भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२६४अध्यात्मरामायण[सर्गः ६]

[संस्कृत श्लोक]

निवृत्तदृष्टिरात्मानं पश्यत्येव सदा स्फुटम् ॥५५॥
जीवन्मुक्तः सदा देही मुच्यते प्राकृतैर्गुणैः ।

त्वमप्येवं सदात्मानं विचार्य नियतेन्द्रियः ॥५६॥
प्रकृतेरन्यमात्मानं ज्ञात्वा मुक्तो भविष्यसि ।
ध्यातुं यद्यसमर्थोऽसि सगुणं देवमाश्रय ॥५७॥
हृत्पद्मकर्णिके स्वर्णपीठे मणिगणान्विते ।
मृदुश्लक्ष्णतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् ॥५८॥
वीरासनं विशालाक्षं विद्युत्पुञ्जप्रभाम्बरम् ।
किरीटहारकेयूरकौस्तुभादिभिरन्वितम् ॥५९॥
नूपुरैः कटकैर्भाान्तं तथैव वनमालया ।
लक्ष्मणेन धनुर्द्वन्द्वकरेण परिसेवितम् ॥६०॥
एवं ध्यात्वा सदाऽऽत्मानं रामं सर्वहृदि स्थितम् ।
भक्त्या परमया युक्तो मुच्यते नात्र संशयः ॥६१॥
शृणु वै चरितं तस्य भक्तैर्नित्यमनन्यधीः ।
एवं चेत्कृतपूर्वाणि पापानि च महान्त्यपि ।
क्षणादेव विनश्यन्ति यथाऽग्नेस्तूलराशयः ॥६२॥
भजस्व रामं परिपूर्णमेकं
विहाय वैरं निजभक्तियुक्तः ।
हृदा सदा भावितभावरूप-
मनामरूपं पुरुषं पुराणम् ॥६३॥


[हिन्दी अनुवाद]

से अपनी दृष्टि हटाकर अपने आपको ही स्पष्ट देखता है ॥५५॥ और फिर यह देहधारी जीव जीवन्मुक्त होकर प्राकृत गुणोंसे छूट जाता है ।

हे रावण ! आप भी संयतेन्द्रिय होकर इसी प्रकार अपने वास्तविक आत्मस्वरूपका चिन्तन कीजिये ॥५६॥ इससे आत्माको प्रकृतिसे भिन्न जानकर आप मुक्त हो जायँगे । और यदि आप इस प्रकार ध्यान करनेमें असमर्थ हों तो सगुण भगवान्‌का आश्रय लीजिये ॥५७॥ (उस सगुण ध्यानकी विधि इस प्रकार है) हृदयकमलकी कर्णिकाओंगें मणिगणजटित अति मृदुल और स्वच्छ सुवर्ण-सिंहासनपर जो जानकीजीसहित विराजमान हैं, जो वीरासनसे बैठे हैं, जिनके नेत्र अति विशाल और वस्त्र विद्युल्लताके समान तेजोमय हैं तथा जो किरीट, हार, केयूर और कौस्तुभमणि आदि आभूषणोंसे सुशोभित हैं; नूपुर, कटक और वनमाला आदिसे जिनकी अपूर्व शोभा हो रही है तथा लक्ष्मणजी अपने हाथोंमें दो धनुष (एक अपना और एक प्रभु रामका) लिये जिनकी सेवामें खड़े हैं, उन सबके हृदयमें विराजमान अपने आत्मारूप भगवान् रामका इस प्रकार सर्वदा अत्यन्त भक्तिपूर्वक ध्यान करनेसे आप मुक्त हो जायँगे—इसमें सन्देह नहीं ॥५८-६१॥ नित्य अनन्यबुद्धि होकर उनके भक्तोंके मुखारविन्दसे उनके पवित्र चरित्र सुनिये । ऐसा करनेसे आपके पूर्वकृत महान् पाप भी एक क्षणमें ही इस प्रकार भस्म हो जायँगे जैसे अग्निसे रूईका ढेर भस्म हो जाता है ॥६२॥ जो सर्वत्र परिपूर्ण हैं उन अद्वितीय भगवान् रामके साथ वैर छोड़कर आत्मप्रेम-पूर्वक उन नामरूपरहित पुराणपुरुषकी हृदयमें सगुण-भावसे भावना कर उनका सर्वदा भजन कीजिये”॥६३॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
युद्धकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥