भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६] युद्धकाण्ड २६१

आनयद्रामसामीप्यं बाहुभ्यां परिगृह्य तम् ॥१५॥ हनूमतः सुहृत्त्वेन भक्त्या च परमेश्वरः । लघुत्वमगमद्देवो गुरूणां गुरुरप्यजः ॥१६॥ सा शक्तिरपि तं त्यक्त्वा ज्ञात्वा नारायणांशजम् । रावणस्य रथं प्रागाद्रावणोऽपि शनैस्ततः ॥१७॥ संज्ञामवाप्य जग्राह चापासनमथो रुषा । राममेवाभिदुद्राव दृष्ट्वा रामोऽपि तं क्रुधा ॥१८॥ आरुह्य जगतां नाथो हनूमन्तं महाबलम् । रथस्थं रावणं दृष्ट्वा अभिदुद्राव राघवः ॥१९॥ ज्याशब्दमकरोत्तीव्रं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम् । रामो गम्भीरया वाचा राक्षसेन्द्रमुवाच ह ॥२०॥ राक्षसाधम तिष्ठाद्य क्व गमिष्यसि मे पुरः । कृत्वाऽपराधमेवं मे सर्वत्र समदर्शिनः ॥२१॥ येन बाणेन निहता राक्षसास्ते जनालये । तेनैव त्वां हनिष्यामि तिष्ठाद्य मम गोचरे ॥२२॥

श्रीरामस्य वचः श्रुत्वा रावणो मारुतात्मजम् । वहन्तं राघवं संख्ये शरैस्तीक्ष्णैरताडयत् ॥२३॥ हतस्यापि शरैस्तीक्ष्णैर्वायुसूनोः स्वतेजसा । व्यवधंत पुनस्तेजो ननर्द च महाकपिः ॥२४॥ ततो दृष्ट्वा हनूमन्तं सव्रणं रघूसत्तमः । क्रोधमाहारयामास कालरुद्र इवापरः ॥२५॥ साश्वं रथं ध्वजं सूतं शस्त्राैधं धनुरञ्जसा । छत्रं पताकां तरसा चिच्छेद शितसायकैः ॥२६॥ ततो महाशरेणाशु रावणं रघूसत्तमः । विव्याध वज्रकल्पेन पाकारिरिव पर्वतम् ॥२७॥ रामबाणहतो वीरश्चचाल च मुमोह च ।

के पास ले आये ॥ १५ ॥ हनुमान्‌जीके लिये, उनके सौहार्द और भक्तिभावके कारण वे अजन्मा और प्रकाश-स्वरूप परमेश्वर (लक्ष्मणजी) भारी-से-भारी होनेपर भी अत्यन्त लघु (हल्के) हो गये ॥ १६ ॥ श्रीलक्ष्मण-जीको साक्षात् नारायणका अंश जानकर वह शक्ति भी उन्हें छोड़कर फिर रावणके रथपर चली गयी । इधर, रावणको भी जब धीरे-धीरे कुछ चेत हुआ तो उसने अत्यन्त क्रोधसे अपना धनुष उठाया और रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । उसे (अपनी ओर आता) देख जगत्पति भगवान् राम अति क्रुद्ध होकर महाबली हनुमान्‌जीके कन्धेपर चढ़े और रावणको रथमें बैठा देख उसकी ओर दौड़े ॥ १७-१९॥ भगवान् रामने अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाका ऐसा कठोर शब्द किया जो मानो वज्र-को भी चूर्ण करनेवाला था, और फिर अति गम्भीर वाणीसे राक्षसराज रावणसे ऐसा कहा- ॥ २० ॥ "अरे राक्षसा-धम ! जरा ठहर तो, मुझ सर्वत्र समदर्शीका ऐसा अपराध करके तू कहाँ जा सकता है ? ॥ २१ ॥ अरे ! तू तनिक मेरे सामने खड़ा रह, जिस बाणसे मैंने जन-स्थानमें (खर-दूषणादिसे युद्ध करते समय) तेरे राक्षसोंको मारा था आज उसीसे तुझे भी मार डालूँगा" ॥ २२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर रावणने उन्हें वहन करनेवाले हनुमान्‌जीके बड़े तीखे बाण मारे ॥ २३ ॥ किन्तु उन तीक्ष्ण बाणोंके लगनेपर भी पवन-पुत्रका तेज अपने प्रभावसे बराबर बढ़ता ही गया और वे महान् कपीश्वर बड़े जोरसे गर्जने लगे ॥ २४ ॥ जब रघुनाथजीने हनुमान्‌जीको क्षत-विक्षत देखा तो दूसरे कालरुद्रके समान बड़ा भयंकर क्रोध धारण किया ॥ २५ ॥ और अपने तीक्ष्ण बाणोंसे बड़ी फुर्तीके साथ सुगमतासे ही रावणके घोड़ेसहित रथ, ध्वजा, सारथी, शस्त्रसमूह, धनुष, छत्र और पताका आदि काट डाले ॥ २६ ॥ फिर इन्द्रने जैसे पर्वतोंपर आक्रमण किया था वैसे ही उन्होंने एक वज्रतुल्य महाबाणसे रावणको वेध डाला ॥ २७ ॥ भगवान् रामका बाण लगने-से वह वीर विचलित हो गया, उसे मूर्च्छा आ गयी और उसके हाथसे धनुष छूट गया ।