनुव्रतः ।
मूर्च्छितः पतितो भूमौ तमादातुं दशाननः ॥ १० ॥
हस्तैस्तोलयितुं शक्तो न बभूवातिविस्मितः ।
सर्वस्य जगतः सारं विराजं परमेश्वरम् ॥ ११ ॥
कथं लोकाश्रयं विष्णुं तोलयेल्लघुराक्षसः ।
ग्रहीतुकामं सौमित्रिं रावणं वीक्ष्य मारुतिः ॥ १२ ॥
आजघानोरसि क्रुद्धो वज्रकल्पेन मुष्टिना ।
तेन मुष्टिप्रहारेण जानुभ्यामपतद्भुवि ॥ १३ ॥
आस्यैश्च नेत्रश्रवणैरूद्वमन् रुधिरं बहु ।
वेघूर्णमाननयनो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ १४ ॥
अथ लक्ष्मणमादाय हनूमान् रावणार्दितम् ।
से सुसज्जित एक दिव्य रथपर आरूढ़ हो श्रीरामचन्द्रजी-की ओर ही दौड़ा ॥ ३ ॥ उसने अपने सर्पके समान उग्र बाणोंसे बहुत-से वानरोंको मारकर सुग्रीव आदि यूथपतियोंको भी पृथिवीपर गिरा दिया ॥ ४ ॥ फिर महापराक्रमी विभीषणको वहाँ गदा लिये खड़ा देख उसने उसकी ओर मयदानवकी दी हुई महान् शक्ति छोड़ी ॥ ५ ॥ उस शक्तिको विभीषणका नाश करनेके लिये बढ़ती देख 'रामने इसे अभय दिया है, यह असुरकुमार वध किये जानेयोग्य नहीं है' ऐसा कहते हुए महावीर्यवान् लक्ष्मणजी अपना प्रचण्ड धनुष लेकर विभीषणके आगे पर्वतके समान अचल होकर खड़े हो गये ॥ ६-७ ॥
उस शक्तिकी सामर्थ्य अमोघ (कभी व्यर्थ न जानेवाली) थी, अतः वह लक्ष्मणजीके शरीरमें घुस गयी। संसारमें मायासे जितनी शक्तियाँ उत्पन्न होतीं हैं महात्मा लक्ष्मणजी, उन सबके आधार भगवान् विष्णुके स्वरूप भूत शेषनागके अंशावतार हैं। उनका उस मायाशक्तिसे क्या बिगड़ सकता था ? ॥ ८-९ ॥ तथापि इस समय मनुष्यभाव अंगीकार करनेसे उसका अनुकरण करते हुए वे मूर्च्छित होकर पृथिवीपर गिर पड़े। लक्ष्मणजीको ले जानेके लिये रावण उन्हें अपने हाथोंसे उठानेमें सफल न हुआ, अतः उसे बड़ा ही विस्मय हुआ। भला, जो सम्पूर्ण जगत्का सार परमेश्वर विराट् पुरुष है, उस निखिल लोकाधार विष्णुको एक क्षुद्र राक्षस कैसे उठा सकता था ?
जब हनुमान्जीने देखा कि रावण लक्ष्मणजीको ले जाना चाहता है तो उन्होंने अति क्रुद्ध होकर उसकी छातीमें एक वज्र-सदृश घूँसा मारा। उस घूँसेके आघातसे रावण घुटनोंके बल पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ १०-१३ ॥ और अपने मुख, नेत्र और कानोंसे बहुत-सा रुधिर वमन करता हुआ घूमती हुई आँखोंसे रथके पिछले भागमें बैठ गया ॥ १४ ॥ तदनन्तर हनुमान्जी रावणद्वारा आहत लक्ष्मणजीको अपनी भुजाओंपर उठाकर श्रीरामचन्द्रजी-