भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ६ ] युद्धकाण्ड २६३


रावणस्य वचः श्रुत्वा कालनेमिरुवाच तम् ।<br>रावणेश वचो मेऽद्य शृणु धारय तत्त्वतः ॥४२॥रावणके वचन सुनकर कालनेमिने उससे कहा—<br>“महाराज रावण ! मेरी बात सुनिये और उसे यथार्थ समझकर धारण कीजिये॥ ४२॥ मैं आपका प्रिय करूँगा ही,
प्रियं ते करवाण्येव न प्राणान् धारयाम्यहम् ।<br>मारीचस्य यथाऽरण्ये पुराभून्मृगरूपिणः ॥४३॥<br>तथैव मे न सन्देहो भविष्यति दशानन ।<br>हताः पुत्राश्च पौत्राश्च बान्धवा राक्षसाश्च ते ॥४४॥उसके लिये मैं अपने प्राणोंकी परवा नहीं करता, (तथापि उससे क्या लाभ होगा ? ) हे दशानन ! इसमें सन्देह नहीं जो कुछ दण्डकारण्यमें मृगरूपधारी मारीचका हुआ था वही दशा मेरी भी होगी । देखिये, आपके पुत्र, पौत्र और अनेकों सगे-सम्बन्धी राक्षसलोग मारे गये ॥ ४३-४४॥ इस प्रकार राक्षस-
घातयित्वाऽसुरकुलं जीवितेनापि किं तव ।<br>राज्येन वा सीतया वा किं देहेन जडात्मना ॥४५॥वंशका नाश कराकर आपके जीवन, राज्य, सीता अथवा इस जड देहसे भी क्या लाभ है ? ॥ ४५ ॥ हे
सीतां प्रयच्छ रामाय राज्यं देहि विभीषणे ।<br>वनं याहि महाबाहो रम्यं मुनिगणाश्रयम् ॥४६॥महाबाहो ! आप रामचन्द्रजीको सीता और विभीषणको राज्य देकर मुनिगणसेवित सुरम्य तपोवनको जाइये
स्नात्वा प्रातः शुभजले कृत्वा सन्ध्यादिकाः क्रियाः॥ ४६ ॥ वहाँ प्रातःकाल शुद्ध जलमें स्नान कर तथा सन्ध्योपासनादि नित्य-कर्मोंसे निवृत्त हो एकान्त देशमें
तत एकान्तमाश्रित्य सुखासनपरिग्रहः ॥४७॥सुखमय आसनसे बैठिये ॥ ४७॥ और सब ओरसे
विसृज्य सर्वतः सङ्गामितरान्विषयान्वहिः ।<br>बहिःप्रवृत्ताक्षगणं शनैः प्रत्यक् प्रवाहय ॥४८॥निःसंग हो बाह्य विषयोंको छोड़ अपनी बाह्य वृत्तिवाली इन्द्रियोंको धीरे-धीरे अन्तर्मुख कीजिये ॥ ४८ ॥ हे
प्रकृतेर्भिन्नमात्मानं विचारय सदाऽनघ ।<br>चराचरं जगत्कृत्स्नं देहबुद्धीन्द्रियादिकम् ॥४९॥अनघ ! अपने आत्माको सदा प्रकृतिसे भिन्न विचारिये। देह, बुद्धि और इन्द्रियादिसे युक्त सम्पूर्ण चराचर जगत् अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्ब ( कीटविशेष ) पर्यन्त जो
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं दृश्यते श्रूयते च यत् ।<br>सैषा प्रकृतिरित्युक्ता सैव मायेति कीर्तिता ॥५०॥कुछ दिखायी या सुनायी देता है वह सब प्रकृति है और वही माया भी कहलाती है ॥ ४९-५० ॥ वही
सर्गस्थितिविनाशानां जगद्वृक्षस्य कारणम् ।<br>लोहितश्वेतकृष्णादि प्रजाः सृजति सर्वदा ॥५१॥सर्वदा संसार-रूपी वृक्षकी उत्पत्ति, स्थिति और विनाशकी कारणरूप श्वेत (सात्त्विक) लोहित (राजस) और कृष्णवर्ण ( तामस ) प्रजा उत्पन्न करती है ॥५१ ॥
कामक्रोधादिपुत्रांश्चाहिंसातृष्णादिकन्यकाः ।<br>मोहयन्त्यनिशं देवमात्मानं स्वैर्गुणैर्विभुम् ॥५२॥तथा वही अपने गुणोंसे अहर्निश सर्वव्यापक आत्मदेवको मोहित कर काम-क्रोधादि पुत्रों और हिंसा-तृष्णादि कन्याओंको उत्पन्न करती है ॥ ५२॥ वह कर्तृत्व
कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखान् स्वगुणानात्मनीश्वरे ।<br>आरोप्य स्ववशं कृत्वा तेन क्रीडति सर्वदा ॥५३॥और भोक्तृत्व आदि अपने गुणोंको अपने प्रभु आत्मामें आरोपित कर उसे अपने वशीभूत कर उससे सदा खेलती रहती है ॥ ५३ ॥ जिससे युक्त होकर
शुद्धोऽप्यात्मा यया युक्तः पश्यतीव सदा बहिः ।<br>विस्मृत्य च स्वमात्मानं मायागुणविमोहितः ॥५४॥आत्मा मायिक गुणोंसे मोहित होकर अपने स्वरूपको भूल जाता है, और नित्य-शुद्ध होता हुआ भी सदा बाह्य विषयोंको देखने लगता है ॥ ५४ ॥ जिस समय
यदा सद्गुरुणा युक्तो बोध्यते बोधरूपिणा ।सद्गुरुका साक्षात्कार होता है और वे इसे निर्मल ज्ञानदृष्टिसे जागृत करते हैं उस समय यह् बाह्य विषयों-