अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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हस्तान्निपतितश्चापस्तं समीक्ष्य रघूत्तमः ॥२८॥
अर्धचन्द्रेण चिच्छेद तत्किरीटं रविप्रभम् ।
अनुजानामि गच्छ त्वमिदानीं बाणपीडितः॥२९॥
प्रविश्य लङ्कामाश्वास्य श्वः पश्यसि बलं मम ।
उसकी ऐसी दशा देखकर रघुनाथजीने एक अर्द्धचन्द्राकार बाणसे उसका सूर्यसदृश प्रकाशमान मुकुट काट डाला और कहा—"रावण ! तुम मेरे बाणसे पीड़ित हो; अतः मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, इस समय तुम जाओ ॥२८-२९॥ आज लंकामें जाकर विश्राम करो, फिर कल मेरा पराक्रम देखना।"
रामबाणेन संविद्धो हतदर्पोऽथ रावणः ॥३०॥
महत्या लज्जया युक्तो लङ्कां प्राविशदातुरः ।
रामोऽपि लक्ष्मणं दृष्ट्वा मूर्च्छितं पतितं भुवि ॥३१॥
मानुषत्वमुपाश्रित्य लीलयानुशुशोच ह ।
ततः प्राह हनूमन्तं वत्स जीवय लक्ष्मणम् ॥३२॥
महौषधीः समानीय पूर्ववद्वानरानपि ।
तथेति राघवेणोक्तो जगामाशु महाकपिः ॥३३॥
हनूमान्वायुवेगेन क्षणात्तीर्त्वा महोदधिम् ।
एतस्मिन्नन्तरे चारा रावणाय न्यवेदयन् ॥३४॥
तब, श्रीरामचन्द्रजीके बाणसे विद्ध होनेके कारण सारा दर्प चूर्ण हो जानेपर रावणने लज्जित और व्याकुल हो लंकामें प्रवेश किया। इधर रामचन्द्रजी भी लक्ष्मणजीको मूर्च्छित अवस्थामें पृथिवीपर पड़े देख मनुष्यभावका आश्रय ले लीलासे शोक करने लगे और हनुमान्जीसे बोले—"वत्स ! पहली तरह ही (द्रोणाचलसे) महौषधि लाकर लक्ष्मण और वानरोंको जीवित करो।" रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर महाकपि हनुमान्जी 'बहुत अच्छा' कह एक क्षणमें ही महासागरको पारकर वायुवेगसे चले। इसी समय रावणके गुप्तचरोंने उससे कहा—॥३०-३४॥
रामेण प्रेषितो देव हनूमान् क्षीरसागरम् ।
गतो नेतुं लक्ष्मणस्य जीवनार्थं महौषधीः ॥३५॥
श्रुत्वा तच्चारवचनं राजा चिन्तापरोऽभवत् ।
जगाम रात्रावेकाकी कालनेमिगृहं क्षणात् ॥३६॥
"स्वामिन् ! रामने हनुमान्को क्षीर-समुद्रपर भेजा है और वह लक्ष्मणको जीवित करनेके लिये महौषधि लेने गया है" ॥३५॥ उनके ये वचन सुनकर राक्षसराज अति चिन्तातुर हुआ और उसी क्षण रात्रिमें ही अकेला कालनेमिके घर गया ॥३६॥
गृहागतं समालोक्य रावणं विस्मयान्वितः ।
कालनेमिरुवाचेदं प्राञ्जलिर्भयविह्वलः ।
अर्घ्यादिकं ततः कृत्वा रावणस्याग्रतः स्थितः॥३७॥
किं ते करोमि राजेन्द्र किमागमनकारणम् ।
कालनेमिमुवाचेदं रावणो दुःखपीडितः ॥३८॥
रावणको घर आया देख कालनेमिको बड़ा आश्चर्य हुआ; वह उसे अर्घ्यादि दे उसके सामने खड़ा हो गया और अति भयभीत हो हाथ जोड़कर बोला ॥३७॥ "राजराजेश्वर ! आज किस निमित्तसे आना हुआ ? कहिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" तब रावणने अति दुःखित होकर कालनेमिसे कहा ॥३८॥
ममापि कालवशतः कष्टमेतदुपस्थितम् ।
मया शक्त्या हतो वीरो लक्ष्मणः पतितो भुवि ॥३९॥
तं जीवयितुमानेतुमोषधीर्हनुमान् गतः ।
यथा तस्य भवेद्विघ्नं तथा कुरु महामते ॥४०॥
मायया मुनिवेषेण मोहयस्व महाकपिम् ।
कालात्ययो यथा भूयात्तथा कृत्वैहि मन्दिरे ॥४१॥
"आज कालक्रमसे मुझे भी यह कष्ट उपस्थित हो गया। मेरी शक्तिसे आहत होकर वीर लक्ष्मण पृथिवीपर गिर पड़ा है ॥३९॥ उसे जीवित करनेके लिये हनुमान् ओषधि लेने गया है। हे महामते ! तुम कोई ऐसा उपाय करो जिससे उसके लानेमें विघ्न खड़ा हो जाय ॥४०॥ तुम मायासे मुनि-वेष बनाकर हनुमान्को मोहित करो जिससे (उस ओषधिके प्रयोग-का) समय निकल जाय। यह कार्य करके फिर अपने घर लौट आना" ॥४१॥