भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 295
२६६अध्यात्मरामायण[ सर्ग ७

इन्द्रयोगं समास्थाय चकार शिवपूजनम् ।
हनूमानभिवाद्याह गौरवेण महासुरम् ॥१२॥

भगवन् रामदूतोऽहं हनूमान्नाम नामतः ।
रामकार्येण महता क्षीराब्धिं गन्तुमुद्यतः ॥१३॥

तृषा मां बाधते ब्रह्मन्नुदकं कुत्र विद्यते ।
यथेच्छं पातुमिच्छामि कथ्यतां मे मुनीश्वर ॥१४॥

तच्छ्रुत्वा मारुतेर्वाक्यं कालनेमिस्तमब्रवीत् ।
कमण्डलुगतं तोयं मम त्वं पातुमर्हसि ॥१५॥

भुङ्क्ष्व चेमानि पक्वानि फलानि तदनन्तरम् ।
निवसस्व सुखेनारत्र निद्रामेहि त्वरास्तु मा ॥१६॥

भूतं भव्यं भविष्यं च जानामि तपसा स्वयम् ।
उत्थितो लक्ष्मणः सर्वे वानरा रामवीक्षिताः ॥१७॥

तच्छ्रुत्वा हनुमानाह कमण्डलुजलेन मे ।
न शाम्यत्यधिका तृष्णा ततो दर्शय मे जलम् ॥१८॥

तथेत्याज्ञापयामास वटुं मायाविकल्पितम् ।
वटो दर्शय विस्तीर्णं वायुसूनोर्जलाशयम् ॥१९॥

निमील्य चाक्षिणी तोयं पीत्वाऽऽगच्छ ममान्तिकम्।
उपदेक्ष्यामि ते मन्त्रं येन द्रक्ष्यसि चौषधीः ॥२०॥

तथेति दर्शितं शीघ्रं वटुना सलिलाशयम् ।
प्रविश्य हनुमांस्तोयमपिबन्मीलितेक्षणः ॥२१॥

ततश्चागत्य मकरी महामाया महाकपिम् ।
अग्रसत्तं महावेगान्मार्कति घोररूपिणी ॥२२॥

ततो ददर्श हनुमान् ग्रसन्तीं मकरीं रुषा ।
दारयामास हस्ताभ्यां वदनं सा ममार ह ॥२३॥

ततोऽन्तरिक्षे ददृशे दिव्यरूपधराङ्गना ।
धान्यमालीति विख्याता हनूमन्तमथाब्रवीत् ॥२४॥

पूजन कर रहा था । हनुमान्‌जीने उस महादैत्यको बड़े गौरवसे नमस्कार कर कहा—॥११-१२॥
"भगवन् ! मैं भगवान् रामका दूत हूँ, मेरा नाम हनुमान् है और मैं श्रीरामचन्द्रजीके एक महान् कार्यसे क्षीर-सागरको जा रहा हूँ ॥१३॥ ब्रह्मन् ! मुझे बहुत प्यास लगी हुई है, मैं खूब जल पीना चाहता हूँ। हे मुनीश्वर ! कृपया बतलाइये यहाँ जल कहाँ है ?" ॥१४॥

हनुमान्‌जीके ये वचन सुनकर कालनेमिने कहा—
"तुम मेरे कमण्डलुका जल पी सकते हो ॥१५॥ यहाँ ये फल मौजूद हैं, इन्हें खाओ और फिर सुखपूर्वक यहाँ विश्राम लेकर कुछ सो लो, ऐसी जल्दी मत करो ॥१६॥ मैं अपने तपोबलसे भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालोंकी बात जानता हूँ। इस समय रामचन्द्रजीके देखनेसे ही लक्ष्मणजी और समस्त वानर-गण सचेत होकर उठ बैठे हैं" ॥१७॥ यह सुनकर हनुमान्‌जीने कहा— "मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी हुई है, इस कमण्डलुके जलसे वह शान्त नहीं हो सकती, अतः मुझे जलाशय ही दिखला दीजिये" ॥१८॥

तब 'अच्छी बात है' ऐसा कहकर उसने एक माया-कल्पित ब्रह्मचारीको आज्ञा दी, "ब्रह्मचारिन् ! हनुमान्‌जी-को वह विस्तृत जलाशय दिखला दो" ॥१९॥ (फिर हनुमान्‌जीसे बोला—) "देखो, तुम आँखें मूँदकर जल पीना और फिर तुरन्त मेरे पास चले आना । मैं तुम्हें एक मन्त्रका उपदेश करूँगा, जिससे तुम ओषधिको देख सकोगे" ॥२०॥

तब वटुने 'जो आज्ञा' कह तुरन्त ही जलाशय दिखला दिया। उसमें घुसकर हनुमान्‌जी आँख मूँदकर जल पीने लगे ॥२१॥ इतनेहीमें वहाँ एक महामायाविनी घोररूपिणी मकरी आकर बड़ी शीघ्रतासे महाकपि हनुमान्‌जीको निगलने लगी ॥२२॥ हनुमान्‌जीने उस मकरीको अपनेको निगलते देख अति क्रुद्ध अपने हाथोंसे उसका मुख फाड़ डाला, जिससे तत्काल मर गयी ॥२३॥

इसी समय आकाशमें एक दिव्यरूप स्त्री दिखलायी दी, उसका नाम धान्य-

अध्यात्म रामायण · पृष्ठ 295, कुल 423 में से · BharatKosha