भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ७ ] युद्धकाण्ड २६५


सप्तम सर्ग

कालनेमिका कपट, हनुमान्जीद्वारा उसका वध, लक्ष्मणजीका सचेत होना और रावणका कुम्भकर्णको जगाना।

श्रीमहादेव उवाचश्रीमहादेवजी बोले—
कालनेमिवचः श्रुत्वा रावणोऽमृतसन्निभम् ।<br>जज्वाल क्रोधताम्राक्षः सर्पिरद्भिरिवाग्निमान् ॥ १ ॥हे पार्वति ! जैसे अग्निसे तपाया हुआ घृत जल डालनेसे छुनछुनाने लगता है वैसे ही कालनेमिके ये अमृततुल्य वचन सुनकर रावण जल उठा और क्रोधसे उसके नेत्र लाल हो गये ॥१॥
निहन्मि त्वां दुरात्मानं मच्छासनपराङ्मुखम् ।<br>परैः किञ्चिद्गृहीत्वा त्वं भाषसे रामकिंकरः ॥ २ ॥वह कहने लगा— "अरे ! मालूम होता है तू शत्रुसे कुछ लेकर ही इस प्रकार रामके दासकी भाँति बातें बनाता है। याद रख, मेरी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवाले तुझ दुष्ट-को मैं अभी मार डालूँगा" ॥२॥
कालनेमिरुवाचेदं रावणं देव किं क्रुधा।<br>न रोचते मे वचनं यदि गत्वा करोमि तत् ॥ ३ ॥तब कालनेमिने रावण-से कहा— "देव ! क्रोधकी क्या बात है ? यदि आपको मेरा कथन अच्छा नहीं लगता तो मैं अभी जाकर (आप जैसा कहते हैं) वही करता हूँ" ॥ ३ ॥
इत्युक्त्वा प्रययौ शीघ्रं कालनेमिर्महासुरः ।<br>नोदितो रावणेनैव हनूमद्विघ्नकारणात् ॥ ४ ॥इतना कह महादैत्य कालनेमि रावणकी ही प्रेरणासे हनुमान्जीके कार्यमें विघ्न करनेके लिये वहाँसे तुरन्त चल दिया ॥ ४ ॥
स गत्वा हिमवत्पार्श्वं तपोवनमकल्पयत् ।<br>तत्र शिष्यैः परिवृतो मुनिवेषधरः खलः ॥ ५ ॥<br>गच्छतो मार्गमासाद्य वायुसूनोर्महात्मनः ।उसने हिमालयकी तराईमें पहुँचकर उधरसे जाते हुए वायुपुत्र महात्मा हनुमान्‌के मार्गमें एक तपोवन बनाया और वहाँ वह दुष्ट स्वयं मुनिवेष बनाकर शिष्यवर्गसे घिरकर बैठ गया ।
ततो गत्वा ददर्शाथ हनूमाना श्रमं शुभम् ॥ ६ ॥<br>चिन्तयामास मनसा श्रीमान्पवननन्दनः ।जिस समय हनुमान्जी वहाँ पहुँचे तो उन्होंने वह सुन्दर आश्रम देखा ॥५-६॥ उसे देखकर श्रीमान् पवन-नन्दन मन-ही-मन सोचने लगे,
पुरा न दृष्टमेतन्मे मुनिमण्डलमुत्तमम् ॥ ७ ॥<br>मार्गो विभ्रंशितो वा मे भ्रमो वा चित्तसम्भवः ।'मैंने पहले तो यह उत्तम मुनिमण्डल देखा नहीं था ॥ ७ ॥ क्या मैं मार्ग भूल गया हूँ, या मेरे चित्तमें कोई भ्रम हो गया है ?
यद्वाऽऽविश्याश्रमपदं दृष्ट्वा मुनिमशेषतः ॥ ८ ॥<br>पीत्वा जलं ततो यामि द्रोणाचलमनुत्तमम् ।<br>इत्युक्त्वा प्रविवेशाथ सर्वतो योजनायतम् ॥ ९ ॥<br>आश्रमं कदलीशालखर्जूरपनसादिभिः ।<br>समावृतं पक्वफलैर्नम्रशाखैश्च पादपैः ॥ १० ॥अथवा चलो, इस आश्रममें चलकर सब मुनीश्वरों-का दर्शन करूँ और जल पीऊँ, तदुपरान्त पर्वतश्रेष्ठ द्रोणाचलपर चलूँगा।' ऐसा विचार वे उस आश्रममें गये, वह सब ओरसे एक योजन विस्तारवाला था तथा उसमें सब ओर, पके हुए फलोंसे जिनकी शाखाएँ झुकी हुई हैं ऐसे कदली, शाल, खजूर और कटहल आदिके वृक्ष लगे हुए थे ॥ ८-१० ॥
वैरभावविनिर्मुक्तं शुद्धं निर्मललक्षणम् ।<br>तस्मिन्महाश्रमे रम्ये कालनेमिः स राक्षसः ॥ ११ ॥वह शुद्ध और निर्मल आश्रम वैरभावसे सर्वथा रहित था। उस अति सुरम्य महाश्रममें राक्षस कालनेमि इन्द्रजाल विद्याका आश्रय कर शिवजीका

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